
राजेश आज अपने मां-बाप को आश्रम यह कहकर छोड़ आया कि यहां आप दोनों को किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी। यहां आपको आपकी उम्र के दोस्त भी मिल जाएंगे, बातचीत करने के लिए और समय मिलते ही मैं आपसे मिलने आता रहूंगा।
कुछ दिनों से घर में नीता और राजेश की मां के बीच झगड़े कुछ ज्यादा ही बढ़ गए थे। राजेश बहुत परेशान हो गया। पत्नी की ओर बोलता तो मुश्किल और मां की ओर बोलता तो मुश्किल। आखिर उसने पत्नी की तरफ बोलने का फैसला किया और वह अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम छोड़ आया।
बिना यह सोचे कि परिवार बहुत बड़ा संसार होता है। हमें सबके लिए उसमे समांजस्य बैठाना पड़ता है। अपनी खुशियां का कई बार गला घोंटना पड़ता है।
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कभी खुशी तो कभी गम, कभी लड़ाई तो कभी प्यार चलता रहता है। कई बार परिवार के कलह बैठकर एक-दूसरे को समझाकर भी खत्म या कम किए जा सकते हैं। पर राजेश ने तो ज्यादा कुछ सोचा नहीं और उसने इस घर में कलह की जड़ को खत्म कर दिया। कलह क्या थी? राजेश की मां नीता को बोलती, बेटा बाबूजी को सुबह जल्दी दवा लेनी पड़ती है, तुम खाना जल्दी बना दिया करो। लेकिन नीता उनकी कोई बात नहीं सुनती, खाना देर से ही बनाती।
ऐसे ही बातों पर लड़ाई शुरू हो जाती। इसके चलते नीता ने कई बार आत्महत्या करने की धमकी दे डाली। राजेश ने आखिर फैसला ले लिया। नीता तो कभी अपने सास ससुर से वृद्धाश्रम मिलने गई नहीं, राजेश को समय नहीं मिलता। आखिर न जाने कब समय बीत गया।
उसके मां-बाप वहां कैसे रहते होंगे, उन्हें उसकी उसके बच्चों की कितनी याद आती होगी, वह भूल गया। अपने काम में व्यस्त रहा।
एक दिन उसके पास खबर आई उसके पिता मर गए हैं। उनके गम में मां भी मर गई है, वह उनके शव लेने आ जाए। उस दिन राजेश थोड़ा दुखी हुआ। उसे अपने मां बाप का खयाल आया। वह उन्हें वृद्धाश्रम लेने पहुंच गया। उसके मां बाप के शव को एंबुलेंस में जब रखा जा रहा था, तब वहां एक काम करने वाली महिला राजेश के पास आई और बोली, तुम हो राजेश?
उसने कहा, हां
हे भगवान तुम कितने निर्दयी, कितने पत्थर दिल हो, अपने मां-बाप से मिलने तक नहीं आए। वे तुम्हें कितना याद करते थे। उन्होंने तुम्हें कितने नाजों से पाला था। तुम सब भूल गए। घर में लड़ाई-झगडे होते रहते हैं। और तुम उन्हें यहां छोड़ गए तो मिलने तो आ सकते थे। मैं तुम्हें एक बात कहूं, आज मुझे कोई दुख कोई अफसोस नहीं कि मेरे कोई औलाद नहीं है, क्योंकि तुम्हारे जैसी औलाद होने से तो बांझ होना अच्छा है। खैर, जो भी है, मैं तो बस तुम्हें यह पत्र देने आई हूं, जो तुम्हारी मां ने मुझे दिया था।
राजेश ने पत्र खोला। उसमें लिखा था-
बेटा मैंने वृद्धाश्रम में अपनी जमापूंजी से सबके लिए सारी सुख सुविधाएं करवा दी हैं, ताकि किसी को कोई परेशानी न हो। बेटा मुझे तुम्हारी बहुत चिंता है। क्योंकि तुमको फिल्टर वॉटर पीने की आदत है। तुम एसी के बिना नहीं सो सकते, तुम सर्दियों में गीजर के पानी से नहाते हो, इसलिए मैंने यहां सारी सुख सुविधाएं करवा दीं। बेटा, जब कल को तुम्हारे बच्चे तुम्हें इस वृद्धाश्रम में छोड़कर जाएंगे तो तुम्हें को परेशानी नहीं होगी।
-तुम्हारी मां
तारावती सैनी ‘नीरज’


