Sunday, March 29, 2026
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धर्म और राजनीति का गठजोड़

SAMVAD


05 1सर्वोच्च न्यायालय ने नफरती भाषण देने वाले तुच्छ तत्वों पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि जिस समय राजनीति और धर्म अलग हो जाएंगे एवं नेता राजनीति में धर्म का उपयोग बंद कर देंगे, उस समय नफरत फैलाने वाले भाषण भी समाप्त हो जाएंगे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई और पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं के भाषणों का उदाहरण देते हुए सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इन नेताओं के भाषण सुनने के लिए लोग दूर-दूर से आते थे। न्यायमूर्ति के एम जोसेफ और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की पीठ नफरती भाषण देने वालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने में विफल रहने को लेकर विभिन्न राज्य प्राधिकरण के खिलाफ अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

पीठ ने यह सवाल भी किया कि भारत के लोग अन्य नागरिक और समुदायों को अपमानित नहीं करने का संकल्प क्यों नहीं लेते हैं? न्यायमूर्ति केएम जोसेफ ने कहा है कि समस्या तब पैदा होती है जब नेता राजनीति को धर्म से मिला देते हैं। जिस क्षण राजनीति और धर्म अलग हो जाएंगे एवं नेता राजनीति में धर्म का उपयोग बंद कर देंगे, यह सब बंद हो जाएगा। हमने अपने हालिया फैसले में भी कहा है कि राजनीति को धर्म से मिलाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

भारतीय राजनीति और धर्म के विषय पर चर्चा करने के लिए सबसे पहले हमें धर्म की वास्तविक परिभाषा को सही प्रकार से जानना होगा, क्योंकि अगर सही काम करना, झूठ न बोलना, सत्य का साथ देना, नैतिकता पर चलना, सबके कल्याण पर काम करना ही धर्म है तो ऐसे धर्म के राजनीति में जुड़ाव को कोई गलत नहीं कह सकता। विवेकानंद ने धर्म को स्वयं के कल्याण की जगह लोगों की सेवा से जोड़ा। उनका मानना था, ‘धर्म किसी कोने में बैठ कर सिर्फ मनन करने का माध्यम नहीं है।

इसका लाभ देश और समाज को भी मिलना चाहिए। धर्म और राजनीति का संबंध आत्मा और शरीर जैसा है। और बिना आत्मा के शरीर निष्प्राण है। धर्म आत्मा है, तो राजनीति शरीर। आत्मा शरीर से निकल जाती है, तो शरीर में दुर्गंध और सड़न पैदा होने लगती है। विवेकानंद ने कहा था कि राजनीति में जब धर्म का अनुशासन रहेगा, तो राजनीति फलेगी और फूलेगी। इससे जनता खुशहाल होगी।

धर्म यदि राजनीति के सहारे चलेगा, तो रसातल में पहुंच जायेगा। धर्म लड़ना और मरना नहीं बल्कि जीना सिखाता है। जिओ और जीने दो। इसलिए धर्म में राजनीति का प्रवेश नहीं होना चाहिए। बल्कि,राजनीति पर धर्म का अकुंश रहना बहुत जरूरी है।’
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के आधार पर भारत को पंथ निरपेक्ष राज्य कहा जाता है। समानता की भावना इसका मूल आधार है।

भारतीय संविधान में स्पष्ट तौर पर यह भावना व्यक्त की गई है कि राज्य और राजनीति को सभी प्रकार के धार्मिक विश्वासों से दूर रहना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्यवश भारतीय राजनीतिक परिदृश्य और रोजमर्रा की राजनीति में खुलेआम धर्म को वोट बैंक की राजनीति के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। कांग्रेस, समाजवादी और वामपंथी दलों पर हमेशा से अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का आरोप लगता रहा है। और यह पार्टियां खुद भी अपने को अल्पसंख्यकों के मसीहा के रूप में पेश करती रही है। लेकिन ऐसी राजनीति के पीछे तथ्य यह है कि अल्पसंख्यकों, खासकर धर्म विशेष के मानने वालों के वोट पर कब्जा जमाना है।

शायद इसीलिए अल्पसंख्यकों की स्थिति आज भी कमोबेश वैसी की वैसी है, जैसी आजादी के व़क्त थी। पिछली सदी के अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध और नब्बे के दशक के पूर्वार्द्ध तक राजनीतिक दलों द्वारा धर्म के अप्रत्यक्ष इस्तेमाल की वजह से भारतीय राजनीति में धर्म अहम हो गया। इससे देश में समाज के बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदाय के बीच की खाई चौड़ी हो गई।

