- काम के बोझ तले दब कर रह गर्इं स्वास्थ्य विभाग की महत्वपूर्ण कड़ी
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: कहने को तो ‘आशा बहन जी’ स्वास्थ्य विभाग और समाज के बीच की सबसे मजबूत कड़ी मानी जाती है। स्वास्थ्य विभाग की अधिकतर योजनाओं को वो घर घर पहुंचाती हैं। बच्चों का टीकाकरण हो या उन्हें पोलियो ड्रॉप पिलानी हो, सरकारी अस्पताल में महिलाओं की डिलीवरी का मामला हो या फिर गर्भवती महिलाओं की एएनसी जांच करानी हो, कोविड का सर्वे हो या फिर एचबीएनसी (नवजात शिशुओं की देखभाल)। इन सभी में आशा बहन जी का रोल सबसे ज्यादा महत्तवपूर्ण माना जाता है।
बावजूद इसके स्वास्थ्य विभाग की ये सबसे मजबूत कड़ी काम के बोझ के तले कमजोर हो चली है। आए दिन नई नई सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार के लिए इन्ही आशा बहन जी से सबसे ज्यादा काम लिया जा रहा है और तो और अब इन्हें हाईटेक बनाने के चक्कर में सारा मामला और भी पेचीदा हो गया है। काम के बोझ के तले प्रदेश भर में स्वास्थ्य विभाग की यह ‘उम्मीद’ अब ना उम्मीदी के ऐसे अंधकार में भटक रही है जहां से उसे अब नई राह की तलाश है।
विभाग सख्त! बोला-हाईटेक बनना ही होगा
आशा बहनों को हाईटेक करने के लिए अब उन्हें ई-कवच की ट्रेनिंग दी जा रही है। ई-कवच के तहत गांवों की सभी आशाओं को सरकार की तरफ से मुफ्त मोबाइल दिए जा रहे हैं। मोबाइल मिलने के बाद आशा जो काम पेन कागज से करती थी वो अब सब मोबाइल पर होगा और आॅन लाइन। विभिन्न गांवों में बड़ी संख्या में कई आशाओं के साथ यह दिक्कत है कि उन्हें मोबाइल चलाना नहीं आता।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो आशा ठीक ढंग से नम्बर तक डायल नहीं कर पाती वो नेट कैसे चला पाएगी। हालांकि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने इस पूरे मामले में सख्त रवैया अपनाते हुए साफ कर दिया है कि अब आशा बहन जी को हाईटेक बनना ही होगा। स्वास्थ्य विभाग के विश्वस्त सूत्रों के अनुसार विभागीय अधिकारियों ने इस संबध में दो टूक कह दिया है कि जो आशा काम नहीं करना चाहती वो अपने लिए नया ठिकाना खोज ले।
अब घर की बहुओं का चाहिए साथ!
स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अफसरों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि जिस घर में आशा बहन जी को हाईटेक होने में दिक्कत है तो वो अपनी बहु की सेवाएं ले सकती है। यदि आशा मोबाइल अथवा नेट का उपयोग करने में सक्षम नहीं है तो वो इसके लिए अपने घर के अन्य सदस्य की सेवाएं भी ले और साथ ही साथ मोबाइल व नेट का उपयोग करना सीख ले। विभागीय सूत्रों के अनुसार आने वाले दिनों में आशा बहन जी का सारा कार्य आॅनलाइन ही होगा।
अंदरखाने उठने लगे विरोध के स्वर
अत्याधिक काम का बोझ झेल रहीं इन आशा बहनों के लिए अब अपने घर व काम के बीच सामंजस्य बैठाने की भी समस्या खड़ी हो गई है। कई आशा बहनें ऐसी हैं जो फील्ड वर्क की अधिकता के चलते अपने घर पर भी आपेक्षित फोकस नहीं कर पा रही हैं। इससे इनका घर व फील्ड वर्क दोनों ही प्रभावित हो रहे हैं। इन सबके चलते अब विभिन्न गांवों में आशा बहन जी के स्तर से ही विरोध के दबे स्वर उठने लगे हैं।
बड़ा सवाल! गांव में कनेक्टिविटी नहीं तो कैसे होगी रिपोर्टिंग
इस पूरे मामले में कई आशाओं ने आॅन लाइन काम की दिक्कतें भी बतार्इं। इन आशाओं की दलील थी कि कई ऐसे इंटीरियर वाले गांव हैं जहां पर मोबाइल नेटवर्क की समस्या रहती है। ऐसे में ई-कवच की ट्रेनिंग का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता। उधर कनेक्टिविटी की यह समस्या आंगनबाड़ी केन्द्रों पर भी आ रही है। इस समय इन केन्द्रों की जीओ टैगिंग की जा रही है, लेकिन नेटवर्क प्रॉबलम यहां भी काम में रोड़ा बन रही है।
कई आशाएं तो अंगूठा टेक, कैसे होंगी हाईटेक?
प्रदेश में वैसे तो अधिकतर आशाएं शिक्षित हैं, लेकिन कुछ आशांए ऐसी भी हैं जो अंगूठा टेक हैं। वो सिर्फ अपने अनुभव के आधार पर कार्य को अंजाम दे रही हैं। फील्ड में वो कार्य करती हैं, लेकिन उनकी लिखत पढ़त का कार्य उनके घर के दूसरे सदस्य करते हैं। यहां भी बड़ा सवाल यह है कि ऐसी आशा बहन जी जो पूरी तरह से अशिक्षित हैं वो हाईटेक कैसे होंगी?

