
पुतिन अगर युद्ध का अपराधी है तो जेलेन्स्की भी उकसावे के आरोप से बच नहीं सकता। कह लीजिये कि आज जो कुछ यूक्रेन में हो रहा है, उसके लिए जेलेन्स्की बड़ा नहीं तो छोटा अपराधी तो है ही।
अगर मैं जेलेन्स्की होता तो मैं स्वयं से कुछ प्रश्न पूछता। पहला प्रश्न यह कि क्या मेरे पास न्यूक्लियर हथियार हैं जो दूसरे मुल्कों को मेरे देश पर चढ़ाई करने से आगाह करेंगे? जवाब होता, नहीं। दूसरा प्रश्न यह कि क्या मैं नाटो या ईयू का सदस्य हूँ, जो वो मुझ पर आक्र मण होने की स्थिति में मेरा बचाव करने पर मजबूर होंगे? जवाब फिर होता, नहीं। तीसरा प्रश्न यह कि क्या मैं इस स्थिति में हूँ कि रूस जैसी महाशक्ति से लड़ाई मोल ले सकूँ और उसे उकसा सकूं? एक बार फिर जवाब नहीं ही होता। चौथा सवाल सबसे जरूरी है|
अगर रूस मेरे देश पर आक्र मण कर देता है तो इसका पहला शिकार कौन बनेंगे? यूक्रेन के वो निर्दोष नागरिक जिनका भू-राजनीति के पचड़ों से कोई सरोकार नहीं है और जो केवल एक सुखी, संतुष्ट पारिवारिक जीवन बिताना चाहते हैं? इस बार आखिरकार हमें हां में जवाब मिलता कि हां, इस तमाम तकरार के पहले शिकार यूक्रेन के लोग बनेंगे।
अगर मैं यूक्रेन का नेता हूं तो मेरी पहली जिम्मेदारी अपने लोगों की रक्षा करना है। रक्षा केवल आक्रमण से ही नहीं की जाती है, आक्रमण की स्थितियों को टालकर भी की जाती है। अगर आपके पड़ोस में आपसे शक्तिशाली दैत्य बैठा है तो आपको उसको चिढ़ाने से भरसक बचना चाहिए।
आज की स्थिति में यूक्रेन के लोगों के प्रति संवेदना जताना और यूक्रेन के राष्ट्रपति को नायक समझना- ये दो अलग बातें हैं। पहली बात पूर्णतया वैध है क्योंकि यह युद्ध एक मानव-त्रसदी है और पुतिन को तमाम प्रोवोकेशंस के बावजूद इससे दूर रहना चाहिए था किंतु यूक्रेनी राष्ट्रवाद का जयघोष करने (यह उन मित्रों के लिए जो अपनी डीपी, इंट्रो, कवर वगैरा में यूक्रेन का झण्डा लगा रहे हैं, बिना यह जाने कि उसके क्या मायने हैं) और जेलेन्स्की को नायक समझने की कोई तुक नहीं है।
एक अति पर वे हैं जो यह कहकर पुतिन का समर्थन कर रहे हैं कि चूंकि रूस भारत का सामरिक सहयोगी है, इसलिए हम उसके अपराधों को नजरअंदाज करके उसके साथ खड़े होंगे। दूसरी अति पर वे हैं जो यूक्रेनी राष्ट्रवाद और जेलेन्स्की का गुणगान कर रहे हैं, केवल इसलिए कि वो यहाँ पर विक्टिम दिखलाई देते हैं। विक्टिम तो वास्तव में व्यक्ति है, आमजन हैं, निर्दोष नागरिक हैं। जो इन दोनों अतियों को बरजकर मनुष्य के दुखों पर दृृष्टि रखते हैं, वे राजनैतिक रूप से छले नहीं जाते।
यह यूक्रेनी राष्ट्रवाद क्या है? अनेक मित्रों को पता नहीं होगा कि इसमें नव-नात्सीवादी तत्व घुसे हुए हैं। इनमें एंटी-सेमेटिक भी हैं, जो होलोकास्ट का समर्थन करते हैं। पुतिन इन्हें ही फासिस्ट और बैंडेराइट कह रहे हैं। यह बैंडेराइट शब्द स्तेपान बैंडेरा के नाम पर आधारित है जो यूक्रेन का धुर-राष्ट्रवादी नेता था और नात्सियों का समर्थक था। दूसरे विश्वयुद्ध में जब नात्सी जर्मनी ने सोवियत संघ पर आक्र मण किया तो उसने यूक्रेनी-अलगाववाद का नारा बुलंद किया और नात्सियों का सहयोगी बनने की पेशकश की।
वह कम्युनिज्म का घोर विरोधी था। ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों से भी उसके ताल्लुक थे। 2010 में इसी बैंडेरा को यूक्रेन ने मरणोपरान्त हीरो आफ द यूक्र ेन का अवार्ड देकर रूस को चिढ़ाने की कोशिश की। यूक्रेन वास्तव में उस पिद्दी की तरह है जो कदकाठी में अपने से बड़े पहलवान को ललकारता रहता है और पिट जाने पर पीड़ित होने का दिखावा करता है।