दूसरी तरफ हिंदूवादी राजनीतिक दलों ने भी वोट बैंक के लिए कोई कोर कसर बाकि नहीं छोड़ी। पिछले वर्षों में दक्षिण पंथी दलों ने अयोध्या में राम मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद प्रकरण का इस्तेमाल अपनी राजनीति के लिए बखूबी किया। इसी मुद्दे का परिणाम है कि जहां कभी भाजपा पूरे देश में कुल दो सीटों पर सिमट चुकी थी, वही भाजपा अब देश पर पूर्ण बहुमत से शासन कर रही है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एकाधिक बार कहा था, ‘मेरे लिए धर्म से अलग कोई राजनीति नहीं है। लेकिन मेरा धर्म सर्वभौम और सहनशील धर्म है, अंधविश्वासों और ढकोसलों का धर्म नहीं। नैतिकता के बिना राजनीति का कोई अर्थ नहीं रह जाता।’ लेकिन आश्चर्य है कि गांधी के नाम का इस्तेमाल कर सत्ता-सुख भोगने वाले लोग और राजनीतिक दल स्वयं इसे बहुत पहले त्याग चुके हैं।

लेकिन गांधी का नाम लेकर धर्म और राजनीति को मिलाने का समर्थन करने वाले लोगों को यह भी समझना होगा कि गांधी का धर्म त्याग और प्यार का धर्म है, जिसमें नफरत के लिए कोई जगह नहीं है। गांधी के लिए दरिद्र नारायण ही दुनिया का सबसे बड़ा देवता है। गांधी का मार्ग त्याग का मार्ग है, न्याय का मार्ग है, भोग और अन्याय का मार्ग नही।

जबकि आज धर्म और राजनीति का गलत तरीकों से इस्तेमाल करके सत्ता पाना ही राजनेताओं और राजनीतिक दलों का एकमात्र मकसद बन चुका है। धर्म और जाति की आड़ में ऐसे ऐसे लोग सदनों में पहुंच गए हैं, जिनकी असली जगह जेल है। हमें समझना होगा कि सांप्रदायिकता की राजनीति से सीटें जीती जा सकती हैं, सरकार भी बनायी जा सकती है, लेकिन राष्ट्र-निर्माण संभव नही है, राष्ट्रहित भी सम्भव नहीं हो सकता।

राजनीति में धर्म की घुसपैठ को भगत सिंह सीधे सांप्रदायिकता से जोड़ते हैं और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि जहां सांप्रदायिकता के तत्व हावी होते हैं वहां साम्राज्यवाद अपने आप आ जाता है। सांप्रदायिकता अपने निजी हित के लिए साम्राज्यवाद का समर्थक होता है, या कहें कि उसकी अगली कड़ी साम्राज्यवाद है। भगत सिंह ने आज से दशकों पहले ही कह दिया था-जो धर्म इंसान को इंसान से जुदा करे, मुहब्बत की जगह एक-दूसरे से घृणा करना सिखलाये, अंधविश्वासों को प्रोत्साहन देकर लोगों के बौद्धिक विकास में बाधक हो, दिमागों को कुंद करे, वह कभी भी मेरा धर्म नहीं हो सकता।

धर्म किसी भी व्यक्ति का आन्तरिक मसला है, इस बात को समझना होगा। धर्म और राजनीति के गठबंधन को तोड़ना ही होगा। नेताओं अथवा किसी राजनैतिक दल से इस बात की उम्मीद रखने से कुछ हासिल नहीं होगा। न ही कोई राजनेता ये चाहेगा कि धर्म और राजनीति के गठजोड़ के आधार पर चलने वाली राजनीति समाप्त हो, क्योंकि ऐसा होने पर राजनीति विकास पर, रोजगार पर, समानता पर, शिक्षा और स्वास्थ्य पर केंद्रित होगी, जो बहुत मुश्किल होगी।

प्रत्येक पांच वर्ष में जब जनता के बीच जाना होगा, तो जनता को जवाब देना होगा, जो मुश्किल काम होगा। ऐसे में ले-दे कर देश का सर्वोच्च न्यायालय तथा राष्ट्रीय चुनाव आयोग दो ही संस्थान ऐसे हैं जो धर्म व राजनीति की सगाई को तोड़ने में अपना अहम किरदार अदा कर सकते हैं।


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