लीची एक स्वादिष्ट और रसीला फल होता है, जिसकी गुणवत्ता उत्कृष्ट होती है। लीची का वैज्ञानिक नाम लीची चिनेंसिस है, वनस्पति रूप से यह सैपिंडेसी परिवार से संबंधित है। लीची की फसल भारत में कई स्थानों पर उगाई जाती है। लीची की खेती के लिए विशेष जलवायु परिस्थितियों की आवश्यकता होती है, लेकिन यह पौधा मिट्टी को लेकर बहुत अधिक चयनशील नहीं होता। यह पौधा वायरल रोगों से भी बहुत कम प्रभावित होता है।
लीची की फसल के लिए जलवायु
लीची उत्पादन के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है। फूल आने के लिए इसे एक ठंडी और शुष्क ऋतु से उत्पन्न शाकीय अवधि चाहिए। कुछ आर्द्र क्षेत्रों में तापमान और सापेक्षिक आर्द्रता में हल्की गिरावट फूल आने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित कर सकती है। फूलों की बालियों के दिखाई देने से लेकर फसल की कटाई तक नमी की अच्छी उपलब्धता अनिवार्य होती है। लीची ठंड के मौसम में पाला और गर्मी के मौसम में शुष्क गर्मी सहन नहीं कर सकती।
लीची की फसल के लिए मिट्टी
लीची की फसल गहरी, अच्छी जल निकासी वाली, जैविक पदार्थों से भरपूर दोमट मिट्टी में अच्छी तरह विकसित होती है, जिसकी स्रऌ सीमा 5.0 से 7.0 के बीच होती है। लीची थोड़े समय तक के लिए जल भराव को शान कर सकती है। लेकिन लंबे समय तक जलमग्न रहना हानिकारक होता है। जल निकासी का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि लीची प्राय: अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों और निचले इलाकों में उगाई जाती है, जहाँ पौधों को हवा से बचाया जाता है।
लीची की किस्में
क्वाई मी (मॉरीशस, ताई सो) : इस किस्म के फल मध्यम आकार (22 से 25 ग्राम) के होते हैं और 12 से 30 के गुच्छों में चमकीले लाल रंग के दिखाई देते हैं। फलों की गुणवत्ता अच्छी होती है। यह हिंद महासागर क्षेत्र में सबसे व्यापक रूप से पाई जाने वाली किस्म है। पेड़ मध्यम वृद्धि वाले और पतले आकार के होते हैं।
रोज सेंटेड: लीची की इस किस्म के फल मध्यम आकार (16 ग्राम) के होते हैं, गोलाकार और दिल के आकार के दिखाई देते हैं। गूदा बहुत मीठा होता है और उसमें गुलाब की सुगंध पाई जाती है, इसी वजह से इसका नाम पड़ा है। यह किस्म मुख्य रूप से भारत के उत्तरांचल में उगाई जाती है।
शाही (मुजफ्फरपुर): शाही लीची की किस्म के फल मध्यम आकार (20 से 25 ग्राम) के होते हैं और चमकीले गुलाबी रंग के और गुच्छों में पाए जाते हैं। गूदा मीठा होता है। यह बिहार राज्य में सबसे आम किस्म है। इसकी निर्यात गुणवत्ता बहुत अच्छी होती है, लेकिन इसमें फटने और धूप से झुलसने की समस्या देखने को मिलती है। इस किस्म के पौधे तेजी से बढ़ते हैं और नियमित उत्पादन देते हैं (प्रति पौधे 80 से 100 किलोग्राम)।
चक्रपद: यह किस्म बड़े आकार का दिल के आकार का फल देती है (लगभग 32 ग्राम)। इसकी त्वचा पतली और लचीली होती है, रंग गहरा लाल होता है जिसमें पीले धब्बे पाए जाते हैं। गूदा मध्यम रूप से रसदार होता है और उसमें हल्की खटास बनी रह सकती है। इसमें गुठली अपेक्षाकृत बड़ी होती है। पेड़ औसत वृद्धि वाले होते हैं, सीधी बढ़वार के साथ लंबी शाखाएं और घना पर्णसमूह (पत्तियां) पाए जाते हैं।
लीची की खेती से लाभ प्राप्त करने के लिए सबसे पहले भूमि की तैयारी की जाती है। यदि खेती का काम मशीनीकरण से किया जा सकता है, तो गहरी जुताई के बाद हल चलाया जाता है, संभवत: गोबर की खाद और फॉस्फेट तथा पोटाश उर्वरक (मृदा परीक्षण के परिणामों के आधार पर) डालने के बाद। जब पौधों को गड्ढों में लगाया जाता है, तो इस चरण पर आवश्यक तत्व डाले जाते हैं।
पौधे कैसे तैयार करें?
