Tuesday, February 3, 2026
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गलतियां स्वीकार दें भविष्य को निखार

डॉ विजय गर्ग

जीवन में ग़लतियां होना स्वाभाविक हैं। हम सभी ग़लतियां करते हैं। कहा भी गया है कि इंसान ग़लतियों का पुतला है। इसका एक निहितार्थ ये भी हो सकता है कि व्यक्ति अपनी ग़लतियों से सीख कर ही इंसान बनता है। जैसे विभिन्न कठिनाइयां ही मनुष्य को विषम परिस्थितियों में जीना और आगे बढ़ना सिखाती हैं वैसे ही उसकी ग़लतियां भी मनुष्य को सबसे अधिक सीखने का अवसर प्रदान करती हैं। ग़लतियों के अभाव में मनुष्य कैसे कुछ सीखेगा? ग़लती कोई अपराध नहीं लेकिन ग़लतियों को सुधारना ज़रूरी है। ग़लती को न सुधारने से वह आदत बन जाती है, हमारे व्यवहार का अंग बन जाती है और हमारा अनिष्ट करके ही छोड़ती है। इसीलिए ग़लती का पता लगने पर भी उस ग़लती को दूर न करना अथवा एक ग़लती को बार-बार दोहराना अपराध नहीं होने पर भी अपराध से कम नहीं माना जाता। प्रायः जब हमसे कोई बड़ी ग़लती हो जाती है तो उसको छुपाने के लिए दूसरी ग़लती कर देते हैं और कई बार अपराध तक कर डालते हैं।

जो व्यक्ति एक ही ग़लती को बार-बार करे उसके लिए अंग्रेज़ी में एक शब्द है एररिस्ट। एक एररिस्ट व टेररिस्ट में कोई विशेष अंतर नहीं होता। जब कोई व्यक्ति अपनी ग़लती को स्वीकार करके उसे सुधारने के बजाय उसे बार-बार करता है तभी वह टेररिस्ट या आतंकवादी बनता है। चोरी करना, परिग्रह एवं अतिशय लोभवृत्ति, झूठ बोलना, दादागीरी व हिंसा का सहारा लेना, आज का कार्य कल पर टालना, अपनी भावनाओं या विचारों पर नियंत्रण न करना, बात-बात पर क्रोध करना, क्षमाशीलता व संवेदनशीलता का अभाव, हर स्थिति में असंतुष्ट व छिद्रान्वेषी बने रहना व अन्य दूसरे नकारात्मक भाव या आदतें ऐसी ग़लतियां अथवा भूलें हैं जिन्हें स्वीकार करके उन्हें दूर करना या सुधारना अनिवार्य है। अन्यथा हमारे एक सामान्य व्यक्ति से निकृष्ट व्यक्ति में बदलते देर नहीं लगती। इन्हीं ग़लतियों के कारण एक व्यक्ति कुख्यात बन जाता है और इन्हीं को सुधारकर विख्यात अथवा प्रख्यात हो जाता है। वास्तव में हमारे सभी नकारात्मक भाव या उनसे उत्पन्न सब कर्म हमारी ग़लतियां ही होते हैं और उन्हें सुधारकर उनके स्थान पर सकारात्मक भाव या उनसे उत्पन्न सब कर्म ही जीवन का अपेक्षित विकास करते हैं।

ग़लतियां किससे नहीं होतीं? गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में अपनी ग़लतियों अथवा कमियों को स्पष्ट रूप से लिखा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी जीवन में अनेक ग़लतियां कीं लेकिन उन्होंने कभी भी किसी ग़लती को छुपाया या दोहराया नहीं। उन्होंने हिम्मत के साथ अपनी ग़लतियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारा। गांधी जी के बचपन की एक घटना है। उन पर एक दुकानदार का काफ़ी क़र्ज़ हो गया। उनका क़र्ज़ उतारने के लिए उन्होंने अपनी माताजी के सोने के कड़ों में से थोड़ा सा सोना काटकर बेच दिया और अपना क़र्ज़ चुका दिया। इस घटना से उन्हें बहुत दुख हुआ। वे आत्मग्लानि से भर उठे। वे सारी बातें अपने पिताजी को बतलाकर उनसे माफी मांगना चाहते थे लेकिन ऐसा करने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। उन्होंने सारी बातें एक चिट्ठी में लिखीं और चिट्ठी पिताजी को दे दी। उनके पिता बीमार थे। जब उन्होंने चिट्ठी पढ़ी तो उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। गांधी जी भी रोने लगे और उन्होंने पिताजी के सामने प्रण किया कि जीवन में कभी भी ग़लत कार्य अथवा चोरी नहीं करेंगे।

हम सब जानते हैं कि गांधी जी ने जीवनभर अपने प्रण को बख़ूबी निभाया ही नहीं अपितु अपने दूसरे अवगुणों को भी त्याग कर सद्गुणों को अपने जीवन का आधार बनाया। जब पहली बार कोई ग़लती हो जाए तो उसे छुपाने के बजाय स्वीकार कर सुधार लेना ही दुरात्मा बनने के बजाय महात्मा बनने की दिशा में अग्रसर होना है। जब भी हम कोई नया काम करना सीखते हैं तो भी कुछ कमियां या ग़लतियां अवश्य रह जाती हैं। तो क्या हम वो काम करना ही बंद कर दें या जीवनभर ग़लतियां ही करते रहें? यदि हम चलते-चलते गिर पड़ें तो क्या हम वहीं पड़े रहें या उठकर वापस लौट जाएं? नहीं। गिरने के बाद उठना और दोबारा सावधानीपूर्वक आगे बढ़ना ही उन्नति व विकास का वास्तविक मार्ग है। ग़लती मानना भी बहुत हिम्मत की बात है और ग़लती मानने वाला अपराधी नहीं बहादुर व्यक्ति होता है। बहादुर व्यक्ति ही संसार में विजयी होते हैं।

एक अपराधी ही नहीं एक कायर अथवा डरपोक व्यक्ति भी कभी अपनी ग़लती को नहीं मानता इसीलिए न तो उसकी ग़लती का सुधार होता है और न वह जीवन में आगे ही बढ़ता है। रत्नाकार नामक व्यक्ति को जब अपनी ग़लतियों का अहसास हुआ और तो अपना निकृष्ट पेशा त्यागने का निर्णय लिया तो तब जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। उनकी संवेदना इतने चरम पर पहुंच गई कि उन्होंने रामायण जैसे महाकाव्य का सृजन कर डाला और आदि कवि के रूप में विख्यात हुए। अपनी कमियों को खोजकर व उन्हें सुधारकर हम चाहें तो संत बन सकते हैं और न सुधार कर वीरप्पन या दाऊद बने रहने को अभिशप्त हो सकते हैं। श्रेयस्कर तो यही है कि हम अपनी ग़लतियों को स्वीकार कर, उन्हें सुधार कर व उनसे सीख लेकर निरंतर आगे बढ़ते रहने का प्रयास करते रहें। ग़लती करने व हर ग़लती को स्वीकार कर उसे सुधारने में ही निहित है जीवन का वास्तविक विकास।

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