आचार्य श्रीहरि
अमेरिका को ले डूबेगी भस्मासुरी,पाकिस्तानी परस्ती। यह सौ प्रतिशत सही है। इतिहास देख लीजिये, परिस्थितियां देख लीजिये, समीकरण देख लीजिये, मूर्खता देख लीजिये, दुष्परिणाम भी देख लीजिये, इन सभी कसौटियों का आकलन और विश्लेषण कर लीजिये। अमेरिका खुद अपने लिए पहले गढा खोदता है, कब्र खोदता है, कुएं और खाई खोदता है फिर इन सभी में खुद ही फंस जाता है, इनसे बाहर निकलने के लिए कभी पैसे पानी की तरह बहाता है, कभी सैनिकों की हिंसक पैंतरेबाजी दिखाता है, जीत और अहंकार को तुष्ट करने के लिए हिंसा और प्रतिहिंसा की आग को धधकाता है, जिसमें निर्दोष लोगों की जिंदगियां खाक कर देता है, शांति और सद्भाव को आग में झोेक देता है। पहले वियननाम में अपनी जगहंसाई करायी, फिर अफगानिस्तान में अपनी अर्थव्यवस्था जलायी, अपने ही सैनिकों का संहार कराया और निरर्थक युद्ध को लड़ने का कार्य किया। क्या वियतनाम में अमेरिकी हस्तक्षेप जरूरी था? वियतनाम का हस्तक्षेप और हार अमेरिकी इतिहास के लिए कंलक के तौर पर उपस्थित है।
अफगानिस्तान में अमेरिका की जीत कभी नहीं हुई बल्कि तालिबान ने अमेरिका को भागने के लिए विवश किया था। सीरिया में भी अमेरिकी हस्तक्षेप और सामरिक नीति की फजीहत हुई, करारी हार हुई, अमेरिका को उसी आतंकतवादी की चरणवंदना करनी पड़ी है जो कभी अमेरिका का मोस्ट वांटेड था और आतंकवाद की दुनिया मे घृणित और हिंसक चेहरा था।
अभी-अभी अमेरिका की ईरान में फजीहत हुई। ईरान को पराजित किये बिना अमेरिका अपनी जीत मान रहा है, अपनी जीत का प्रचार कर रहा है, ईरान की करारी हार का दावा कर रहा है जबकि सच्चाई कुछ और ही है, फिर सच्चाई क्या है, यह भी देख लीजिये। सच्चाई यह है कि ईरान ने अमेरिका के सामने समर्पण नहीं किया, ईरान ने अमेरिका और इस्राइल को जवाब दिया, अपने हमलों से इस्राइल में भी तबाही पहुचायी, इस्राइल की तबाही को ईरान अपनी जीत बता रहा है।
तालिबान किसने खडा किया, पाकिस्तान को आतंकी देश किसने बनाया, ईरान को परमाणु बम बनाने की नींव किसने डाली थी? इन सभी के पीछे के सच का विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि अमेरिका ही गुनहगार है, खलनायक है और बदबूदार चेहरा है। सोवियत हस्तक्षेप को चुनौती देने के लिए अमेरिका ने आतंकी संगठनों को खड़ा किया। इनको बढ़ाने में अमेरिका ने अपने पैसे पानी की तरह बहाया। अफगानिस्तान में सोवियत संघ की पराजय जरूर हुई, सोवियत संघ अपनी तानाशाही के क्रूर हाथों का ही शिकार हो गई।
सद्दाम हुसैन के संहार पतन की कहानी में अमेरिका को क्या हासिल हुआ? सद्दाम हुसैन के पतन और संहार में अमेरिका वर्षों उलझा रहा। आज इराक असफल देश बन चुका है, शांति की उम्मीद बेमानी हो चुकी है, राजनीतिक एकता भी बहुत दूर है। कहने का अर्थ यह हुआ कि अमेरिका को इराक में बदनामी और हिंसा के अलावा कुछ भी हासिल नहीं हुआ। पाकिस्तान को हिंसक और एक कट्टर देश में तब्दील करने के पीछे अमेरिका की नीति क्या थी? किस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अमेरिका ने जिहादी पाकिस्तान को खड़ा किया था। पाकिस्तान आतंक का बेताज बादशाह बन गया। पाकिस्तान के आतंकी सिर्फ भारत में ही आतंक और हिंसा नहीं बरपाये बल्कि दुनिया का कौन ऐसा बड़ा देश है जहां पर पाकिस्तानी आतंकी किसी न किसी रूप में हिंसा, आतंक का खेल नहीं खेला है? पाकिस्तान पैसे लेकर परमाणु बम की थ्यौरी ईरान सहित अन्य मुस्लिम देशों को देने की नीति पर काम करता है। इसलिए यह कहना सही हे कि पाकिस्तान का परमाणु बम असुरक्षित है और परमाणु प्रसार की आशंकाएं सही हैं।
लेकिन अमेरिका ने अपनी पिछली गलतियों से कुछ भी नहीं सीखा है, कुछ भी सबक नहीं लिया है। मूर्खताओं को छोडने के लिए तैयार नहीं है। अब फिर से पाकिस्तान की चरणवंदना अमेरिका कर रहा है। पाकिस्तान की सेना सरगना मुनीर को अमेरिका ने अपने यहां आमंत्रित कर उसकी चरणवंदना की और उसकी पीठ थपथपायी है। भारत ने आतंकवादी मानसिकता को दमन करने के लिए अपनी वीरता दिखायी और पाकिस्तान को सबक भी सिखाया है। अमेरिका को भारत की इस वीरता की प्रशंसा करनी चाहिए। पर अमेरिका अब पाकिस्तान की पीठ थपथपा रहा है और दुनिया के नियामकों से अधाधुंध कर्ज उपलब्ध करा रहा है। पाकिस्तान विदेश्ी कर्ज और दान का इस्तेमाल गरीबी और भूख मिटाने में नहीं करता है बल्कि आतंकवादियों पर खर्च करता है। पाकिस्तान को फिर से मदद करने की अमेरिकी कार्रवाई निश्चित तौर हिंसक है और दुनिया की शांति व सद्भाव के लिए खतरे की घंटी है। अमेरिका खुद ही भस्मासुरों को पैदा करने और फिर अपनी फजीहत, दुर्गति और संहार कराने की नीति छोड़ती नहीं है।

