Tuesday, March 3, 2026
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जब राम मंदिर बन सकता है तो हाईकोर्ट बेंच बनवाने में कैसी झिझक?

  • जनवाणी के साथ वकीलों ने बेबाकी से अपनी राय की जाहिर
  • सरकार बनाने और गिराने दोनों का माद्दा रखते हैं मेरठ के वकील

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: पिछले लगभग छह दशक से अधिक समय से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना को लेकर मेरठ और आसपास के जिलों के अधिवक्ता आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन नतीजा अब भी ढाक के तीन पात के ही समान है। हालांकि इस बार उत्तर प्रदेश शासन ने दो विरोधाभासी निर्णय देकर असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। इससे आंदोलन की सफलता को भी बड़ा झटका लगता नजर आ रहा है।

गौरतलब है कि 19 जनवरी को उत्तर प्रदेश शासन के विशेष सचिव ने उच्च न्यायालय इलाहाबाद के महानिबंधक को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उच्च न्यायालय की खंडपीठ की स्थापना के संबंध में नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई का पत्र जारी किया था, लेकिन अगले 24 घंटे में विशेष सचिव ने अपने ही पत्र के क्रियान्वयन को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की जानकारी महानिबंधक दे दी। इस निर्णय से बेंच की स्थापना के लिए आंदोलनरत अधिवक्ताओं के बीच मायूसी छा गई।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अपने राजनीतिक लाभ के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता के साथ अन्याय कर रही है। जनवाणी ने बुधवार को जब शहर के वकीलों का मन टटोला तो वह भाजपा सरकार को लेकर खासे गुस्से में नजर आये। वरिष्ठ वकीलों ने बेबाकी से कहा कि जब राम मंदिर बन सकता है। सीएए लागू हो सकता है, फिर क्या मजबूरी है कि हाईकोर्ट बेंच की जायज मांग को लंबे समय से लटकाया जा रहा है? अधिवक्ताओं ने गुस्से में यहां तक कहा कि भाजपा को इसके नतीजे चुनाव में भुगतने पड़ेंगे।

अभी तो सरकार यह सोच रही है कि वह अपनी हिटलरशाही चलाती रहेगी, लेकिन वह यह भूल गई है कि वकील सरकार को हिलाने और गिराने दोनों का मुद्दा रखते हैं। जनवाणी ने अपने प्रश्न प्रहर के माध्यम से बुधवार को मेरठ बार एसोसिएशन के पार्क में अधिवक्ताओं से बात की तो सभी वकीलों ने बेबाकी से अपने विचार रखे। वकीलों ने कहा कि अभी नहीं तो कभी नहीं। अब हम कोरे आश्वासन पर भाजपा को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं।

स्थापित होनी चाहिए हाईकोर्ट बेंच

मेरठ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष व वरिष्ठ अधिवक्ता डीडी शर्मा का कहना है कि यह कोई नई बात नहीं है। हमने कई बार आंदोलन किये। वकीलों को आंदोलन करते हुए छह दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है। हाईकोर्ट बेंच की स्थापना के मुद्दे पर सरकार का हमेशा से ही उपेक्षापूर्व रवैया रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता को न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। भाजपा सरकार को अब हाईकोर्ट बेंच की स्थापना करनी ही चाहिए।

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जनता के साथ हो रहा अन्याय

वरिष्ठ अधिवक्ता अजय त्यागी का कहना है कि पूववर्ती कांग्रेस सरकार के दौर में कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद भी हाईकोर्ट बेंच की स्थापना नहीं की गई। सरकार अपने राजनीतिक लाभ के लिए वेस्ट यूपी की जनता के साथ अन्याय कर रही है। पूरे देश में सर्वाधिक मुकदमे हमारे पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ही होते हैं, वहां की जनता को हाईकोर्ट बेंच तक मुहैया नहीं है, ये बेहद अफसोसजनक है। भाजपा सरकार को इस बारे में गंभीरता बरतनी चाहिए। जिससे लोगों को काफी राहत मिलेगी।