आज जब पुतिन यूक्रेन पर यह आरोप लगाते हैं कि वह अपने नागरिकों को ‘ूमन-शील्ड की तरह इस्तेमाल कर रहा है तो यह बेबुनियाद नहीं है। युद्ध की नैतिकता सिविलियन्स पर प्रहार करने की इजाजत नहीं देती लेकिन जेलेन्स्की अपने नागरिकों को हथियार बाँटकर उन्हें मृत्यु की ओर धकेल रहे हैं। इससे आपराधिक वृत्ति के सिविलियन्स भी अवसर का लाभ उठा रहे हैं और हथियारों का गैरजायज इस्तेमाल कर रहे हैं।
किसी नेता का काम अपने नागरिकों का सैन्यीकरण करना नहीं है क्योंकि प्रशिक्षित सेना के सामने लड़ाई में वो पलभर भी टिक नहीं सकेंगे और इससे मृतकों की संख्या में इजाफा ही होगा। इसके बजाय उसका काम अपने नागरिकों की रक्षा करना है और अपनी कूटनीति को इतना निष्णात बनाना है कि युद्ध की स्थितियाँ ही निर्मित न हों।
इसमें तो किसी को संदेह नहीं कि जेलेन्स्की पश्चिमी ताकतों के हाथ की कठपुतली हैं। इस कठपुतली ने अपने देशवासियों को एक महान-संकट में झोंक दिया है। यूक्रेन में अतीत में भी ऐसी कठपुतलियाँ पश्चिम ने बैठाई हैं। 2014 में यूक्रेन में हुए एक आंदोलन के बाद एक निर्वाचित राष्ट्रपति को हटाकर यूक्रेनी राष्ट्रवाद का नारा बुलंद करने वाले व्यक्ति को कुर्सी पर बैठा दिया गया। रूस का आरोप था कि यह आंदोलन अमेरिका की शह पर हुआ है|
ठीक उसी तरह जैसे इंदिरा गांधी ने सत्तर के दशक में भारत में उठ रहे विप्लवी स्वरों के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ बताया था। ये आरोप बेबुनियाद नहीं कहलाए जा सकते।
अमेरिका और पश्चिमी ताकतों की यह जानी-मानी युक्ति है कि वे संघर्षरत क्षेत्रों में आंदोलनों को हवा देकर सत्ता-परिवर्तन करवाते हैं और भू-राजनीतिक असंतुलन की स्थिति का लाभ उठाते हैं। अफ्रीका और मध्य-पूर्व एशिया में उन्होंने यह बहुत किया है। आज यूक्रेन में घट रही घटनाओं से भी वे मन ही मन प्रसन्न हो रहे होंगे क्योंकि इससे रूस न केवल कमजोर हो रहा है, नैतिक रूप से अपराधी भी दुनिया के सामने साबित हुआ है।
उसके विरोध में घृणा की एक लहर बही है। युद्ध से अमेरिका और पश्चिम ने परस्पर आर्थिक सौदों के अलावा कुछ गँवाया नहीं है, गंवाने वाले तो यूक्रेन के बेचारे आमजन हैं। अति है कि युद्ध शुरू होने के बाद भी जेलेन्स्की ईयू में शामिल होने के इरादे जताकर रूस को उकसाने से बाज नहीं आए। आ बैल मुझे मार की उक्ति इस व्यक्ति पर पूरी तरह सटीक बैठेगी।
यूरोप में भाषा, नस्ल, अतीत के साम्राज्यों के विघटन से उभरे नए राष्ट्रों और अलगाव के स्वरों से उपजे टकराव नए नहीं हैं लेकिन युद्ध में जाने की नौबत नहीं आए, यही प्रयास मेधावी राष्ट्राध्यक्षों का दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से रहा है क्योंकि उनकी पहली जिम्मेदारी अपने लोगों के प्रति है और युद्ध सबसे पहले इन्हीं लोगों पर प्रहार करता है।
भूमण्डलीकृत दुनिया में युद्ध यों भी पहले की तुलना में अब अनुपयोगी ही है। मानवीय-आधार पर भारतवासियों की सहानुभूति युद्ध की मार झेल रहे यूक्रेनवासियों के प्रति होनी चाहिए। उन रूसी सैनिकों के प्रति भी होनी चाहिए, जिन्हें युद्धाभ्यास के छल से यहां भेज दिया गया और अब वे ग्लानि में डूबे हैं। साथ ही अभिवादन के पात्र पूरी दुनिया के वे उदार-मानवतावादी आमजन भी हैं| इनमें रूसी लोग भी शामिल हैं|
जो इस युद्ध और पुतिन का विरोध कर रहे हैं किन्तु किसी को भूलकर भी पुतिन या जेलेन्स्की के प्रति अपनी निष्ठा नहीं प्रदर्शित करनी चाहिए। राजनीति राष्ट्रों को संचालित करती है और युद्धों को जन्म देती है जबकि मनुष्यता एक निरी निष्कवच भावना है जो वैयक्तिकता के सुखों-दुखों के बीच जीवन में गति करती है। ये दो भिन्न धाराएँ हैं और एक को दूसरी से मिलाने की वंचना एक भारी भूल से कम नहीं।
सुशोभित


