Saturday, June 6, 2026
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जबरदस्ती का नदी जोड़

NAZARIYA 1


HEMANSHU THAKUR 1हाल ही में केंद्रीय केबिनेट ने जिस धूमधाम के ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ को मंजूरी दी है उससे कई सवाल खड़े हो रहे हैं। व्या्पक प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव वाली इस परियोजना को मंजूरी देते समय न सिर्फ नीति-नियमों की अनदेखी की गई है, बल्कि सर्वोच्ची न्यालयालय और ‘राष्ट्री य हरित न्या याधिकरण’ (एनजीटी) में विचाराधीन मामलों के निराकरण का इंतजार तक नहीं किया गया है।
केबिनेट के इस निर्णय ने एक सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केबिनेट उस परियोजना को मंजूरी दे सकती है, जिसे अभी तक वैधानिक स्वीकृतियां तक नहीं मिली हैं तथा जिसकी वैधानिक स्वीकृति को चुनौती देने वाले मामले विभिन्नव न्यायिक संस्थानों में विचाराधीन हैं। प्रधानमंत्री और केंद्रीय केबिनेट इसके माध्यम से क्या संकेत देना चाहते हैं? ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ को इस तरह मंजूरी देने का वैधानिक और न्याययिक संस्थाओं पर क्याह प्रभाव पड़ेगा?

30 अगस्त 2019 को ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ के बारे में सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत एक पथ-प्रदर्शक और उल्लेखनीय रिपोर्ट में ‘सीईसी’ ने जो बुनियादी सवाल खड़े किए थे वे वन्यजीव मंजूरी की उपयुक्तता, परियोजना की व्यावहार्यता, उपयोग और परियोजना की जरूरत से संबंधित थे। इस रिपोर्ट के अनुसार यह परियोजना ‘पन्न टाइगर रिजर्व’ की 9,000 हेक्टर जमीन डुबाने के अलावा 10,500 हेक्टार जमीन में वन्यजीव पर्यावास को भी नुकसान पहुंचाएगी। परियोजना निर्माता ‘राष्ट्रीय जल अभिकरण’ द्वारा तैयार विस्तृरत परियोजना रपट कहती है -‘केन-बेतवा लिंक परियोजना का मुख्यज उद्देश्य ऊपरी बेतवा कछार के जल संकटग्रस्त इलाकों में पानी उपलब्ध करवाना है…’ जबकि बेतवा का ऊपरी कछार बुंदेलखंड से बाहर है तथा वहां बुंदेलखंड से ज्यादा बारिश होती है। इस परियोजना से बुंदेलखंड के जिन हिस्सों में पानी पहुंचाने का आश्वासन दिया जा रहा है, उनमें से अधिकांश हिस्सों में या तो किसी अन्य परियोजना से पानी मिल रहा है या फिर उनके बारे में दशकों से सिर्फ आश्वासन ही दिए जा रहे हैं। ‘वन सलाहकार समिति’ (एफएसी) और ‘सीईसी’ दोनों का मानना है कि ‘राष्ट्रीय जल विकास प्राधिकरण’ ने इस परियोजना के विकल्पों पर ध्यान नहीं दिया है।

यह परियोजना इस तर्क पर आधारित है कि दोनों नदियों में से छोटी नदी केन में अतिरिक्त पानी है, जिसे बेतवा नदी में स्थानांतरित किया जा सकता है। लेकिन जिन जल विज्ञान संबंधी आंकड़ों के आधार पर इसको स्वीकार किया गया है वे आंकड़े स्वतंत्र परीक्षण हेतु सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। जमीनी सच्चाई और उपलब्ध तथ्य बताते हैं कि तिकड़म के आधार पर इस परियोजना को मंजूरी दी गई है।

इस संबंध में ‘एफएसी’ का बहुत महत्वपपूर्ण सुझाव, जिसे कभी लागू नहीं किया गया, यह है-‘सतही जल-विज्ञान के प्रमुख संस्था नों के स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक टीम से ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ के जल-विज्ञान संबंधी पक्षों का परीक्षण करने का निवेदन किया जाना चाहिए।’ इतनी महंगी और व्यापक प्रभाव डालने वाली परियोजना के जल-वैज्ञानिक आधार की स्वतंत्र जांच करवाने से सरकार इतना क्यों डरती है? स्पष्ट है, इसमें बहुत कुछ छिपाया गया है। ‘सीईसी’ ने पदार्फाश किया है कि अगस्त 2017 में जिस अत्यधिक शर्मनाक और दिखावे के ‘पर्यावरणीय प्रभाव आकलन’ (ईआईए) के आधार पर ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ को पर्यावरणीय मंजूरी दी गई है, परियोजना के प्रभाव उससे पूरी तरह से अलग होंगे। ‘एफएसी’ सहित कई सरकारी एजेंसियों ने ‘ईआईए’ में तथ्यात्मक गलतियों का उल्लेख किया है।

‘पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ की ‘विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति’ द्वारा दिसंबर 2016 में परियोजना हेतु की गई पर्यावरणीय मंजूरी की सिफारिश खुद अपने आप में भारी हेराफेरी की कवायद है, क्योंकि नदी घाटी परियोजनाओं संबंधी इसी समिति ने अपनी पिछली पांच मीटिंगों में इस परियोजना पर कई सवाल उठाए थे। तत्का्लीन ‘जल संसाधन मंत्री’ उमा भारती ने तो परियोजना को मंजूरी न देने पर इस समिति को सार्वजनिक रूप से धमकाते हुए धरना तक देने की चेतावनी दी थी। इसके बाद मंत्रालय ने समिति का पुनर्गठन किया और उसने अपनी पहली ही मीटिंग में इस परियोजना को मंजूरी दे दी। ‘एफएसी’ की ये पंक्तियां गौर करने लायक हैं-‘पन्ना टाईगर रिजर्व के पुराने जंगलों और इसकी समृद्ध जैव विविधता के मद्देनजर इसके भीतर बांध का निर्माण सूखाग्रस्त बुंदेलखंड इलाके में जल संसाधन विकास का सर्वोत्तम उपलब्ध विकल्प नहीं है…परियोजना की कुल लागत में वन विस्था्पन के कारण पारिस्थितिक तंत्र के नुकसान की कीमत शामिल नहीं की गई है…यदि पारिस्थितिक तंत्र संबंधी हानियों की कीमतों को जोड़ा जाए तो ‘लाभ-लागत अनुपात’ बहुत कम होगा जो परियोजना को अव्यहवहार्य बना देगा।’

‘एफएसी’ का निष्कर्ष कड़ा है- ‘आदर्श स्थिति में ‘पन्नाा टाईगर रिजर्व’ जैसे जंगल इलाकों में ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ को टालना बेहतर होता। खासकर तब, जब इसका औचित्यत साबित करने का जोखिम हो या संरक्षित क्षेत्र के भीतर ऐसी ही अन्य विकास परियोजनाओं की गलत परंपरा शुरू हो जाए।’ ‘एफएसी’ के इन निष्कर्षों के खिलाफ जाकर इस विनाशकारी परियोजना को मंजूरी देने के लिए प्रधानमंत्री या केंदीय केबिनेट की क्या मजबूरी हो सकती है? तत्कालीन ‘केंद्रीय जल संसाधन सचिव’ का संक्षिप्त जवाब इसे आसानी से समझाने के लिए पर्याप्त है कि इसकी लागत 45 हजार करोड़ रुपये है। शायद यही परम सत्य है।


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