Sunday, April 12, 2026
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क्या बसपा का विकल्प बनेगी आसपा

 

SAMVAD


dr.lalit kumar 2यूपी की दलित राजनीति जो पिछले डेढ़ दशक से ढलान पर थी। चंद्रशेखर आजाद ने नगीना लोकसभा सीट पर डेढ़ लाख मतों से जीत हासिल करके दलित राजनीति को एक बार फिर से पटरी पर ला खड़ा किया है। वह बहुजन समाज जो हाशिए पर जा चुका था, उसमें फिर से एक उम्मीद की किरण जगी है। बहुजन समाज में जहां बसपा को लेकर भारी असंतोष के स्वर उठने लगे थे। उसी बहुजन समाज को अब एक लंबे अरसे के बाद एक ऐसा दलित नेता मिला गया है, जो संसद में उनके हक और अधिकार की आवाज को मजबूती के साथ रखने का काम करेगा।
चंद्रशेखर आजाद ने जो रिकॉर्ड बनाया, उसने सत्ता एवं विपक्षी खेमे में भी बेचैनी बढ़ा दी है। चंद्रशेखर आजाद नगीना लोकसभा सीट पर पिछले एक साल से जनता के साथ संपर्क में रहकर काम कर रहे थे। वह चुनावी सभाओं में बीजेपी सरकार की नीतियों और दलित समाज पर बढ़ते अत्याचार के प्रति जनता को समझने में काफी हद तक कामयाब हुए हैं। उन्होंने भाजपा को करारी शिकस्त देकर यूपी में अपनी राजनीति को एक नई धार देने की कोशिश की है। वह लगातार भाजपा सरकार के खिलाफ हमेशा बोलते रहे हैं। बीजेपी सरकार के कई बड़े मंत्रियों में जहां नगीना सीट पर अपनी पार्टी के लिए खूब प्रचार किया, तो वहीं बसपा कॉरिडीनेटर आकाश आनंद ने भी एक रैली के दौरान चंद्रशेखर पर कई बड़े आरोप लगाते हुए कहा था कि यहां कोई आजाद चुनाव लड़ रहा है, जो समाज के युवाओं को गुमराह करके उन पर झूठे मुकदमे कराकर गायब हो जाता है। लेकिन आकाश आनंद को चंद्रशेखर आजाद की लोकप्रियता का शायद अंदाजा नहीं है कि वह शख्स है जो कितनी बार यातनाएं और तमाम चुनौतियों को पार करते हुए चुनाव लड़ रहा है। जिसके सिर पर कोई न कोई हाथ था और न राजनीति का कोई गॉडफादर। वह अकेले इस कारवां में एक मील का पत्थर साबित हुआ है।

बहुजन समाज के बीच चंद्रशेखर की लोकप्रियता ऐसे ही नही बनी है, उसने समाज के बीच अपने को केंद्र में रखकर जिस तरह से खुद को सींचा है। वह कोई एक दिन का खेल नही है। इस जीत तक पहुंचने के लिए उसने दिन रात कड़ी मेहनत की हैं। जेल की सलाखों के पीछे रहकर जो यातनाएं चंद्रशेखर ने इस दौर में झेली है। शायद ही कोई दलित नेता ऐसे हालात में जी पाता। बसपा संस्थापक कांशीराम साहब ने भी अपने शुरूआती दौर की राजनीति में बहुत सी चुनौतियों का सामना किया। उनका भी राजनीति में कोई गॉडफादर नहीं था, लेकिन उन्होंने भी समाज को जोड़ने के लिए दिन-रात मेहनत की थी। शुरुआती दौर में बसपा को भी कई हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन धीरे-धीरे कांशीराम देश की राजनीति में ऐसे छाए कि वह विरोधी दलों के लिए परेशानी का सबब बनने लगे थे। इसलिए वह बसपा को एक राष्ट्रीय पहचान दिलाकर देश की राजनीति में कूद पड़े थे। जिस वजह से पूरे देश के बहुजन समाज में जागरुकता का उद्भव हुआ और फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

नगीना लोकसभा सीट जीतकर आजाद समाज पार्टी ने बसपा की राजनीति पर भी कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। तमाम संसाधन होने के बावजूद भी बसपा अपनी जीती हुई सभी दस सीटों में से एक भी सीट नहीं जीत पाई। वर्ष 1989 के अपने चुनावी शुरुआत के बाद से यह बसपा का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है। पार्टी को केवल 2.07 प्रतिशत वोट शेयर ही मिले हैं। बीएसपी ने उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों पर 424 उम्मीदवार उतारे और अकेले ही चुनाव लड़ने का फैसला किया। वर्ष 2009 में पार्टी ने 20 सीटों पर जीत हासिल करके सबको चौंका दिया था। बसपा ने 1989 में पहला लोकसभा चुनाव लड़ा था। जिसमें पार्टी ने 245 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करके मात्र तीन सीटों पर 2.07 प्रतिशत वोट शेयर के साथ जीत हासिल की थी। अब ऐसे में बसपा संगठन पर कई सवाल खड़े होने लगे हैं कि पार्टी का भविष्य क्या होगा? इस बार बसपा ने गठबंधन न करके अकेले चुनाव लड़ने का जो फैसला किया, उससे जनता को लगने लगा था कि कहीं बसपा भाजपा की बी टीम बनाकर काम तो नहीं कर रही है! इसलिए बहुजन समाज पार्टी का वोट बैंक गठबंधन की ओर खिसक गया और यूपी की जनता ने बसपा को नकार दिया है। यही कारण रहा है कि जहां-जहां बीजेपी ने जीत हासिल की है। वहां दलित मतदाताओं ने गठबंधन को वोट न करके सीधे बीजेपी को फायदा पहुंचाया है। अगर बसपा गठबंधन के साथ रहकर चुनाव लड़ती तो हो सकता है कि बसपा की लाज बच जाती। लेकिन बीएसपी ने खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है।

वेस्ट यूपी की राजनीति में चंद्रशेखर आजाद ने अपनी जो चमक बिखेरी है, उससे दलित समाज में एक उम्मीद तो जरूर जगी है। चंद्रशेखर आजाद आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति का एक मजबूत चेहरा बनकर उभरेंगे। इसलिए बहुजन समाज अब बसपा को दरकिनार करके आजाद समाज पार्टी की तरफ शिफ्ट हो सकता है। चंद्रशेखर आजाद को भले इस चुनाव के किसी दल का साथ न मिला हो, लेकिन वह अपने दम पर समाज को एकजुट करने में कामयाब जरूर हुआ हैं। नगीना के रण में यह शख्स अकेले ही डटकर खड़ा रहा। उसके चुनाव प्रचार में कोई बड़ा चेहरा नहीं था। जिनको यह लग रहा था कि आजाद समाज पार्टी बिना पब्लिक फेस के चुनाव नहीं जीत सकती। उसके बावजूद भी आजाद ने उस मिथक को तोड़ने का काम किया है। आजाद समाज पार्टी अब आने वाले समय में पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक मजबूत ताकत के साथ चुनाव लड़ेगी।


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