जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लागू किए गए व्यापक वैश्विक टैरिफ को असंवैधानिक ठहराते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। इस ऐतिहासिक फैसले के केंद्र में भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक नील कात्याल का नाम उभरा, जिन्होंने अदालत में ट्रंप के इस कदम को चुनौती दी थी। कात्याल ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था, जिसके तहत राष्ट्रपति ने लगभग सभी व्यापारिक साझेदार देशों पर टैरिफ लागू कर दिए थे।
नील कात्याल की दलीलें
नील कात्याल ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि राष्ट्रपति ने आपातकालीन आर्थिक शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया है। उनका कहना था कि टैरिफ असल में टैक्स होते हैं, और टैक्स लगाने का अधिकार केवल अमेरिकी कांग्रेस को है, न कि राष्ट्रपति को। कात्याल ने इन टैरिफ को असंवैधानिक और अन्यायपूर्ण टैक्स करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने छह-तीन के बहुमत से यह फैसला सुनाया कि संविधान के तहत टैक्स लगाने की शक्ति सिर्फ कांग्रेस के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास।
जीत के बाद नील कात्याल का बयान
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद नील कात्याल ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने कानून के शासन और आम अमेरिकियों के अधिकारों की रक्षा की है। राष्ट्रपति शक्तिशाली होते हैं, लेकिन संविधान उनसे भी अधिक शक्तिशाली है। अमेरिका में टैक्स लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं। अदालत ने हमारी कानूनी दलीलों को पूरी तरह स्वीकार किया और वही फैसला दिया जिसकी हम मांग कर रहे थे। यह मामला किसी एक राष्ट्रपति के खिलाफ नहीं था, बल्कि यह शक्तियों के संतुलन और संविधान की रक्षा से जुड़ा हुआ था।”
मामला किसने दायर किया था?
यह मामला उन छोटे अमेरिकी व्यापारियों द्वारा दायर किया गया था, जिन्हें लगता था कि ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ से उनका व्यापार प्रभावित हो रहा है। ट्रंप प्रशासन ने इन टैरिफ को राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक दबाव को ध्यान में रखते हुए जरूरी कदम बताया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि आपातकालीन शक्तियों का हवाला देकर राष्ट्रपति व्यापक टैक्स नहीं लगा सकते।
नील कात्याल के परिवार और करियर की जानकारी
नील कात्याल का जन्म शिकागो में भारतीय प्रवासी माता-पिता के घर हुआ था। उनके पिता इंजीनियर और माता डॉक्टर थीं। उन्होंने डार्टमाउथ कॉलेज और येल लॉ स्कूल से पढ़ाई की। कात्याल अमेरिकी सरकार के कार्यवाहक सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट में 50 से अधिक मामलों में पैरवी कर चुके हैं। वे कई संवैधानिक मामलों में अहम भूमिका निभा चुके हैं।
ट्रंप को पहले भी दी थी चुनौती
नील कात्याल पहले भी ट्रंप प्रशासन को चुनौती दे चुके हैं। उन्होंने 1965 के वोटिंग राइट्स एक्ट की संवैधानिकता का बचाव किया, ट्रंप के 2017 के यात्रा प्रतिबंध को चुनौती दी और कई राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में सरकार का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा, कात्याल जॉर्ज फ्लॉयड हत्या मामले में मिनेसोटा राज्य के विशेष अभियोजक भी रह चुके हैं।
लोकतंत्र की ताकत बताई
कात्याल ने इस फैसले पर टिप्पणी करते हुए कहा, “एक प्रवासी परिवार का बेटा अदालत में खड़ा होकर यह कह सकता है कि राष्ट्रपति कानून तोड़ रहे हैं, और अदालत उसे सुनती है—यही लोकतंत्र की ताकत है।” उन्होंने इस फैसले को अमेरिकी संविधान और शक्तियों के संतुलन के लिए एक मील का पत्थर बताया। इस फैसले के बाद, भविष्य में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा आपातकालीन आर्थिक शक्तियों के इस्तेमाल पर सीमाएं तय हो जाएंगी।

