
चौदह सितंबर नजदीक आते ही ‘हिंदी-हिंदी’ का हो-हल्ला मचने लगता है। हिंदी दिवस, सप्ताह, पखवाड़ों के आयोजन होने लगते हैं। सितंबर बीतते-बीतते हम फिर वहीं आ जाते हैं, जहां से शुरू हुए थे। यानी फिर ‘अंग्रेजी-अंग्रेजी’ करने लगते हैं। भाषा के मामले में थोड़ा सकारात्मक और व्यावहारिक होकर बात करें तो यह माना जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में हिंदी का प्रचार-प्रसार बढ़ा है और यह आम बोलचाल की भाषा के रूप में देश में सबसे बड़ी भाषा के रूप में उभरी है। लेकिन सत्ता और शासन के क्षेत्र में आज भी अंग्रेजी का दबदबा है। देश के सरकारी और गैर सरकारी संस्थान में उच्च पद पर आसीन होने की बात हो या किसी प्रतियोगी परीक्षा में बैठना हो, अंग्रेजी के प्रति अज्ञानता पहले ही अयोग्य साबित कर देती है। शुरू से ही हमारे बच्चों के दिमाग में यह बात बैठा दी जाती है कि बगैर अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजियत के जीवन के किसी भी क्षेत्र में श्रेष्ठ नहीं हुआ जा सकता। हमें याद रखना होगा कि कोई भाषा किसी दूसरी भाषा का विकल्प नहीं हो सकती। मातृभाषा का तो कोई विकल्प हो ही नहीं सकता। मां के दूध के साथ परिवार में जो भाषा सीखी जाती है, उसकी जगह कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती। दूसरी भाषा सीखी भी जाएगी तो वह ‘अपनी’ नहीं ‘अतिरिक्त’ होगी। किसी भी भाषा को अपनाने का अर्थ है उसकी सोच, परंपरा और संस्कृति को अपनाना। भाषा की पराधीनता उतनी ही अशुभ है, जितनी अंग्रेजों की गुलामी।
शीर्ष पर बैठे अनेक लोग इस बात की दुहाई देते हैं कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में हिंदी या अन्य किसी क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग से उन्नति नहीं की जा सकती। ऐसा होता तो एशिया के दो देश चीन और जापान की तकनीकी प्रगति पर सवाल उठाया जा सकता था, क्योंकि ये देश अपनी मातृभाषा का प्रयोग करते हुए ही कहां से कहां जा पहुंचे हैं। यदि आप यह सोचते हैं कि अंग्रेजी सीखे-जाने और प्रयोग में लाए बगैर देश नहीं चलाया जा सकता अथवा यही संपर्क भाषा और ज्ञान की एकमात्र ‘खिड़की’ है तो इतना जान लीजिए कि विश्वभर में 45 देश ही अंग्रेजी को जानते हैं, प्रयोग में लाते हैं, जबकि विश्व के 160 देश अंग्रेजी नहीं जानते, उसे प्रयोग में नहीं लाते। करीब सात हजार विभिन्न तरह की भाषाएं इस धरती पर बोली जाती हैं। इन 7000 भाषाओं में से 23 भाषाएं ही ऐसी हैं, जिन्हें आधा विश्व बोलता और प्रयोग में लाता है। जिस अंग्रेजी के वैश्विक संपर्क भाषा होने का जो गुणगान हम आए दिन करते हैं उसकी स्थिति इतनी अच्छी भी नहीं है। क्या रूस, जापान, कोरिया, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन आदि देशों से अंग्रेजी में बात की जा सकती है। वहां तो हमें उनकी मातृभाषा का दुभाषिया ही साथ रखना होगा, तभी उनसे बातचीत संभव हो पाती है।
गुलाम मानसिकता के चलते हिंदी के प्रचार-प्रसार और विकास के लिए ईमानदारी से प्रयास नहीं हुए। हिंदी का नाम लेते ही उसके दो रूप हमारे सामने आते हैं। एक राजभाषा हिंदी और दूसरी वह हिंदी, जो हमारी बोलचाल में नजर आती है। आज भी कोई सरकारी प्रपत्र हिंदी भाषा में आपके सामने रख दिया जाए तो यह इतना क्लिष्ट होता है कि इसे समझना मुश्किल है, उसमें आखिर लिखा क्या है। जब तक राजभाषा को अंग्रेजी के अनुवाद से मुक्ति नहीं दिलायी जाएगी, यह समस्या बनी रहेगी। दिक्कत यह है कि सत्ता-प्रतिष्ठानों पर काबिज अंग्रेजीदां अफसर यह होने देना नहीं चाहते। इसलिए यह अनुवाद की भाषा बरसों से चली आ रही है। व्यवहार में देखें तो बोलचाल व संप्रेषण की भाषा में जितना प्रवाह होगा, वह लोगों की जुबान पर जल्दी चढ़ेगी। वह रोजमर्रा के जितनी करीब होगी, लोगों का उसकी ओर आकर्षण उतना ही ज्यादा होगा और वह उतनी ही जल्दी अपनायी जाएगी।
हिंदी को सबसे बड़ा खतरा हिंदी क्षेत्रों में जन्मे, लेकिन वहां की जमीन से कटे इन्हीं अंग्रेजीदां बौद्धिकों से है। यदि सरकार हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के विकास के लिए बजट भी देती है तो इसे खर्चने वाले प्रशासनिक पदों पर ऐसे ही संभ्रांत बौद्धिक किस्म के लोग बैठे हैं जो पहले ही हिंदी के प्रति दुराग्रह पाले बैठे हैं। ऐसे में राजभाषा के प्रचार व विकास के लिए किए जाने वाला कोई भी आयोजन कर्मकांडी समारोहों की भेंट चढ़ जाता है, जबकि जरूरत निचले स्तर पर प्रयास करने की है। कई बार यह मान लिया जाता है कि मीडिया और फिल्मों ने हिंदी को अंग्रेजी के समकक्ष खड़ा कर दिया है और अधिसंख्य बार यह अंग्रेजी पर हावी होती दिखती है। यहां हमें इस बात को समझना होगा कि आज बोलचाल में जो हिंदी बोली-कही-लिखी जा रही है, वह बाजार के दबावों से प्रेरित है।
हम भले ही हिंदी समझने और बोलने का डंका पीटें, लेकिन ज्योंही किसी की योग्यता या व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया जाने लगता है, तो वह हिंदी को हिकारत से देखने लगता है और अंग्रेजी के प्रति उसका प्यार उमड़ने लगता है। अपनी भाषा में बोलना, समझना चाहिए की रट लगाते हुए अंतत: हमें यही कहना पड़ता है कि आगे बढ़ने के लिए तो अंग्रेजी का ही सहारा लेना होगा और बिना अंग्रेजी जाने हमारा काम नहीं चलेगा। यही दोगली मानसिकता हमें न तो पूरी तरह हमें मातृभाषा में पारंगत करती है और न ही अंग्रेजी में।
विडंबना यह है कि भाषाई गुलामी पर दुखी होने के बजाय हम आनंदित होते हैं। इस ऊहापोह से बचने के लिए हमें ‘त्रिभाषा’ फार्मूला अपनाना होगा यानी हर व्यक्ति को अपनी मातृभाषा के अलावा हिंदी और अंग्रेजी का ज्ञान होना चाहिए। जब ऐसा होगा तो कोई हिंदी भाषी किसी दक्षिण भाषी राज्य में जाएगा तो वहां की क्षेत्रीय भाषा समझने को लेकर खुद को इतना असहज महसूस नहीं करेगा, जैसा आज करता है।


