Thursday, March 5, 2026
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पर्यटन की पूंजी से किसका लाभ?

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नर्मदा घाटी के गोरा गांव में एक घाट के निर्माण के दौरान तीन आदिवासी श्रमिकों की मौत गंभीर और दुखद घटना है। इस घटना से सरदार वल्लभ भाई पटैल की ‘स्टैच्यू आफ यूनिटी’ कही जाने वाली मूर्ति को केंद्र बनाकर चल रहे पर्यटन के साथ धार्मिकता के कार्य में हो रही धांधली भी उजागर हुई है। क्षेत्र के आदिवासी नेताओं, कार्यकर्ताओं, कुछ विधायकों आदि के दबाव में मृतकों को मुआवजा राशि देने का वायदा किया गया था, लेकिन इससे इंसान की वापसी नहीं होती। आदिवासियों को आने वाले समय में और भी अधिक वंचना भुगतनी पड़ेगी, इस चेतावनी से आज के भुक्तभोगी भी हैरान है!

अक्तेश्वर गांव के ये तीन श्रमिक निर्माण मजदूर बनने के लिए मजबूर थे, जैसे सरदार सरोवर तथा अन्य परियोजनाओं से विस्थापित गुजरात के हजारों युवा भी हुए हैं। ग्राम गोरा उन छ: गांवों में से एक है जो बांध निर्माण की कॉलोनी से प्रभावित हैं। केवडिया, कोठी, वाघोडिया, लिमड़ी, नवागाम के साथ गोरा गांवों के आदिवासियों की कृषि-जमीन 60 से 200 रुपए प्रति एकड़ में 65 साल पहले 1961 में शासन ने ली थी। गांवों के लोगों ने हमें भी विस्थापित मानकर हमारा पुनर्वास करो की मांग रखते हुए कडा, अहिंसक संघर्ष किया था।

इन जमीनों पर सरदार सरोवर संबंधी केवडिया कॉलोनी, शासकीय कार्यालय, बांध निमार्ता कंपनी के स्टोर्स, 9 अतिथिगृह और हेलिपैड बनाए गए थे। जमीनों के अधिग्रहण के बावजूद ग्रामीणों को विस्थापित का दर्जा मंजूर न करने से 5 एकड़ कृषि-जमीन, मकान के लिए भूखंड जैसे लाभ नहीं मिले। सालों पहले 5 एकड़ के बदले 36000 रुपये घोषित करने का खेल असफल रहा। यह रकम चंद बूढ़े बाबाओं ने ले ली, लेकिन सैकड़ों आदिवासियों ने अपने पुर्नवास का हक दोहराया तो आखिर 2013 में एक शासकीय आदेश द्वारा वैकल्पिक कृषि-जमीन देने का आश्वासन मिला। बाद में इस आश्वासन से भी पलटे शासन ने जमीन के बदले 7.5 लाख रुपए (जिससे एक एकड़ जमीन खरीद पाना भी नामुमकिन है) प्रति हेक्टर की घोषणा की, जिसे नकारकर आज भी वंचित हैं, इन छ: गांवों के आदिवासी।

इस कहानी में बहुत सारी गैर-कानूनी बातें उजागर हुर्इं। जो जमीनें किसी ‘नहर’ के लिए, किसी बांध के लिए ली गईं वे उसी उद्देश्य के लिए उपयोग में नहीं ली गयीं, जबकि सरदार सरोवर बाद में बना। नर्मदा बांध स्थल भूकंप के खतरे को देखते हुए एक नहीं अनेक बार बदला गया, तो गोरा गांव में नहर कैसी बनती? उस जमीन को शासन के नाम करना ही बड़ा धोखा था। जो बची-खुची जमीनें उन परिवारों के हाथ में रहीं, उसे भी पर्यटन की परियोजनाओं से संबंधित ताजमहल होटल, एकता मॉल, वीआईपी सिटी, तितली गार्डन जैसे कार्यों के लिए पुलिस की दम पर पिछले कुछ सालों में छीन लिया गया।

गोरा के चंदूभाई और अंबाबेन के परिवार ने शुरू से ही इन छ: गांवों के अधिकार के लिए कमर कसकर योगदान दिया था। इनकी जमीनें, अन्य कुछ परिवारों की तरह, सूचित किए बिना शासन ने शूलपाणीश्वर मंदिर ट्रस्ट के नाम नामांतरित कीं। यह सीधा अतिक्रमण था। अंबाबेन के परिवार की इस जमीन पर अचानक पुलिसबल पहुंचा और उन्हें कोई आपत्ति, आवेदन या कानूनी कारवाई का मौका तक न देते हुए उनकी जमीन मंदिर के सामने घाट बनाने के लिए हड़प ली गई। क्या यह प्राचीन शूलपाणीश्वर मंदिर है? नहीं। जो मूल मंदिर गुजरात-महाराष्ट्र की सीमा पर, मणिबेली गांव में था, वहां की मूर्ति हटाने को साधु-संत, शंकराचार्य तक नकारते रहे।
सरदार पटेल की किसानी समर्थक, सांप्रदायिकता विरोधी विचारधारा क्या हम भूल सकते हैं?

