Friday, May 1, 2026
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बेला आई स्वेटर बुनाई की

सर्दी की खिली गुनगुनी धूप में बैठी उन महिलाओं को मैं साष्टांग प्रणाम करता हूं-जो अविकल सलाइयों से रंग-बिरंगे स्वेटर बुन रही हैं। उन महिलाओं का मैं हार्दिक अभिनंदन करता हूं, जो सरकारी सेवा में है, लेकिन कार्यालय समय में स्वेटर अपने पति-देव का बुन रही हैं। पति कैसे होते होंगे जिनके स्वेटर वे पूर्ण मनोयोग से पिछले अनेक वर्षों से बुने चली जा रही है। काश उनमें से ही कोई एक स्वेटर मेरा भी होता, परन्तु अफसोस मेरी पत्नी निरक्षर है तथा वह
सरकारी सेवा का सुख बिना सेवा के पेंशन रूप में सेवानिवृत्ति से पहले ही प्राप्त नहीं कर सकी है। अभिनंदन उस खोजी महापुरूष का भी जिसने विविध नंबरों की सलाइयों का आविष्कार किया है।
मेरे दफ्तर में मेरे बराबर वाली सीट पर विगत दस वर्षों से सर्दी-गर्मी एवं वर्षा तीनों मौसमों में वह एक महिला पीले रंग का स्वेटर बुन रही है एक दिन मैंने हिम्मत जुटा कर पूछा-‘आप वर्ष में कितने स्वेटर बुन लेती हैं ?’ वह बोली-‘एक।’ मैं बोला-‘केवल एक?’ ‘हां, मात्र एक।’ ‘लेकिन आप तो पूरे वर्ष स्वेटर बुनती है।’ ‘मैं इस एक ही स्वेटर को बुनती हूं, फिर उधेड़ती हूं और फिर बुनती हूं।’ ‘ऐसा क्यों करती हैं।’ ‘ताकि फालतू लोगों से बच सकूं।’ फालतू लोगों से एक बार तो मैं चौंका, फिर मैंने साहस के साथ पूछा-‘आप ऐसा कब तक करती रहेंगी?’ ‘सेवानिवृत्ति तक।’

‘इसका मतलब आप बातूनी पुरुषों से बचने के लिए स्वेटर का बहाना ढ़ूंढती हैं, अन्यथा आपको इसकी आवश्यकता है नहीं।’ मैं बोला।

‘जब आप सब जानते है तो पूछते क्यों है?’ सन्नाटा फिर छा गया। मैं आगे कोई सवाल करता उससे पहले ही वह उठकर चली गई। इसी तरह एक बार मैंने पैसे देकर स्वेटर बनवाया तथा उसे पहन कर दफ्तर के लिए बस में बैठा तो एक महिला लगातार मुझे देख रही थी। मुझे बड़ा भला लगा। वर्षों में किसी ने मुझ पर दृष्टिपात किया था। आखिर में महिला ने मुझ से कहा-‘क्या मैं आपके स्वेटर की डिजाइन गौर से देख सकती हूं।’ बहुत ही कोफ्त हुई कि वह मात्र स्वेटर को देख रही थी।

स्वेटर बुनना राष्ट्रीय विकास के ताने-बाने के समान हैं, जिसके रंग और डिजाइन आगे बढ़ने का संकेत देते है। उनके ऊन के गोले और सलाइयों का यह खेल नारी जागृति का परिचायक-सा लगता है। यदि नारी जागृति संस्थाओं को पता चल जाए तो वे महिलाओं को स्वेटर नहीं बुनने दें। मेरी भी हार्दिक इच्छा है कि कानूनी तौर पर स्वेटर बुनने पर सरकारी प्रतिबंध लगना चाहिए ताकि महिलाए पुरुषों की बराबरी कर सकें तथा आपस में संवाद भी बन सकें। कोई महिला दफ्तर में स्वेटर बुनती है तो उसका अफसर बड़ा परेशान रहता है। उससे खामख्वाह के सवाल व काम के बारे में जानकारी करेगा। पीछे से महिला की बुराई करेगा तथा मक्कार और कमजोर जैसी उपाधियों से अलंकृत करेगा। फिलहाल स्वेटर बुनने की खुशहाल बेला चल रही है तथा हर सकरारी दफ्तर में विकास का ताना-बाना गतिमान है।

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