Friday, April 3, 2026
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क्या ममता करेंगी फिर से धमाल?

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अब जब चुनाव की तारीखें घोषित हो चुकी हैं और सभी राजनीतिक दलों ने अलग-अलग राज्यों में अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं तो ऐसे में आज सारा विमर्श इस बात पर आ टिकता है कि क्या इन राज्यों में कहीं पर सत्ता विरोधी लहर (एंटी कंबेंसी) चल रही है और क्या वहां विपक्ष उसका फायदा उठा पाएगा?

पांडिचेरी और केरल में हर पांच साल में कुछ अपवादों के साथ सरकार बदलने की परंपरा रही है और संभावना भी उसी तरफ संकेत कर रही है। केरल में इस समय चुनाव प्रचार में कांग्रेस को क्षीण बढ़त दिखाई दे रही है और राहुल एवं प्रियंका वहां बहुत मेहनत कर रहे हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन की सफलता बहुत कुछ वामदलों के काडर की मेहनत पर और अल्पसंख्यक मतदाताओं पर निर्भर करेगा? भाजपा भरपूर कोशिश करने के बावजूद भी अभी वहां उल्लेखनीय मजबूती हासिल नहीं कर पाई है और त्रिवेंद्रम के आसपास सिमटी हुई है।

असम में हेमंता बिस्वा शर्मा ने अपने कार्यकाल में राष्ट्रवाद, मुस्लिम जनसंख्या, बांग्लादेशी घुसपैठ का हलुआ तैयार करके भाजपा के लिए एक सुदृढ़ वोटबैंक तैयार कर दिया है जिसके दम पर भाजपा एकबार फिर से ड्राइविंग सीट पर है। कांग्रेस अपनी आंतरिक खींचतान और अल्पसंख्यक प्रेम के चलते अभी भी एक सीमित वर्ग तक ही सिमटी हुई है। इसके कुछ प्रभावशाली नेता भी दल छोड़ कर जा चुके हैं। ऊपरी असम और बोड़ों क्षेत्रों में उसे कुछ समर्थन की अपेक्षा है। मुस्लिम मतदाता भी वहां कांग्रेस और मौलाना बदरुद्दीन अजमल के दल के बीच बंटा हुआ है और अब यदि हैदराबादी ओवैसी का दल भी यहां बगैर गठबंधन के उतर गया तो मुस्लिम मतों में बड़ा विभाजन हो सकता है। भाजपा की एक बड़ी ताकत वहां बिहार उत्तरप्रदेश के अप्रवासी श्रमिक तथा राजस्थानी मारवाड़ी समुदाय भी हैं।

पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद बीजेपी के पास 77 सीटें हैं। बीजेपी ने उत्तर बंगाल और जंगलमहल के आदिवासी इलाकों के साथ-साथ कोलकाता के उपनगरीय इलाकों में अपनी पैठ बढ़ाई थी। तृणमूल ने पिछले चुनावों में 215 सीटों के साथ भारी बहुमत प्राप्त किया था और लगभग सारे बंगाल में और विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में उसने अपने प्रभाव को कायम रखा था। भाजपा वहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की तर्ज पर कई वर्षों से अपना काडर तैयार करने की कोशिश कर रही है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसमें पूरी तरह से जुटा हुआ भी है। उनकी इसी मेहनत के कारण भाजपा का वोट प्रतिशत निरंतर बढ़ता जा रहा है किंतु निर्णायक बहुमत के लिए उसे तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के प्रभाव क्षेत्र में प्रवेश करना होगा जिसमें वो अभी तक सफल नहीं हो पाई है।

ममता और तृणमूल का प्रभाव अल्पसंख्यक समुदाय, बंगाली संभ्रांत हिंदू परिवार और गरीब वर्ग के मजदूर तथा मछुआरे समुदाय में है जबकि भाजपा अभी भी प्रवासी श्रमिकों/ व्यापारियों तथा ओबीसी वर्ग तक सीमित है। हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का मुद्दा बंगालियों पर प्रभाव नहीं डालता क्योंकि राष्ट्रवाद उनके डीएनए में है और अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति में अपनी भागीदारी पर उन्हें सदा से गर्व रहा है। बंगालियों का हिंदुत्व उत्तर भारतीयों के हिंदुत्व से अलग है। बंगाली लोग दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा, काली पूजा, और जात्रा से अपने धार्मिक संस्कार पूर्ण करते हैं और रामजन्म भूमि या कृष्ण जन्मभूमि विवाद, लव जिहाद या गोहत्या मामले उन्हें बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करते और वे इन्हें धार्मिक की जगह राजनीतिक मुद्दे मानकर उपेक्षित कर देते हैं। बस यहीं भाजपा मात खा जाती है।

ममता द्वारा समय-समय पर उठाए जाने वाले बंगाली अस्मिता के विषय जरूर उसे उद्वेलित करते हैं और जब नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह पर वो बंगाल को गुजरात का उपनिवेश बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाती हैं तो मामला और कठिन हो जाता है। इस चुनाव में भाजपा को नि:संदेह एक बड़ा फायदा मतदाता सूचियों के एसआईआर से होने वाला है जहां बहुत बड़ी मात्रा में कथित तृणमूल समर्थकों के नाम विभिन्न कारणों से मतदाता सूची से विलोपित कर दिए गए हैं।

जहां तक धन-बल का सवाल है तो दोनों ही दल किसी से कम नहीं हैं। जहां भाजपा के पास उद्योगपतियों द्वारा दिया गया बेहिसाब धन है तो दूसरी तरफ ममता बनर्जी के दल के पास भी कट मनी के रूप में ठेकेदारों से प्राप्त भारी धनराशि है। कार्यकर्ताओं की भी दोनों ही तरफ कोई कमी नहीं है। बंगाल के चुनावों में कांग्रेस और वामदल अभी भी हाशिए पर पड़े हैं और इनके संगठन में निराशा फैली हुई है। इनके पास इस समय ना तो प्रभावशाली नेतृत्व है, ना कार्यकर्ता और ना धन। हां यदि कांग्रेस कुछ ज्यादा दम लगाकर लड़े तो वह भाजपा के सवर्ण वोटबैंक में कुछ सेंध लगा सकती है वहीं दूसरी ओर वामदल तृणमूल के गरीब गुरबे श्रमिक वर्ग में नुकसान कर सकते हैं ।

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