Thursday, March 26, 2026
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Piyush Pandey: ‘शरमा के दुल्हन जो ब्याह के आईं…’ मशहूर ऐड के क्रिएटर पीयूष पांडे का निधन, जानिए उनके जीवन की यादगार यात्रा

नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। भारतीय विज्ञापन जगत के दिग्गज पीयूष पांडे का निधन हो गया है। अपनी रचनात्मक सोच, भारतीयता की झलक और सरलता भरे अंदाज़ के लिए पहचाने जाने वाले पीयूष ने विज्ञापन की दुनिया को एक नया चेहरा दिया। पीयूष पांंडे ने ऐसे कई विज्ञापन बनाए, जो लोगों के दिलों में बस गए। उनके बनाए विज्ञापनों में ‘शरमा के दुल्हन जो ब्याह के आईं…’, ‘हर घर कुछ कहता है’, ‘चलो निकल पड़े हैं लोग अपने घर को’ और ‘फेयरनेस क्रीम नहीं, फेयर प्ले चाहिए’ जैसे कैंपेन आज भी दर्शकों की यादों में ताज़ा हैं। इस मौके पर चलिए जानते हैं पीयूष पांडे के बारे में।

पीयूष पांडे कौन थे?

जयपुर में 1955 में जन्मे पीयूष पांडे नौ भाई-बहनों में से एक थे। उनके परिवार में कला और सृजन की परंपरा रही। बहन ईला अरुण ने गायकी और अभिनय में नाम कमाया, तो भाई प्रसून पांडे ने निर्देशन की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। क्रिकेटर, चाय बागान में कामगार और मजदूर के रूप में जीवन के अलग-अलग रंग देखने के बाद उन्होंने 27 साल की उम्र में विज्ञापन जगत में कदम रखा। तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह युवक एक दिन भारतीय ऐड वर्ल्ड का चेहरा बन जाएगा।

हर विज्ञापन में डाली देसी मिट्टी की खुशबू

पीयूष पांडे की खासियत थी कि उन्होंने भारतीय उपभोक्ताओं की भावनाओं को बेहद सादगी से पकड़ा। फेविकोल का ‘अटूट बंधन’ हो या कैडबरी का ‘कुछ खास है’, एशियन पेंट्स का ‘हर खुशी में रंग लाए’ हो या हच का प्यारा ‘गुगली वूगली वूस’, हर विज्ञापन में उन्होंने देसी मिट्टी की खुशबू डाली। यही कारण है कि उनके कैंपेन सिर्फ विज्ञापन नहीं, बल्कि संस्कृति के प्रतीक बन गए।

भारतीय राजनीति में भी दी विज्ञापन की नई भाषा

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने भारतीय राजनीति में भी विज्ञापन की नई भाषा दी- ‘अबकी बार, मोदी सरकार।’ यह नारा उस दौर का सबसे चर्चित राजनीतिक स्लोगन बना, जिसने चुनावी अभियानों की दिशा ही बदल दी। पीयूष पांडे ने साबित किया कि विज्ञापन सिर्फ उत्पादों को नहीं, विचारों को भी जन-जन तक पहुंचा सकता है।

‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’- राष्ट्रीय एकता का स्वर

विज्ञापन से परे, उन्होंने ऐसे अभियानों में भी अहम भूमिका निभाई जो भारत की एकता और विविधता को दर्शाते हैं। ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ उनके दिल के बेहद करीब था। यह गीत केवल एक कैम्पेन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव था जिसने भारत को एक सूत्र में बांध दिया।

पीयूष के योगदान को कई पुरस्कारों से नवाजा

उनके योगदान को अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्हें पद्मश्री (2016), क्लियो लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड (2012), एडवर्टाइजिंग एजेंसिज़ एसोसिएशन ऑफ इंडिया लाइफटाइम अचीवमेंट (2010), एलआईए लीजेंड अवार्ड (2024) जैसे अवॉर्ड्स मिले हैं। इसके अलावा, उन्होंने अपनी रचनात्मक यात्रा और अनुभवों को ‘पांडेमोनियम’ नाम की पुस्तक में शब्दों का रूप दिया, जो विज्ञापन जगत के छात्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

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