Saturday, February 21, 2026
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सक्षम विकल्प बने कांग्रेस

 

Samvad 41

 


Parshant Singh20 24 के आम चुनावों की तैयारियों को लेकर देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस राजस्थान के उदयपुर में तीन दिवसीय चिंतन शिविर का आयोजन करने जा रही है। जहां तक चुनाव का सवाल है, वह तो गुजरात, कर्नाटक, और हिमाचल प्रदेश में भी हैं, लेकिन कांग्रेस का चिंतन शिविर राजस्थान में आयोजित किया जा रहा है। शिविर को लेकर लोग तरह तरह के अर्थ भी निकाल रहे हैं। देखा जाए तो पिछले चुनावी नतीजों ने कांग्रेस आलाकमान को पूरी तरह से असहज किया है, इसमें दो राय नहीं है।
गौरतलब यह है कि पिछले दिनों 2024 के चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए पार्टी ने चुनावी रणनीतिकार प्रशान्त किशोर के साथ बैठक भी की थी। उस बैठक में प्रशान्त किशोर ने कांग्रेस के लिए एक पुनरुद्धार योजना और राज्यों के साथ-साथ आगामी लोकसभा चुनाव जीतने की खातिर रणनीति पेश की थी।

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लेकिन उस बैठक के कोई अच्छे नतीजे नहीं निकल सके। वह बात दीगर है कि इसे राजनीतिक विश्लेषकों ने एक अच्छा संकेत बताया और राजनीतिक दलों को प्रशांत किशोर से दूर ही रहने की सलाह दी। यह बात कटु सत्य है कि लोकतंत्र में एक सशक्त विपक्ष का होना बहुत जरूरी होता है। यह भी सही है कि देश में भाजपा को चुनौती देने की सामर्थ्य सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस में ही है।

असल में वर्तमान का नुकसान भविष्य के विनाश से ज्यादा बेहतर होता है। यह पार्टी को समझना चाहिए कि कांग्रेस क्षेत्रीय दल नहीं है। उनकी आज भी अखिल भारतीय स्तर पर न केवल मौजूदगी है, बल्कि अन्य की तुलना में उसकी सशक्त पहचान भी है। ऐसे में उसे खोई हुई सियासी जमीन हासिल करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए।

इसके लिए उसे कुछ कड़े फैसले करने होंगे जो बदलते वक्त की जरूरत है। दुख तो यह है कि कांग्रेस समय के साथ अपने आप को नई राजनीति में ढाल नहीं पा रही है और न ही अपनी नीतियों को जनता को समझा पा रही है। जबकि हरित क्रान्ति, श्वेत क्रांति, तमाम आईआईटी, आईआईएम आदि की सूत्रधार होकर भी कांग्रेस की छवि एक असहाय दल के जैसी बनी हुई है।

मौजूदा दौर में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और पलायन जैसी समस्याओं को लोग कांग्रेस की ही देन मानते हैं। जबकि इन समस्याओं के बारे में किए जा रहे दुष्प्रचार के बारे में अपना रुख साफ करते हुए कांग्रेस को अपनी नीति और आचरण से जनता का भरोसा जीतने का प्रयास करना होगा।

आज देश में हालत यह है कि पेट्रोल, डीजल की आसमान छूती कीमतें, महंगाई, दिनोंदिन बढ़ती बेरोजगारी के बावजूद लोग भाजपा को वोट कर रहे हैं। यह उसे समझना होगा कि इसका कारण क्या है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मोदी में देश की जनता का भरोसा कायम है। जरूरत है कि कांग्रेस पार्टी गांधी-नेहरू परिवार से इतर अपनी पहचान बनाने की ओर बढ़े।

कांग्रेस को चाहिए कि वह प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत हमले करना छोड़ उन्हीं मसलों पर ध्यान केंद्रित करे, जहां प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी असहज महसूस करती है या उनमें सरकार का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर है या उसका ग्राफ निरंतर गिरता जा रहा है। इससे न केवल कांग्रेस सही निशाना लगा पाने मे सक्षम हो सकेगी, बल्कि सरकार को भी सुधार के लिए प्रोत्साहित करने का काम करेगी जो लोकतंत्र मे एक रचनात्मक विपक्ष की भूमिका के लिए बेहद जरूरी भी है।

