- रेलवे स्टेशन और गाड़ियों के रैकों की सफाई करने की है जिम्मेदारी
- एस्टॉल कंपनी के अधीन है 40 संविदा कर्मचारी
- कंपनी नहीं कर रही सुनवाई, रेलवे ने भी खड़े किए हाथ, कहा-नहीं है हमारी जिम्मेदारी
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: जिस रेल के डिब्बे में आप सफर करते हैं। उसकी व रेलवे स्टेशन की सफाई करने की जिम्मेदारी एस्टॉल कंपनी पिछले दो साल से उठा रही है, लेकिन अब इस कंपनी का ठेका समाप्त होने जा रहा है। जिसके चलते कंपनी के लिए काम करने वाले संविदाकर्मियों पर मुसीबत आ गई है, लेकिन इनकी सुनवाई करने वाला कोई नहीं है।

मेरठ सिटी रेलवे स्टेशन पर सफाई का ठेका लेने वाली एस्टॉल कंपनी की जिम्मेदारी उन गाड़ियों के रैकों की सफाई व्यवस्था की भी है, जो यहां से बनकर चलती है। इनमें संगम एक्सप्रेस, नौचंदी एक्सप्रेस व खुर्जा पेसेंजर की सफाई पहली शिफ्ट में जबकि मेरठ शटल व डाउन खुर्जा पेसेंजर की दूसरी शिफ्ट में होती है। पहली शिफ्ट का समय सुबह आठ बजे से शाम पांच बजे जबकि दूसरी शिफ्ट का समय रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक है।
इन शिफ्टों में काम करने के लिए कुल 40 संविदाकर्मी तैनात है, लेकिन पिछले तीन माह से इन कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला है। कई कर्मचारी दूसरे जिलों व बिहार और उत्तरांचल तक के है, जो यहां किराए पर रहते हैं। इन कर्मचारियों की वेतन नहीं मिलने से आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो चली है। वहीं, इस मामले पर कंपनी के एजीएम राजीव से बात की गई तो उन्होंने बताया कि वह पिछले काफी समय से छुट्टी पर है।
इस मामले में वह कुछ नहीं कह सकते। कंपनी के सुपरवाइजर विनीत का कहना है कि कर्मचारी काफी समय से वेतन मांग रहे हैं, जो नहीं मिल रहा है। कंपनी का ठेका खत्म होने जा रहा है। उसकी भी तनख्वाह काफी समय से रुकी हुई है, लेकिन उसे उम्मीद है कि कंपनी उसका वेतन दे देगी। उधर, सिटी रेलवे स्टेशन के अधीक्षक आरपी सिंह का कहना है कि हमारे यहां पर सीएनडब्लू डिपार्टमेंट है।
जिसके द्वारा कंपनी को ठेका दिया जाता है। पिछली कंपनी का टेंडर पूरा हो गया है, अब नई कंपनी को टेंडर दिया जा रहा है। रेलवे तो कंपनी को पेमेंट करती है। अब इनके काम नहीं करने पर रेलवे ठेकेदार पर पेनाल्टी लगाएगी, लेकिन इन कर्मचारियों से रेलवे का सीधा संबंध नहीं है।
कर्मचारियों के परिवार भूखे मरने की कगार पर
जिन 40 कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला है। उनकी आर्थिक स्थिति बेहद नाजुक हो चली है। इस समय उनके परिवारों के सामने भूखे मरने की नौबत आ चुकी है। कंपनी के अधिकारियों ने फोन भी उठाना बंद कर दिया है।
11 हजार 500 रुपये वेतन
कर्मचारियों का कहना है कि उनको जो वेतन नौकरी पर रखते समय बताया गया था। उतना वेतन कभी नहीं मिला। कंपनी अलग-अलग फंड के नाम पर उनका वेतन काट लेती है। जिसके बाद उन्हें केवल साढ़े सात हजार रुपये ही मिलते हैं। जिन फंड्स को लेकर वेतन काटा जाता है न तो उसकी सुविधा मिली न ही उसका कभी भुगतान हुआ। पिछले तीन माह से एक भी पैसा नहीं दिया गया।
घायल होने पर खुद ही कराते है इलाज
ड्यूटी के दौरान अगर कोई कर्मचारी चोटिल हो जाता है तो उसका इलाज भी कंपनी नहीं कराती। कर्मचारी खुद ही अपना इलाज कराते हैं। जबकि नौकरी पर रखते समय कंपनी का दावा था कि वह इलाज की सुविधाएं भी उपलब्ध कराएगी। इसके बदले कर्मचारी के वेतन से फंड भी काटा जाता रहा, लेकिन सुविधा नहीं मिली।

