वैसे तो क्रांतिकारी लेखन के अग्रदूत श्रीमान साहित्य में स्वयंभू सम्राट ‘कवि पुरस्कारी’ के खाते में कितने ही पुरस्कार हैं। लेखन में साहित्य प्रेमी उन्हें कवि पुरस्कारी नाम से पहचानते हैं। पिछले दिनों उनके साथ एक अकादमिक घटना घट गई। उनकी साहित्यिक यात्रा में एक और पुरस्कार आते-आते अचानक से अंतिम समय उनके साहित्यिक हाथ से छिटक गया। उन्हें अब भी इसका भरोसा नहीं हो रहा है। उनके साहित्यिक जीवन की यह असंभव घटना है। आखिर ऐसा कैसे हो गया। कहां त्रुटि हो गई। राष्ट्रीय अकादमी से लेकर अंचल की समितियों तक उन्होंने सब बंदोबस्त पक्का कर दिया था, फिर यह घटना कैसे घटी ! इसके पीछे कोई विरोधी लेखक खेमे का षड्यंत्र तो नहीं?
पुरस्कार छिटकने पर लंबा चिंतन चल रहा है। अपने खेमे में सबकी खबर ली जा रही है। आखिर किसी अपने वाले ही ने तो नहीं यह षड्यंत्र रचा है। कवि पुरस्कारी मन ही मन बोलने लगे कि ‘आजकल अच्छी रचनाएं तो कोई लेखक रच नहीं रहा है, बस पुरस्कारों के लिए षड्यंत्र जरूर रच रहा है।’ कैसे-कैसे लेखकों को पुरस्कार मिल रहा है। ये भी कोई लेखक है! सब चापलूसी करते हैं और पुरस्कार पाते हैं। कवि पुरस्कारी पुरस्कारों की निष्पक्षता पर अकादमिक चिंतन में लीन रहने लगे। उन्हें पुरस्कार छिटकने का सुराग पता लगाना है ताकि अगली बार कोई कमी न हो। अपनी दिग्विजय पुरस्कार यात्रा में कोई बाधा उत्पन्न न हो। उन्होंने अपने खेमे में यह पंक्ति स्थापित कर दी है कि ‘मैं अब युगकवि हूं।’ जैसे उनके सारे चेले चपाटों के सामने वे कह रहे हो कि ‘हे पार्थ -कवियों में मैं युगकवि हूं!’
यह कैसे हो सकता है कि इस वर्ष मुझ युगकवि को एक भी पुरस्कार न मिले। साहित्य की कौनसी विधा है जिसमें युगकवि ने नहीं लिखा। साहित्य की सेवा में कहां कमी रह गई। सेवा के बदले कवि का मेवा कौन ले उड़ा। कवि ने कैसा अद्भुत साहित्य रचा है। वह बात अलग है कि पाठक इन रचनाओं को पढ़ता नहीं! कौन है जो मेरा पुरस्कार छिटक गया। मैंने कितना खर्चा किया था। स्वयं के धन से पुस्तकें प्रकाशित करवार्इं। कहां-कहां पुस्तकों की प्रतियां भेंट नहीं की। राजधानी की साहित्य अकादमी से लेकर अंचल की काव्य गोष्ठियों में मैंने फूल मालाएं, शाल-श्रीफल, समोसा-कचोरी, माईक-मंच, लिफाफे आदि की व्यवस्था में आखिर मैंने कोई कमी नहीं रखी। फिर इस बार पुरस्कार कैसे छिटक गया।
विगत दो दशक से कवि पुरस्कारी पुरस्कृत होते आ रहे हैं। अपनी गली के गणेश उत्सव से लेकर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय समितियां उन्हें पुरस्कृत करती रही हैं। हर साल दिपावली पर पुरस्कारों की सफाई में कवि पुरस्कारी की श्रीमती जी का लंबा समय तो इसी में निकल जाता है। हो सकता है वे इस बार थोड़ी शांति की सांस लेंगी। लेकिन लगता है इस दिपावली कवि पुरस्कारी के लिए त्यौहार फीका होने वाला है। सब दिपावली पर मिष्ठान्नों व फटाकों का आनंद लेगें और कवि पुरस्कारी पुरस्कार छिटकने के दुख में लगता है फीके-फीके ही रहेंगे।