इससे जनमानस में कांग्रेस की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी। सच तो यह है कि कांग्रेस को अपने कार्यकर्ता के लिए ही नहीं बल्कि देश के लिए भी खुद अपने आप को बदलने की जरूरत है। कांग्रेस को पुराने सेवा दल को फिर से पुनर्जीवित करना होगा जिससे गांव-गांव में कार्यकर्ता न केवल बनें, बल्कि संगठन भी मजबूत हो सके। उन्हें यूथ कांग्रेस एवं एनएसयूआई को भी सशक्त करना होगा।

कभी- कभी कांग्रेस के कुछ नेताओं के द्वारा राष्ट्रीय भावनाओं के विपरीत वक्तव्य दिए जाने से भी जनता के बीच गलत संदेश गया है। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। अनुच्छेद 370 की वापसी की मांग से भी जनता आक्रोशित हुई। इससे कांग्रेस को बचना चाहिए था।

पार्टी को गंभीर सामाजिक समस्याओं पर पार्टी के रुख और समाधानों के साथ जनता की अंगुली पकड़नी चाहिए थी। लोक लुभावन नारा गढ़ने और जनता का ध्यान अपनी ओर खींचने वाले शीर्ष नेताओं का कांग्रेस में अब घोर अभाव है। याद रहे 1971 का चुनाव ‘गरीबी हटाओ’ के नारे ने ही इंदिरा गांधी को जिता दिया था।

भारत जैसे विशाल एवं विविधता भरे लोकतंत्र में विपक्ष में ऐसा दल आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य भी है जो स्वयं सशक्त हो और अपने आचरण एवं व्यवहार से सत्ता पक्ष को हमेशा याद कराता रहे कि किसी भी सूरत में वह निरंकुश नहीं हो सकता। लोकतंत्र की सफलता के लिए यही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। भारत ने जिस ब्रिटेन से संसदीय प्रणाली अपनाई वहां तो विपक्ष ‘शैडो कैबिनेट’ जैसी व्यवस्था को अपनाता है|

जहां विपक्षी नेता सत्ता पक्ष के मंत्रियों के कामकाज पर औपचारिक एवं व्यवस्थित ढंग से निगरानी रखते हैं। इससे लोकतांत्रिक प्रणाली के सुचारू रूप से संचालन में मदद मिलती है। हालांकि यह सब तभी संभव होता है जबकि विपक्षी दल स्वयं में मजबूत हो, उसके द्वारा सकारात्मक और स्वस्थ बहस की जाए और संयत और संसदीय भाषा व मर्यादा का पालन हो। लोक हित के मुद्दों पर सत्ता पक्ष का साथ देने में किसी प्रकार का अहम व राग द्वेष नहीं होना चाहिए तथा सत्ता पक्ष को किसी भी अमान्य और अलोकतांत्रिक कार्य करने से हरसंभव रोकना चाहिए। यही विपक्ष का सबसे बड़ा कर्तव्य-दायित्व है।

जहां तक राहुल गांधी का सवाल है, उनको परिपक्वता दिखाने की जरूरत है।वर्तमान में राहुल की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाने के साथ ही जनमानस में यह धारणा घर करती जा रही है कि वह मोदी के आगे कहीं भी नहीं टिकते। उनकी बातें जनता को आकर्षित नहीं करती, क्योंकि उनमें गहराई नहीं होती। राहुल गांधी के बयानों से देश की जनता में कांग्रेस के प्रति शंका उत्पन्न होती है। राहुल गांधी का मोटर साइकिल पर बैठकर भागना, संसद के अंदर प्रधानमंत्री को गले लगाने के बाद आंखें मारना, प्रधान मंत्री को भाषण के दौरान लगातार चोर बोलना आदि-आदि आचरण अपरिपक्वता ही तो दर्शाते हैं।

सोनिया गांधी ने कांग्रेस को लगातार दस वर्षों तक केंद्र में सत्ता में बने रहने में मदद की, वे लंबी बीमारी से जूझ रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे माहौल में अगर कांग्रेस जल्द कोई निर्णय नहीं लेती है तो दल को ही नहीं देश को भी काफी नुकसान होगा। इसलिए ये कहा जा सकता है कि कांग्रेस का पुनर्जीवित और सुदृड़ होना देश के हित में है।


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