
पिछले दिनों न्याय को सुलभ, व्यावहारिक और मानवीय बनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि न्याय प्रणाली को केवल कानूनी रूप से सक्षम या शक्तिशाली लोगों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह हाशिए पर खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए। न्यायिक नेतृत्व को केवल प्रशासनिक अधिकार या संस्थागत पदानुक्रम तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि इसे एक बौद्धिक और नैतिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए।
हम ‘मुकदमेबाजी-केंद्रित मॉडल’ से ‘न्याय-केंद्रित ‘कोसिस्टम’ की ओर बढ़ रहे हैं। जब न्याय सभी के लिए सुलभ होगा, समय पर मिलेगा, जब न्याय हर व्यक्ति तक पहुंचेगा, चाहे उसकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति कैसी भी हो, तभी वह सामाजिक न्याय का आधार बन सकेगा।
न्याय की सुलभता सुनिश्चित करने में कानूनी सहायता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। राष्ट्रीय स्तर से लेकर तालुका स्तर तक, कानूनी सेवा प्राधिकरण न्यायपालिका और आम आदमी के बीच सेतु का काम करते हैं। खुशी की बात है कि आज लोक अदालतों और मुकदमे से पहले के समझौतों के माध्यम से लाखों विवादों का त्वरित, सौहार्दपूर्ण और कम खर्च में समाधान हो रहा है। भारत सरकार द्वारा शुरू की गई कानूनी सहायता रक्षा परिषद प्रणाली के तहत करीब तीन वर्षों में ही लगभग आठ लाख आपराधिक मामलों का निपटारा हो चुका है। सरकार के इन प्रयासों से देश के गरीब, दलित, शोषित, पीड़ित और वंचित लोगों को न्याय की सुगमता सुनिश्चित हुई है।
मुकदमा प्रधान देश: विकसित भारत के रास्ते में न्यायिक प्रणाली अर्थात अदालतें सबसे बड़ा रोड़ा हैं। हमारी न्यायिक प्रणाली की इस दुर्व्यवस्था के लिए सरकार भी जिम्मेदार है। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण जैसे अनेक न्यायाधिकरण, आयकर, वस्तु एवं सेवा कर विभाग एवं स्थानीय निकायों में चल रहे लाखों विवाद और मुकदमों का सही आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। पिछले तीन सालों में 23 करोड़ मुकदमें सुलझाए गए। फिर भी जिला अदालतों, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में 5.3 करोड़ मुकदमें लंबित हैं। क्या हम विवाद व मुकदमा प्रधान देश बन गए हैं? फर्जी मुकदमों और न्याय में विलंब से देश में अन्याय, अपराध व अराजकता बढ़ती है। जिला अदालतों में तीन-चौथाई ये ज्यादा मुकदमें अपराधिक हैं, जिनमें सरकार या पुलिस पक्षकार है। 70 प्रतिशत कैदी अंडरट्रायल हैं। आम व्यक्ति के लिए मुकदमों में लगने वाली फीस बहुत ज्यादा है। जबकि सरकारी वकील, पुलिस, जज और जेल सरकारी खर्च पर चलते हैं। अपराध व अन्याय को बढ़ाने वाले इस विरोधाभासी अर्थतंत्र से मुक्ति आवश्यक है।
हाईकोर्ट में 33 प्रतिशत और जिला अदालतों में 21 प्रतिशत जजों के पद और 27 प्रतिशत दूसरे स्टाफ के पद रिक्त हैं। न्यायिक व्यवस्था पर राज्य सरकार का खर्च सिर्फ 0.59 प्रतिशत के करीब है। बुनियादी ढांचे के विकास पर प्रतिव्यक्ति खर्च 15000 रुपये है, जबकि न्यायपालिका पर सिर्फ 182 रुपये है। इन तमाम कमियों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। इसको सुधारने के बाद ही न्याय सुगम हो सकेगा।
