लोग मुझे प्यार से टॉमी, झामी, पप्पी और न जाने कितने नामों से पुकारते हैं। बच्चे मुझे गोद में लेने और मेरे साथ खेलने को उत्सुक रहते हैं। मैं भी बच्चों से बहुत प्यार करता हूं। इंसान से ज्यादा प्रकृति को प्यार करता हूं। कभी प्रकृति को गंदा नहीं करता। जहां रहता हूं वहां पूंछ फटकार जगह साफ करता हूं और फिर बैठता हूं। कुछ लोग मुझे घर में पालते हैं तो कुछ लोग गली में रोटी डालकर मुझे पूंछ हिलाते हुए देख प्रसन्न होते हैं तो कुछ लोग मुझे देख सुअर की तरह मुंह बना लेते हैं। मुझे भगवान के बगल में बैठा देखा होगा, युधिष्ठर के साथ जाते हुए देखा होगा, नेताजी की गाड़ियों में घूमते देखा होगा, मेम साब की गोदी में इन्सान बच्चा भले ही न हो लेकिन श्वान पप्पी से उन्हें परहेज नहीं होता। टफी को कुत्ता कहने पर मेम साब बिफर जाती है।
हमने हमेशा खतरे को इंसान से पहले महसूस किया है। हमारा कुत्तापन कभी इंसान पर भारी नहीं पड़ा, लेकिन जब भी इंसान को मौका मिला उसने हमारा स्वागत र्इंट-पत्थर से किया। असामाजिक तत्वों का हमसे विशेष रूप से बैर है। गली-मोहल्ले के आधे से ज्यादा अपराध हमारी वजह से रुक जाते हैं। जब घरों में सी सी टी वी नहीं थे, हम ही रखवाली करते थे। आज भी सी सी टी वी दिखा सकते हैं कौन चोर है, लेकिन उसे भगाने का जिम्मा हमारा ही होता है। नशेड़ी-गजेंड़ी हों या दारूड़े हमसे सभी घबराते हैं, लेकिन आज का इंसान हमारे ही अस्तित्व के खतरा हो गया है।
कई फिल्मों का हीरो मैं श्वान रहा हूं, लेकिन आज मुझे गली का कुत्ता, आवारा कुत्ता कह कर बेइज्जत किया जा रहा है। मेरे खिलाफ नेताजी ने घोड़े खोल रखे हैं, उनकी भैंस खोजने में जो मैंने महत्वपूर्ण कार्य किया था, उसे तो वे भूल गए और आज मेरे ही अस्तित्व को लेकर मी लॉर्ड की अदालत में याचिका दायर कर दी। ये आवारा कुत्ते रहेंगे या हम। मिलार्ड आप तो आदमी की भाषा नहीं समझ पाते तो हमारी भाषा और संवदेना कैसे समझेंगे? हमें तो वही भाषा होती जो वफादारी की होती है। वैसे भी नेताजी हमारी तरह वफादार हो नहीं सकते। वफादारी में आज तक हमारा कोई सानी नहीं है।
खैर… यह तथ्य है सही कि हमारे काटने से रैबिज होता है, क्या अन्य पशुओं/जानवरों के काटने से रैबिज नहीं होता? आदमी का काटा तो पानी नहीं मांग पाता। हमसे इतना ही डर है तो सभी इंसानों को जिस तरह अन्य टीके लगाय जाते हैं वैसे ही रेबिज का टीका क्यों नहीं लगवा दिया जाता? यह तो कोई इंसानियत नहीं कि हम श्वान को अपनी जन्मभूमि से अलग कर तिलतिल कर मरने को छोड़ दिया जाए? पहले आपने ही कहा था कि कुत्तों को उनके जन्म स्थान से कोई अलग नहीं कर सकता? अब आपको क्या हो गया? इलाज ही करना है तो उन जाहिल इन्सानों का करो जो बिना वजह हमें मारते हैं और फिर हम खुन्नस में किसी को भी काट लेते हैं।
पृथ्वी पर क्या जीने का अधिकार इन्सानों को ही है, यह पृथ्वी क्या केवल इंसानों के बाप की है?

