
देश की राजधानी दिल्ली से एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है जिससे हर कोई हैरान व विचलित सा हो गया है। मामला सीधे मानव जीवन से जुडा और यह दिल्ली वालो पर प्रहार भी माना जा रहा है। जोनल इंटीग्रेटेड पुलिस नेटवर्क (जिपनेट) के आंकड़ों के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लगभग 8000 लोग लापता हो गए हैं, जिनका अभी तक कोई सुराग नहींं लगा। लापता लोगों में महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं। हैरानी की बात ये है कि ये संख्या 1 जनवरी से 23 जुलाई तक की है। यानी 7 महीने में करीब आठ हजार लोगों का अब तक पता नहींं चल सका। देश की सबसे सुरक्षित कहे व समझे जाने वाली दिल्ली की यह स्थिति है तो बाकी राज्यों के विषय में सुरक्षा को लेकर सोचना बेमानी सी लग रही है।
पीड़ा तब हुई जब इतनी बड़ी घटना को लेकर शासन-प्रशासन की ओर से किसी भी छोटे-बडे नेता व अधिकारी के बयान नहीं आया और यदि मीडिया ने बात करने की कोशिश भी तो किसी ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। बीते दिनों पूर्वी दिल्ली के सीमापुरी इलाके के अंतर्गत कुछ पत्रकारों ने भिखारियों के एक अड्डे पर रिपोर्टिंग करनी चाही लेकिन भिखारियों ने उन पर हमला कर दिया। पत्रकारों का उद्देश्य यह था कि जिन बच्चों व लोगों से भीख मंगवाई जाती है आखिर वे कौन हैं? लेकिन वे अपने मिशन पर कामयाब न हो सके। पत्रकारों ने इस मामले की पुलिस में शिकायत की लेकिन पत्रकारों के अनुसार वहां पुलिस भी जाने से डरती है और वह न जाने उन पर कार्यवाही करने में असक्षम क्यों है?
दरअसल कुछ पत्रकारों को इस बात का शक है कि जो लोग गायब हो जाते हैं, उनसे भीख मंगवाई जाती है व अन्य किसी घिनौने काम करने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह मानव तस्करी का सबसे बड़ा उदाहरण भी है। बहरहाल, ये आंकड़े आने के बाद दिल्ली की जनता में एक भय का माहौल है और इसके बाद लोगों ने यह ही तय किया है कि अपना व अपने बच्चों की सुरक्षा का स्वयं ही ध्यान दिया जाए तो बेहतर है। कूडा चुगने वाले, कबाड़ी वाले या सर्वे के नाम पर आपको सुविधा देने या बिना वजह पानी व बिजली या अन्य किसी की जांच करने वाले लोगों से सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि सबसे ज्यादा ऐसी घटनाओं को इस ही तरह के लोग अंजाम देते हैं। इस तरह के लोग पहले रेकी करते हैं फिर उसके बाद शिकार करते हैं। सीसीटीवी में सब कुछ देखने के बाद भी कुछ न होना बहुत सारे सवाल खड़े कर जाता है। क्या यह गैंग इतना पावरफुल है कि इस पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हो पा रही या कोई अन्य बड़ा कारण? यह तो अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है लेकिन इन आंकड़ों के आने के बाद सुरक्षा को लेकर कलई खुल गई।
महानगरों में जितनी सुविधाएं है, लेकिन रहने में उससे ज्यादा रिस्क भी बढ़ता जा रहा है। सिर्फ आंकड़ों की बात करें तो यह प्रत्येक दिन औसतन 35 से अधिक लोगों के लापता होने की गंभीर तस्वीर को उजागर करता है। यदि उत्तर पूर्वी जिले के बात करें तो कुल 730 मामले दर्ज किए गए, जो दूसरे स्थान पर है। इसके बाद दक्षिण पश्चिम जिले में 717 और दक्षिण पूर्व जिले में 689 और बाहरी जिले में 675 मामले दर्ज किए गए। जिपनेट के मुताबिक द्वारका में 644, उत्तर पश्चिम जिले में 636, पूर्वी जिले में 577 और रोहिणी जिले में गुमशुदगी के 452 ऐसे मामले दर्ज किए गए। मध्य जिले में 363 लोगों का सुराग नहींं मिल पाया है, जबकि उत्तर, दक्षिण और शाहदरा जिलों में क्रमश: 348, 215 और 201 लोग अब भी लापता हैं।
यदि अज्ञात शवों की बात करें तो एक जनवरी से 23 जुलाई के बीच 1,486 शव मिले, जिनमें से ज्यादा पुरुषों के थे। आंकड़ों के अनुसार, उत्तरी जिले में सबसे अधिक 352 शव मिले जिनकी शिनाख्त स्थापित नहींं हो सकी। इनमें कोतवाली, सब्जी मंडी और सिविल लाइंस जैसे इलाके शामिल हैं। इसी प्रकार मध्य जिले में 113, उत्तर पश्चिम में 93, दक्षिण पूर्व में 83, दक्षिण पश्चिम और उत्तर पूर्व में 73-73, बाहरी में 65, पूर्व और नई दिल्ली में 55-55, पश्चिम और बाहरी उत्तर में 54-54, रोहिणी में 44, शाहदरा में 42, द्वारका में 35, दक्षिण में 26 और रेलवे में 23 शव मिले, जिनकी शिनाख्त नहींं हो सकी।
जिपनेट एक केंद्रित डेटाबेस है जिसका इस्तेमाल कानून प्रवर्तन एजेंसियां लापता व्यक्तियों और अज्ञात शवों का पता लगाने के लिए करती हैं। यह डेटाबेस कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का डेटा संकलित करता है। इन आंकड़ों से यह तो तय हो जाता है कि पूरी दिल्ली में मानव जीवन पर प्रहार हो रहा है। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों पर कई तरह के सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं। किसी भी सरकार व प्रशासन का पहला नियम नागरिकों को सुरक्षा देना है और यदि ऐसा नहीं हो पा रहा है तो यह निराशाजनक स्थिति पैदा करता है इसलिए ऐसे मामलों में सभी को अपने स्तर पर सक्रियता दिखानी होगी।

