- भारी संख्या में बेगमपुल पर जाम वकीलों ने जमकर किया हंगामा
- लोकसभा चुनाव से पहले बेंच नहीं तो वोट नहीं अभियान चलाएगी संघर्ष समिति
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: हाईकोर्ट बेंच की मांग को लेकर मेरठ समेत वेस्ट यूपी के बाइस जिलों में बुधवार को वकीलों ने हुंकार भरी। संघर्ष समिति ने ऐलान किया है कि बेंच नहीं तो वोट नहीं। हाईकोर्ट बेंच संघर्ष समिति के अध्यक्ष एडवोकेट कुंवर पाल शर्मा के नेतृत्व में भारी संख्या में वकीलों बेगमपुल चौराहे पर पहुंचे। उन्होंने चौराहा जाम कर बेंच के समर्थन में जबरदस्त प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी वकीलों के अचानक बेगमपुल चौराहे पर पहुंचे से अफरा-तफरी मच गयी।
जो पुलिस वाले चौराहे पर ड्यूटी दे रहे थे वकीलों को देखकर वो एक ओर हट गए। चौराहे पर वकीलों ने कब्जा कर लिया। वहां हंगामा और नारेबाजी शुरू कर दी गयी। वकीलों ने कहा कि हाईकोर्ट बेंच के लिए अब इंतजार नहीं किया जा सकता। आरपार की लड़ाई लडी जाएगी। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट बेंच का आंदोलन अब जनांदोलन बनाया जाएगा। तमाम राजनीतिक दलों से दो टूक कहा पूछा जाएगा कि बेंच के समर्थन में हैं या विरोध में। पश्चिमी उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट बेंच संघर्ष समिति ने नारा दिया है कि बेंच नहीं तो वोट नहीं।
77 साल पुरानी मांग, अटल उठा चुके हैं संसद में, इंदिरा ने किया था आयोग का गठन
हाईकोर्ट बेंच की मांग सबसे पहले 1956 में नेशनल कांफ्रेंस के अधिवक्ताओं ने उठाई थी। इसके बाद प्रदेश में सन 1976 में नारायणदत्त तिवारी की सरकार थी और उन्होंने भी खंडपीठ की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया था। इसके अलावा पश्चिम में बेंच की स्थापना को लेकर सन 1986 में नेता प्रतिपक्ष के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने भी संसद में मांग उठाई थी।

इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी पश्चिम में बेंच की स्थापना के लिए जसवंत सिंह आयोग का गठन किया था। आयोग ने भी बेंच स्थापना को जरूरी माना था। जनता दल के शासन में रामनरेश यादव के अलावा बनारसी दास व मायावती ने भी अपने शासन के दौरान खंडपीठ की स्थापना की मांग का प्रस्ताव पारित किया
और अपनी संस्तुति प्रदान कर केंद्र सरकार को भेजा था। इसके अलावा वर्तमान सांसद राजेंद्र अग्रवाल भी हाईकोर्ट बेंच को लेकर संसद में अपनी बात रख चुके हैं। कमी यह रही कि आंदोलन करने वाले इसको जनांदोलन नहीं बना सके इसके अलावा राजनीतिक दलों ने ईमानदारी से जितना साथ देना चाहिए था शायद उतना नहीं दिया।
हाईकोर्ट में पश्चिम के 7.50 लाख मुकदमे
हाईकोर्ट में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जनपदों के सिविल व क्राइम के 7.50 लाख से अधिक मुकदमे लंबित हैं। हर माह बड़ी संख्या में पश्चिम के लोगों को प्रयागराज अपने मुकदमों की पैरवी के लिए चक्कर काटना पड़ता है।
लाहौर पास, हाईकोर्ट दूर
पश्चिमी यूपी में 22 जिले लगते हैं और इन जिलों से इलाहाबाद हाइकोर्ट की दूरी पाकिस्तान के लाहौर से भी ज्यादा है। मेरठ से प्रयागराज करीब 657 किलोमीटर दूर है। जबकि पाकिस्तान का लाहौर केवल 458 किलोमीटर दूर है। जिला बार के महामंत्री विमल कुमार ने बताया कि वेस्ट के किसी भी जिले में यदि हाइकोर्ट बेंच मिल जाएगी तो समय की बबार्दी और पैसे की बचत दोनो होगी।

सीनियर एडवोकेट वीरेन्द्र वर्मा काजीपुरिया ने बताया कि मेरठ से प्रयागराज करीब 637 किमी दूर है। जबकि पाकिस्तान का लाहौर सिर्फ 458 किमी। ऐसे ही पड़ोसी राज्यों के उच्च न्यायालय भी प्रयागराज से आधी दूरी पर ही हैं। इनमें दिल्ली, चंडीगढ़, नैनीताल, शिमला, जयपुर व ग्वालियर आदि की दूरी 350 किमी के भीतर ही है। जिला बार के महामंत्री विमल बताते हैं कि मेरठ में बेंच मिल जाती है तो समय की बबार्दी और पैसे की बचत दोनों होगी।
कब-कब हुआ आंदोलन
साल 1955 में पहली बार वेस्ट यूपी में हाई कोर्ट बेंच की मांग उठी थी और बड़े स्तर पर 1978 में एक महीने की हड़ताल और भूख हड़ताल कर के मांग को जोरों से उठाया गया। फिर साल 1981, 1982 में भी बेंच की मांग को बुलंद किया गया। 1986-87 में ऋषिकेश से दिल्ली तक पद यात्रा निकाली गई। तब उत्तराखंड भी यूपी का हिस्सा हुआ करता था। साल 2001, 2014, 2015, 2017 और अब 2021 में भी हाई कोर्ट बेंच की मांग को बुलंद किया जा रहा है। तमाम आंदोलन के बाद भी आज तक हाई कोर्ट बेंच नही मिल सकी।
22 जिलों को मिलता सस्ता न्याय
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 22 जिलों से 35 साल से ज्यादा समय से हाईकोर्ट बेंच की मांग उठ रही है। बेंच की स्थापना से मेरठ, बिजनौर, गाजियाबाद, शामली, बागपत, मुजफ्फरनगर, हापुड़, अलीगढ़, हाथरस, आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, एटा, अमरोहा, मुरादाबाद, रामपुर, सहारनपुर, बुलंदशहर समेत पश्चिम के सभी जिलों की बड़ी आबादी को सुविधा होगी और सस्ता न्याय मिल सकेगा।
ये है बेंच बनाने की प्रक्रिया
हाईकोर्ट बेंच स्थापित करने के लिए राज्य सरकार के प्रस्ताव पर केंद्र सरकार उसे सहमति के लिए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजती है। इस पर एक कोलेजन कमेटी अपनी रिपोर्ट लगाती है। इसी रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की कार्रवाई होती है। इसके अलावा केंद्र सरकार चाहे तो वह इस संबंध में एडवोकेट जनरल की विधिक राय लेकर संसद में बिल भी पारित करा सकती है ताकि खंडपीठ का गठन किया जा सके।