जनता को मिली हमेशा मायूसी

मेरठ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष मांगेराम का कहना है कि ये मांग कितनी पुरानी है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने प्रैक्टिस शुरू की थी। तब हाईकोर्ट बेंच की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हुआ था। अब उनकी प्रैक्टिस खत्म होने का समय आ रहा है और हाईकोर्ट बेंच को लेकर कोई निर्णय नहीं लिया गया है। सरकारों की नीतियों के चलते पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता को हमेशा मायूसी ही हाथ लगी है। यहां की जनता को न्याय लेने के लिए पीढ़िया गुजारनी पड़ रही हैं।

750 किमी दूर मिलता है न्याय

मेरठ बार एसोसिएशन के पूर्व महामंत्री संजय शर्मा का कहना है कि मेरठ में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना के लिए सैकड़ों बार अधिवक्ताओं ने जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री, राज्पाल, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजे, लेकिन सभी जगह से ज्ञापन लेकर चुप्पी साध ली जाती है। उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से मजबूत होने के बावजूद प्रदेश के लोगों को न्याय के लिए 750 किलोमीटर दूर प्रयागराज जाना पड़ता है। जबकि इससे कम दूरी में लाहौर पहुंचते हैं।

65 साल से चल रहा आंदोलन

मेरठ बार एसोसिएशन के पूर्व महामंत्री देवकीनंदन शर्मा का कहना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना की मांग को 65 साल से अधिक समय से आंदोलन हो रहा है, हर बुधवार और शनिवार को अधिवक्ता अपनी मांग को लेकर न्यायिक कार्य से विरत भी रहते हैं, चुनाव आने पर चर्चाएं भी खूब होती हैं, लेकिन कुल मिलाकर हासिल ये है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इस अति महत्वपूर्ण जरूरत को धरातल पर आकार नहीं मिल सका। यहां बेंच की मांग सबसे पहले सन 1956 में उठी थी।

समय की बर्बादी और रुपयों की बचत

अधिवक्ता प्रवीण कुमार का कहना है कि मेरठ से प्रयागराज करीब 637 किमी दूर है, जबकि पाकिस्तान का लाहौर सिर्फ 458 किमी। ऐसे ही पड़ोसी राज्यों के उच्च न्यायालय भी प्रयागराज से आधी दूरी पर ही हैं। इनमें दिल्ली, चंडीगढ़, नैनीताल, शिमला, जयपुर व ग्वालियर आदि की दूरी 350 किमी के भीतर ही है। यदि मेरठ में बेंच मिल जाती है तो समय की बर्बादी और पैसे की बचत दोनों होगी तथा राहत मिलेगी। जनता को शीघ्र सस्ता व सुलभ न्याय चाहिये।

बड़ी आबादी को होगी सुविधा

अधिवक्ता सुधीर शर्मा कहते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 जिलों से 35 साल से ज्यादा समय से हाईकोर्ट बेंच की मांग उठ रही है। बेंच की स्थापना से मेरठ, बिजनौर, गाजियाबाद, शामली, बागपत, मुजफ्फरनगर, हापुड़, अलीगढ़, हाथरस, आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, एटा, अमरोहा, मुरादाबाद, रामपुर, सहारनपुर, बुलंदशहर समेत पश्चिम के सभी जिलों की बड़ी आबादी को सुविधा होगी और सस्ता न्याय मिल सकेगा। केन्द्र व प्रदेश दोनों जगह भाजपा सरकार सत्ता में है।

अटल ने भी संसद में उठाई थी मांग

वरिष्ठ अधिवक्ता ब्रजपाल दबथुवा कहते हैं कि हाईकोर्ट बेंच की मांग सबसे पहले 1956 में नेशनल कांफ्रेंस के अधिवक्ताओं ने उठाई थी। इसके बाद प्रदेश में सन 1976 में नारायण दत्त तिवारी की सरकार थी और उन्होंने भी खंडपीठ की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया था। इसके अलावा पश्चिम में बेंच की स्थापना को लेकर सन 1986 में नेता प्रतिपक्ष के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने भी संसद में मांग उठाई थी।

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