Friday, May 29, 2026
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आज की राजनीति के कुछ यक्ष प्रश्न

Ravivani 32


जलाशय में पानी पीने गए नकुल, सहदेव, अर्जुन व भीम यक्ष के प्रश्नों की परवाह न करते हुए पानी पी लेते हैं और मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। काफी देर तक अपने भाइयों को न आता देख युधिष्ठिर व्याकुल हो उठे और खोजते हुए उसी विषैले जलाशय के किनारे पहुंचे, जिसका जल पीकर चारों भाई मृत पड़े थे। उनकी मृत्यु का कारण सोचते हुए मारे प्यास से व्याकुल वे भी तालाब में उतरने लगे। इतने में उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी, ‘सावधान तुम्हारे भाइयों ने मेरी बात न मानकर पानी पीया है। यह तालाब मेरे अधीन है, अत: पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो और फिर अपनी प्यास बुझाओ।’ युधिष्ठिर समझ गए कि कोई यक्ष बोल रहा है। उन्होंने कहा, ‘आप प्रश्न कर सकते हैं।’ यहां तक की कथा तो असल महाभारतकालीन है। इसे थोड़ा वर्तमान राजनीतिक महाभारत के एंगल से देखते हैं। यक्ष जो है सो है, पर उत्तर देने वाला ‘आज की राजनीति’ का युधिष्ठिर है।

यक्ष ने पहला प्रश्न किया- ‘चुनावों में मनुष्य का कौन साथ देता है?’
युधिष्ठिर- ‘अधैर्य ही मनुष्य का साथ देता है। धैर्य रखने के चक्कर में कई बार टिकट हाथ से चला जाता है।’
यक्ष- ‘यश-लाभ का एकमात्र उपाय क्या है?’
युधिष्ठिर- ‘दान तो कतई नहीं। हां, भरपूर राजनीतिक चंदा उगाहने से यश-लाभ की प्राप्ति अवश्य होती है।’
यक्ष- ‘हवा से भी तेज चलने वाला कौन है?’
युधिष्ठिर- ‘मन से भी तेज और आगे चलता है, भ्रष्टाचार। इसलिए मेरी नजर में हवा से भी तेज भ्रष्टाचार दौड़ता है।’
यक्ष- ‘परदेस जाने वाले का कौन साथी होता है?’
युधिष्ठिर- ‘सरकार द्वारा दिया जाने वाला फोरेन ट्रेवल अलाउंस परदेस का साथी होता है। आॅफिशियल टूर पर विदेश गए राजनेता को घूमने-फिरने में यह अलाउंस खूब साथ देता है।’
यक्ष- ‘किसे त्याग कर मनुष्य प्रिय हो जाता है?’
युधिष्ठिर- ‘ईमानदारी त्याग कर मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है।’
यक्ष- ‘किस चीज के छूट जाने पर दुख नहीं होता?’
युधिष्ठिर- ‘क्रोध को तो कतई नहीं छोड़िए। हां, इस क्रोध को राजनैतिक आक्रोश में बदल सकें तो बेहतर..।’
यक्ष- ‘किस चीज को गंवा कर मनुष्य धनी बनता है?’
युधिष्ठिर- ‘नैतिकता गंवा कर.. और लोभ-लालच को गले लगा कर..।’
यक्ष- ‘ब्राह्मण होना किस बात पर निर्भर है? जन्म पर, विधा पर, शील स्वभाव पर?’
युधिष्ठिर- ‘बदकिस्मती पर..। उसके जन्म, विधा और शील स्वभाव से वह पिछड़े वर्ग में नहीं गिना जाता। आरक्षण में ब्राह्मण यानी सवर्ण और योग्यता की कोई जगह नहीं है।’
यक्ष- ‘कौनसा एकमात्र उपाय है, जिससे जीवन सुखी हो सकता है?’
युधिष्ठिर- ‘बुरा स्वभाव ही सुखी होने का उपाय है। क्योंकि बुरे भाव रखने वाला ही घोटाले करने में लाज-शर्म ताक पर धर सकता है।’
यक्ष- ‘सर्वोतम लाभ क्या है?’
युधिष्ठिर- ‘यूं तो आरोग्य ही इसका ठीक जवाब है, पर राजनीति में विधायक, सांसद, मंत्री को रोग लग भी जाए तो चिंता की बात नहीं। बेपनाह सरकारी खर्चों पर निजी अस्पताल में इलाज से वह अपने जीवन की गाड़ी मजे-मजे चला लेता है।’
यक्ष- ‘धर्म से बढ़कर संसार में और क्या है?’
युधिष्ठिर- ‘धर्म को राजनीति से जोड़ कर कराए गये दंगे धर्म से बढ़ कर हैं।’
यक्ष- ‘कैसे व्यक्ति के साथ की गई मित्रता कभी पुरानी नहीं पड़ती?’
युधिष्ठिर- ‘दलबदलू व दुर्जनों के साथ की गई मित्रता..। राजनीति में कभी भी काम आ सकते।’
यक्ष- ‘इस जगत में आश्चर्य क्या है?’
युधिष्ठिर- ‘रोज लाखों-करोड़ों के घोटाले नेता कर रहे हैं। फिर भी प्रजा चाहती है कि यही नेता हमारे लोकतंत्र के सारथी बने रहें, इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है।’
इस प्रकार यक्ष ने कई प्रश्न किए और आज की राजनीति में रचे-बसे युधिष्ठिर ने सब प्रश्नों के माकूल जवाब दिये। अंत में यक्ष बोला- ‘राजन, मैं तुम्हारे मृत भाइयों में से किसी एक को जिला सकता हूं। तुम जिसे कहो वह जीवित हो जाएगा।’
युधिष्ठिर ने तुरंत कहा- ‘यह निर्दलीय जीवित हो उठे।’
चकित यक्ष बोला- ‘अपनी पार्टी के शक्तिशाली नेता को छोड़ कर तुम ने इस निर्दलीय को जिलाना क्यों ठीक समझा!’

युधिष्ठिर बोला-‘महाराज, राजनीति में मनुष्य की रक्षा सिर्फ अपनी पार्टी के शक्तिशालियों से ही नहीं होती। कभी-कभी सत्ता बचाने के लिए निर्दलीय के वोट से संख्या बल पूरा होता है। इसलिए, उसका जीवित होना मेरे लिए जरूरी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष में से सत्ता की ओर से मैं जीवित बचा हूं। मैं चाहता हूं कि विपक्ष का एक वह नेता भी जीवित रहे। जिसे आप निर्दलीय कह रहे हैं, वह हमारी पार्टी का ही बागी है।’ ‘पक्षपात से रहित मेरे प्यारे पुत्र, तुम्हारे क्या तो पक्ष वाले, क्या विपक्ष वाले…। सभी जीवित हो उठें…और सब मिल-बांट कर सत्ता की मलाई खाएं।’


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