
लगता है, 2013 की केदारनाथ-त्रासदी से लेकर हिमाचल और उत्तराखंड में हो रही मौजूदा तबाही तक, नीति-नियंताओं ने कोई सबक नहीं लिया है। नतीजतन चार दिन की बारिश, 112 बार हुए भूस्खलन और पांच बार फटे बादलों से जो बर्बादी हुई उसमें 71 लोग मारे गए। इस मानसून में अब तक हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में 327 लोगों को आपदाओं ने लील लिया,1442 घर जलधाराओं में विलीन हो गए और 7170 करोड़ रुपए की अचल संपत्तियां धराशायी हो गईं। हिमाचल में एक साथ करीब 950 सड़कों पर आवाजाही बंद पड़ी है। बद्री-केदारनाथ राजमार्ग भी ठप्प है।इस तबाही के असली कारण समूचे हिमालय क्षेत्र में बीते एक दशक से पर्यटकों के लिए सुविधाएं जुटाने के परिप्रेक्ष्य में जल-विद्युत संयंत्र और रेल परियोजनाओं की जो बाढ़ आई हुई है, वह है।