Saturday, March 21, 2026
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ठंड के नाम एक व्यंग्यकार का खत

प्रिय ठंड, सुबह के ग्यारह बज रहे हैं। और, मैं अभी भी राजाई में पसरा पड़ा हूं। उठने की हिम्मत नहीं कर पा रहा। हिम्मत ने लगभग जवाब दे दिया है। एक हफ्ते से दफ्तर का मुंह नहीं देखा है। बॉस को बोल रखा है-‘बीमार हूं। आ नहीं सकता।’ लेकिन बीमारी को भी कितना लंबा खींचा जाए! महीने भर से तुमने नाक में दम कर रखा है। पूरा दिन या तो राजाई में बीतता है या फिर कुछ न कुछ खाते-पीते। शरीर पर इतनी चर्बी चढ़ गई है कि आईने में खुद को देखने की इच्छा नहीं करती। आईना बुरा लगने लगा है।

अब तो बीवी भी ताना देने लगी है- ‘दिनभर राजाई में पड़े रहने से गृहस्थी नहीं चल जाएगी। ठंड सिर्फ तुम्हारे लिए ही नहीं, सबके लिए है। कैसे मर्द हो, ठंड से डर गए!’ बीवी को कैसे समझाऊं, मैं ठंड से नहीं, ठंड के सितम से डरता हूं। उसे नहीं पता कि ठंड का सितम कितना जानलेवा होता है। एक दफा इसकी चपेट में आए नहीं कि छटी का दूध याद आ जाता है। वरना, किसी जमाने में मैं न कभी ठंड से डरा न इसके सितम से। तब अपनी जवानी की उमर थी। खून गरम था। दिल मजबूत था। हिम्मत कूट-कूटकर भरी थी। जाड़ा, गरमी, बरसात शरीर सब झेल लेता था। अब थोड़ा उमर और जिम्मेदारी का तकाजा है बस। इस उम्र में ठंड बर्दाश्त नहीं होती।

पता नहीं लोगबाग कैसे कह देते हैं- ‘ठंड को इन्जॉय करो। दबाकर खाओ। सेहत बनाओ। धूप का आनंद लो। लंबी तानकर सो।’ यहां आलम यह है कि ठंड में कबूतर बने बैठे हैं। न कहीं जा सकते। न किसी को बुला सकते। सूर्य देवता अलग परीक्षा ले रहे हैं। शीतलहर और कोहरे के बीच जिंदगी उलझकर रह गई है। राजाई से जरा मुंह निकलो कि बाहर कोहरे की सफेद चादर नजर आती है। देखते ही कंपकंपी छूट जाती है। दिमाग सुन्न पड़ जाता है। सर्द हवा होश और जोश फाख्ता कर देती है। इतनी विकट ठंड को भला कोई कैसे इन्जॉय करे?

ठंड का सिर्फ एक फायदा है, रोज नहाने के झंझट से मुझे मुक्ति मिल जाती है। अगर आप यकीन कर पाएं- एक महीने में कुछ जमा दो बार ही नहाया हूं। शरीर को रोज-ब-रोज कष्ट देना उचित नहीं समझता। शरीर कहीं बुरा मान गया तो लेने के देने भी पड़ सकते हैं। शरीर है तो सबकुछ है; है न। अच्छा, ठंड में सोच-विचार भी जम जाते हैं। नए विचार दिमाग में आते ही नहीं। अब इस व्यंग्य को लिखने में मुझे कितनी मशक्त करनी पड़ी, मैं ही जानता हूं। एक दो लाइन लिखने के बाद ही विचार और दिमाग साथ छोड़ देते थे। फिर-फिर उन्हें जगाना पड़ता था। बड़ी मुश्किल से पिघलकर निकल पाते थे। शब्द भी जैसे सर्दी में जम जाते हैं।

हे! प्रिय ठंड, तुमसे करबद्ध प्रार्थना है- तुम अब जाओ। हमें और न जमाओ। जम-जमकर इतना पक और थक चुके हैं कि खुद पर ही गुस्सा आने लगा है। भावनाओं को समझो। अपना रस्ता देखो। बहुत हो चुकी ठंड। अब कहीं और जाकर अपना जलवा दिखाओ।

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