लीची उत्पादन के लिए पौधों की तैयार सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है, लीची के प्रसार के लिए वायु स्तरीकरण (एयर लेयरिंग) सबसे अधिक प्रचलित तरीका है। इसके लिए एक साल पुरानी, स्वस्थ और मजबूत शाखाओं का चयन किया जाता है। चुनी हुई टहनी पर कली के नीचे करीब 2 सेमी चौड़ी छाल उतार दी जाती है। इस घाव वाले हिस्से पर रूटोन लगाने से जड़ों का विकास तेज और बेहतर होता है। इसके बाद उस हिस्से को 2 भाग गीली काई और 1 भाग पुराने लीची वृक्ष के तने के पास की मिट्टी के मिश्रण से बने गोले में लपेटकर पॉलीथीन शीट से अच्छी तरह बांध दिया जाता है, ताकि नमी और वायुरोधक स्थिति बनी रहे। करीब 2 महीने में पर्याप्त जड़ें बनने के बाद उस शाखा को नीचे से काटकर नर्सरी में रोपित कर दिया जाता है। यह प्रक्रिया जुलाई से अक्टूबर तक सबसे उपयुक्त रहती है। लगभग 6 महीने तक नर्सरी में पाले गए वायु स्तरीकृत पौधों को मानसून के समय स्थायी खेत में लगाया जाता है।
लीची कैसे उगाएं
जब नर्सरी में पौधे लगभग 6 महीने के हो जाते हैं, तब उन्हें खेत में रोपित किया जाता है। इसके लिए 8-10 मीटर की दूरी पर वर्ग पद्धति में 90 गुणा 90 गुणा 90 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे तैयार किए जाते हैं। इन गड्ढों को भरने के लिए ऊपर की सतही मिट्टी में लगभग 40 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद, 2 किलोग्राम नीम या करंज खली, 1 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 200-300 ग्राम म्यूरेट आॅफ पोटाश मिलाया जाता है।
प्रशिक्षण और छंटाई
पौधों के शुरूआती विकास चरण में उन्हें उचित ढांचा देने के लिए प्रशिक्षण आवश्यक होता है। इसमें अवांछित शाखाओं को हटाकर वृक्ष को संतुलित आकार दिया जाता है, जिससे तना और छत्रक (कैनोपी) बेहतर रूप से विकसित हो सके। उपयुक्त ढांचे के लिए पौधे की 60-75 सेमी ऊंचाई पर विपरीत दिशा में 3-4 शाखाएँ रखी जाती हैं। भीड़भाड़ वाली, आपस में रगड़ने वाली या संकरी कोण वाली शाखाओं को हटा दिया जाता है, क्योंकि संकरी कोण वाली शाखाएं आसानी से टूट सकती हैं। परिपक्व वृक्षों की गैर-फलित और अनुपयोगी शाखाएं, सूखी, रोगग्रस्त और एक-दूसरे को काटती हुई शाखाएं भी समय-समय पर छांट दी जानी चाहिए। कटाई के बाद हल्की छंटाई करने से वृक्ष का विकास बेहतर होता है, फलन को बढ़ावा मिलता है और उपज में सुधार होता है। फसल की तुड़ाई के दौरान फलों को 8-10 सेमी लंबी टहनी सहित तोड़ना चाहिए। ऐसा करने से पौधे में नई वृद्धि को प्रोत्साहन मिलता है और अगले वर्ष अधिक उत्पादन मिलता है।
लीची की कटाई, तुड़ाई और उपज
लीची के फल गुच्छों सहित तोड़े जाते हैं, जिनमें टहनी का कुछ हिस्सा और पत्तियां भी शामिल रहती हैं। कटाई के समय केवल पूरी तरह परिपक्व गुच्छों को तोड़ा जाता है। फलों की परिपक्वता का निर्धारण मुख्य रूप से उनके रंग और गूदे के स्वाद से किया जाता है। कटाई का समय प्रात:काल (सुबह) का उपयुक्त माना जाता है, जब तापमान और आर्द्रता फल की भंडारण क्षमता (शेल्फ-लाइफ) को बनाए रखने में सहायक होते हैं। कटाई के दौरान फलों को सावधानीपूर्वक इकट्ठा किया जाता है, ताकि वे जमीन पर न गिरें।