डिस्प्ले बोर्ड और ई-कोर्ट पहल: सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर केंद्र और राज्य सरकारों को यह निर्देश देने की मांग की गई है कि सभी थानों, अदालतों और सार्वजनिक कार्यालयों में ‘डिस्प्ले बोर्ड’ लगाए जाएं। इन बोर्डों पर झूठी शिकायत दर्ज करने, गलत आरोप लगाने और मनगढ़ंत सबूत पेश करने पर मिलने वाली सजा का स्पष्ट विवरण होना चाहिए। याचिका में तर्क दिया गया है कि निर्दोष नागरिकों के खिलाफ झूठी शिकायतें जीवन के अधिकार, स्वतंत्रता और गरिमा (संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अधिकार) के लिए गंभीर खतरा हैं। संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा व कानूनी प्रविधान याचिका में कहा गया है कि भारतीय न्याय संहिता 2023 के चौदहवें चैप्टर में इस तरह के अपराधों से निपटने के लिए विशिष्ट प्रविधान हैं, लेकिन सरकार ने इन्हें प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए उचित कदम नहीं उठाए हैं। दर्ज मामलों और दोषसिद्धि की दर में भारी अंतर याचिका में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि दर्ज मामलों और दोषसिद्धि की दर में भारी अंतर है।
बड़ी संख्या में होने वाली नियुक्तियां यह दर्शाती हैं कि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली झूठे मुकदमों और मनगढ़ंत सबूतों के कारण बोझ तले दबी हुई है। झूठी शिकायतें और दुर्भावनापूर्ण अभियोजन आपराधिक प्रक्रिया को ही सजा में बदल देते हैं, जिससे व्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक स्वास्थ्य को अपूरणीय क्षति होती है। प्रौद्योगिकी निस्संदेह एक क्रांतिकारी शक्ति है। लेकिन अगर इसका उद्देश्य जनहित में हो, तो यही प्रौद्योगिकी लोकतंत्रीकरण की शक्ति बन जाती है। न्याय व्यवस्था में ई-कोर्ट परियोजना भी इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह दर्शाता है कि प्रौद्योगिकी न्यायिक प्रक्रियाओं को आधुनिक और मानवीय कैसे बना सकती है।
ई-फाइलिंग से लेकर इलेक्ट्रॉनिक समन सेवा तक, वर्चुअल सुनवाई से लेकर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग तक प्रौद्योगिकी ने सब कुछ आसान बना दिया है। इससे न्याय का मार्ग सुगम हो गया है। न्याय- व्यवस्था में वकीलों की भूमिका बहुत ही अहम होती है। वे न्यायाधीश और याचिकाकर्ता के बीच एक कड़ी या मध्यस्थ का काम करते हैं। इसका फायदा उठाते हुए अब वे भ्रष्ट दलालों की भूमिका तक गिर चुके हैं। इसीलिए आज सभी पहलुओं पर ध्यान देना होगा तभी न्यायिक सुगमता की परिकल्पना सिद्ध हो सकेगी।
न्याय में देरी की वजह: भारत में न्याय देने में देरी का एक बहुत बड़ा कारण न्यायाधीशों की संख्या में कमी का होना ही है। पांच उच्च न्यायालयों जिनमें से इलाहाबाद, पंजाब और हरियाणा, गुजरात, बॉम्बे और कलकत्ता में लगभग 171 रिक्तियां हैं। यह पच्चीस उच्च न्यायालयों में कुल 327 पदों की रिक्तियों का 52 प्रतिशत से अधिक है। सभी उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 1,114 है और 29.4 प्रतिशत पद रिक्त हैं। उच्च न्यायालयों में लगभग 62 लाख मामले लंबित हैं। न्यायालयों की इन रिक्तियों के अनेक कारण हैं क्योंकि न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 217 द्वारा होती है। न्यायाधीशों के चयन में इस्तेमाल की जाने वाली प्रणाली समय लेने वाली है। कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच नामों और अन्य कारकों को लेकर राजनीतिक खींचतान भी चलती रहती है। अच्छे सार्वजनिक प्रशासन को बढ़ावा देने के लिए एक मजबूत कानूनी व्यवस्था महत्वपूर्ण है। इसलिए, इस संकट से निपटने के लिए अधिक न्यायाधीशों की नियुक्ति, न्यायालयीन सुविधाओं के आधुनिकीकरण और प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण के लिए पर्याप्त धनराशि में वृद्धि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जिससे त्वरित न्याय वास्तविक रूप से जमीन पर दिखाई देना चाहिए क्योंकि न्याय होना ही नहीं, न्याय दिखना भी चाहिए।