करीब 3000 करोड़ रुपयों से देशाभिमान और राष्ट्रीय एकता के नाम पर खड़ा किया गया उन्हीं का पुतला एक आधार बन गया है, नए कानून को लाने का! ‘स्टैच्यू आफ यूनिटी एक्ट’ ने स्थानीय स्वराज्य संस्थाएं, ग्राम पंचायतों का हक तो खत्म किया ही, लेकिन डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा के साथ जुड़कर अनेक आदिवासी संगठनों के संघर्ष से 1996 में लागू हुआ पैसा कानून भी हटा दिया गया। यह कैसे हुआ? इससे कैसा, किसका, किसकी कीमत पर ‘विकास’ हुआ? गांवों का चित्र बदलकर, नगरीय क्षेत्र घोषित हुआ तो गुजरात के ही पूर्व मुख्यमंत्री सुरेशचंद्र मेहता ने उजागर किया कि इससे छ: नहीं, 72 गांवों के लिए खतरा निर्मित हो रहा है। आज उसकी हकीकत हर प्रकार से उजागर हुई है। जल, जंगल, जमीन, सभी के साथ किफायत से जरूरत पूरी करके जीने वालों को आज पुनर्वास मिलने पर भी कहीं पेयजल की कमी तो कहीं निरुपयोगी जमीन पाकर वंचना भुगतनी पड़ रही है। प्राकृतिक संसाधनों की भरपाई नगद राशि देकर नहीं होती, यह कौन मानेंगे? मुआवजे की राशि नकारकर, अपनी कानूनी, संवैधानिक और मानव अधिकारों के प्रति कटिबद्धता रखते हुए स्थानीय युवाओं में से उभरे अधिवक्ताओं ने गुजरात उच्च न्यायालय में याचिका दर्ज की है, लेकिन वहां भी कहां हो रही है सुनवाई? कहां, कब तक मिलेगा जवाब?

याद आती है, इन्हीं गांवों के कई सत्याग्रही शहीदों की, जिसमें बलिबेन, कपिला बेन, जसुबेन थीं, तो प्रभुभाई भी थे। नहीं भूल सकते, केवडिया जैसे गांव के घर-घर में घुसकर ठेकेदारों के गुंडों का हमला! कौन जानते हैं, ठाकोर भाई शाह जैसे, बांध परियोजना के श्रमिकों को संगठित करके, न्याय दिलाने के लिए सक्रिय श्रमिक नेता पर हुआ, वह जानलेवा हमला?

सरदार सरोवर के ही माध्यम से सामने आयी इस हकीकत के और भी कई पहलू हैं। मसलन-पर्यटन, स्टैच्यू जैसे करोड़ों के कार्यों को जोड़कर, बांध की लागत 1983 में 4200 करोड़,1988 में 6480 करोड़ तो आज 75000 करोड़ और कर्ज-ब्याज आदि मिलकर 90,000 करोड़ रुपए हो चुकी है। बांध के नीचेवास के इन छ: गांवों के अलावा, अरब सागर तक के 151 किलोमीटर क्षेत्र के भरुच, नर्मदा, बड़ौदा जिलों के गांव, खेत, उद्योग, मकान, दुकान के साथ मंदिर, तीर्थ भी 2013 से 2023 के बीच ध्वस्त होने का आघात भुगत चुके हैं। विकास की कीमत केवल पूंजी नहीं, जीवन, आजीविका, संस्कृति और प्रकृति के रूप में भी चुकायी जाती है। कच्छ-सौराष्ट्र की जनता ही मूल लाभार्थी घोषित थी, तो भी आज तक वह नहरों के अधूरेपन से, कंपनियों और महानगरों को दी गयी प्राथमिकता से वंचित हैं।

नर्मदा माता स्वयं भुगतती हैं आघात, समुद्र का पानी अंदर घुसने से, 2013 से, 60 किलोमीटर तक खारेपन से बरबाद होने से! जब 450 कंपनियों को मध्य-गुजरात से कच्छ तक लाभ मिलता है तो स्मृति उभर आती है, संविधान के प्रति कटिबद्ध न्यायमूर्ति जैसे हमें दिखाई देते रहे गिरीशभाई पटेल की किताब की—किसका लाभ, किसकी हानि? आज भी जरूरी है, उसी सवाल का जवाब! पर्यटक तो नहीं उठाएंगे ऐसा सवाल, नहीं जानेंगे स्थानीय निवासियों का हाल! सरदार पटेल होते तो वे निश्चित उठाते आवाज, वे नहीं मानते केवल पुतले का साज, पर्यटन का मौज-मजाक!

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