
आगामी कुछ दिनों में पांच राज्यों में विधानसभा होने जा रहे हैं जिसको लेकर पक्ष-विपक्ष पूरी ताकत लगाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। लेकिन इन चुनावों में सत्ता पक्ष के लिए चुनौती थोड़ी ज्यादा इसलिए बढ़ी हुई है, क्योंकि इस समय ऊर्जा संकट को लेकर माहौल बना हुआ है। अब सवाल यही है कि क्या विपक्ष धरातल व तथ्यात्मक मुद्दों के साथ ऊर्जा संकट का तड़का लगाकर सत्ता पक्ष को घेरता है और वहीं इसके विपरीत सत्ता पक्ष यह बताने में सार्थक हो पाती है कि सब ठीक है।
जैसा कि मिडिल ईस्ट तनाव की वजह से देश में ऊर्जा संकट के दौरान बिजली, कोयला, पेट्रोल, या गैस जैसे ऊर्जा संसाधनों की मांग उनकी कुल आपूर्ति से थोड़ी अधिक हो गई, जिसकी वजह से ईंधन की कमी के कारण उद्योग, परिवहन और घरेलू उपयोग की चीजों पर थोड़ा प्रभाव गया और यदि यह प्रकरण लंबा चला तो स्थिति थोडी चिंताजनक हो सकती है।
इन मुद्दों को चुनावी रंग देकर लेकर विपक्ष लगातार मौजूदा सरकार को घेरने में लगा हुआ है लेकिन फिलहाल केंद्र सरकार ने अभी तक तो स्थिति को नियंत्रित किया हुआ है। इस मामले को लेकर जनता को यह समझना होगा कि यह कोई स्थायी समस्या नही है और यह आज नही तो कल खत्म हो जाएगी, लेकिन वोट देने वाले लोगों को यह समझना होगा कि वह अपने उन मुद्दों पर वोट करें, जिससे वे पांच सालों से संतुष्ट या असुंष्ट रहे हैं।
जनता को यह भी समझना होगा कि यह एक वैश्विक स्तर की आपदा है, जिसके निवारण के लिए विश्व पटल पर प्रयास भी किया जा रहा है और यदि इस वजह से कुछ समय की लिए देश गति धीमी अर्थात महंगाई बढ़ना या संसाधनों में कमी भी आ जाती है तो इस मुद्दे को लेकर वोट करने पर अपनी विचारधारा न बांधे क्योंकि आप जिन मुद्दों को बीते पांच वर्षों से गहनता के साथ समझ रहे हैं,चाहे हो सकारात्मक हो या नकारात्मक उस पर अपनी विचारधारा के साथ अपने मत का प्रयोग करना चाहिए। जनता को वोट डालते समय अपनी तरक्की, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, और स्थानीय विकास जैसे सड़क, बिजली, पानी जैसे मुख्य मुद्दों को मध्यनजर रखते हुए अपने मत का प्रयोग करना चाहिए।
उम्मीदवार की ईमानदारी, उसकी विचारधारा और उसके द्वारा किए गए वादों की व्यावहारिकता पर बहुत कुछ निर्भर करता है क्योंकि कई ऐसे नेता भी होते हैं जो पार्टी में रहते हुए उस विचारधारा के विपरीत होते हैं, लेकिन अपनी क्षेत्रीय जनता के लिए काम बहुत बेहतर करते हैं। इन चुनावों में कई मौजूदा मुख्यमंत्रियों के लिए भी यह मुकाबला ऐतिहासिक साबित हो सकता है। ममता बनर्जी चौथी बार लगातार सत्ता में लौटने का लक्ष्य लेकर मैदान में हैं। वहीं एमके स्टेलिन दूसरी बार लगातार जनादेश पाने की कोशिश कर रहे हैं।
हेमंत बिसवा भी असम में दूसरी बार सरकार बनाने की उम्मीद कर रहे हैं, जबकि पिनाराई विजयन केरल में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का रिकॉर्ड बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वैसे तो हर राज्य का चुनाव महत्वपूर्ण माना जाता है लेकिन उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल का चुनाव पक्ष-विपक्ष के लिए वर्चस्व की लडाई मानी जाती है और जैसा कि पश्चिम बंगाल का चुनाव फिर से हर बार की तरह मुद्दों से कहीं परे होगा।
भारत युवाओं का देश हैं और सबसे ज्यादा युवा भी हमारे यहां ही हैं। पूरा जिंदगी पड़ी होती है मौज-मस्ती के लिए लिए मात्र एक घंटा निकाल कर वोट डालना उनको बहुत भारी लगता है। युवा चर्चा तो ऐसे करते हैं मानो वह अपनी पूर्ण रूप से स्थिति दर्ज कराएंगे लेकिन चुनाव वाले दिन बिल्कुल गायब हो जाते हैं।
दरअसल अब दौर बिना किसी की गुणवत्ता की जांच के आधार पर चल पड़ा और भेड़चाल का ट्रेंड ज्यादा है। यदि किसी ने कॉलेज या आॅफिस में कह दिया वह तो चुनाव वाले दिन बाहर जा रहा है तो अधिकतर लोग उसको ही फॉलो करने लगते हैं और अपने वोट को व्यर्थ करने में बिल्कुल भी नही हिचकिचाते। जितनी देखा जा रहा है कि चुनाव पहले से ज्यादा रोमांचक होते जा रहा है जिसका सबसे बड़ा कारण सोशल मीडिया माना जाता है चूंकि हर छोटी व बड़ी घटना तुरंत आपके मोबाइल पर आ जाती है कि जिससे किसी भी पार्टी व नेता का घटना अनुसार सकारात्मक व नकारात्मक तस्वीर बन जाती है। इसके अलावा इतिहास व वर्तमान को समझने के लिए तुरंत गूगल भी किया जा सकता है लेकिन इस बातों के लिए राजनीति में रुचि लेना बहुत जरुरी है।
आप देश के भविष्य के लिए जागरुक हैं तभी आप समझ पाएगें अन्यथा सब व्यर्थ है। देश की तस्वीर बदलने के लिए उपस्थिति दर्ज कराना उतना ही अनिवार्य है जितना सब्जी में नमक डालना। इसके अलावा घर के बड़े-बुजुर्ग भी युवाओं व बाकी सदस्यों को वोट डालने के लिए प्रेरित करें जिससे उनकी वोट के प्रति रुचि बनी रहे। कुछ लोग कहते हैं कि उनकी राजनीति में कोई रुचि नही तो वह इसलिए वोट नही डालते लेकिन उनको समझना होगा कि वोट डालने से वह राजनीतिज्ञ नही बन जाते।

