- डीएम कार्यालय से भेजे गए आवेदन का न तो मिल में ही पता लग रहा है और न ही डीसीओ कार्यालय में मिला
- डिस्पेच नंबर को लिए घूम रहा है लुहारी का गन्ना किसान, अधिकारियों ने बना दी उसकी चकरघिन्नी
जनवाणी संवाददाता|
बड़ौत: एक तो अपने खून पसीने से गन्ने की फसल को किसान तैयार करता है। फिर उसके भाव का वह इंतजार करता रहता है। सरकार भाव जो भी जो दे दे, गन्ना किसान उसी भाव में मिल में डाल देते है।
अब गन्ना किसान के पास तीसरा चरण परीक्षा का आता है। इस परीक्षा में सदा फैल ही होता रहा है। खासकर गन्ने की फसल के दाम लेने में। वैसे तो अधिकांश चीनी मिल गन्ना किसान को भुगतान तब करते हैं। जबकि मिल पर नियमानुसार काफी ब्याज बैठ जाता है। लेकिन भोला किसान बिना ब्याज के ही भुगतान के लिए तरसता रहता है।
चीनी मिलें भुगतान में इतनी देरी कर देती हैं कि तब तक गन्ना किसान किसी भी तरह से भुगतान मिल जाने से ही संतुष्ट हो जाता है। वह ब्याज की बात भूल जाता है। दैनिक जनवाणी की ओर से सात सितंबर को एक समाचार प्रकाशित किया था। इस समाचार में कई कैंसर पीड़ित किसानों की दुर्दशा बताई थी। किस तरह से अधिकारी व मिल अधिकारी उनके लिए यमदूत बने हुए हैं।
लुहारी गांव निवासी सहेन्द्र की पत्नी निर्देष देवी को कैंसर है। सहेन्द्र ने उधार रुपये लेकर उस पर लगा दिए। अब उसके पास रुपये नहीं रहे तो उसने अपने भुगतान के लिए मांग की।
संयुक्त परिवार होने के कारण उसने अपने भाई की ओर से भी डीसीओ कार्यालय में आवेदन दिया। डीसीओ ने डीएम को यह आवेदन भेज दिया। यहां यह विदित है कि डीएम की ओर से नियम बनाया गया है कि किसी गन्ना किसान को एक लाख रुपये से अधिक रुका हुआ गन्ना के भुगतान अर्जेंट में नहीं मिलेगा। या फिर कम है भुगतान है तो उसका पचास प्रतिशत ही मिलेगा। जबकि एक कैंसर पीड़ित पर कितना खर्च होता है।
यह प्रशासनिक अधिकारियों को ही नहीं बल्कि आम आदमी को भी पता है। गरीब घर में बिना इलाज कराए ही मर जाते हैं। धनवान 50 से 60 लाख रुपये खर्च कर रहे हैं। मलकपुर चीनी मिल पर सहेन्द्र सिंह व उसके भाई के तीन लाख रुपये बकाया हैं। यह पूरा भुगतान तो दूर की बात उसके आधा भुगतान नहीं दिया जा जा रहा है।
गायब कर दिया मलकपुर मिल को अग्रसारित सहेन्द्र का आवेदन
सहेन्द्र सिंह ने अपनी पत्नी के कैंसर के इलाज के लिए भुगतान की मांग की थी। यहां यह भी विदित है कि मलकपुर मिल पर गन्ना किसानों का करोड़ों रुपये का भुगतान बकाया है। पांच जनवरी 2020 तक का ही भुगतान मिल कर पाया है। जिला गन्ना अधिकारी के कार्यालय से यह आवेदन डीएम कार्यालय में पहुंच गया। यहां से किसान को डिस्पेच नंबर भी दे दिया। सहेन्द्र सिंह ने बताया कि वह मलकपुर मिल गया तो वहां उसे बताया कि उसका कोई आवेदन मिल में नहीं आया है। जबकि उसने डिस्पेच नंबर भी दिखाया। यहां से थककर जिला गन्ना अधिकारी के कार्यालय में गया। वहां भी उसे मना कर दिया कि यहां उसका कोई आवेदन नहीं है। उसने वहां भी डिसपेच नंबर दिखाया। लेकिन किसान को वहां से भी चलता कर दिया। वह फिर डीएम कार्यालय में गया। डीएम कार्यालय में उसने अपनी व्यथा बताई। डीएम कार्यालय से उसे रजिस्टर में यहां से फिर डिस्पेच होना बताया। अब गन्ना किसान की एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी और फिर तीसरे अधिकारी के चक्कर काटते हुए उसकी घिरनी बनी हुई है। जबकि उसकी पत्नी अपने घर की चारपाई पर पड़ी हुई अंतिम दिन गिन रही है।
डीसीओ को पता ही नहीं है कि किसे भुगतान करना है ?
जिला गन्ना अधिकारी अनिल कुमार से इस संबंध में फोन पर पूछा गया तो उन्होंने बताया कि यहां सैंकड़ों आवेदन आते हैं। वह किस-किस के आवेदन को बताएं। जब उनसे पूछा कि लुहारी गांव में सहेन्द्र सिंह गन्ना किसान का आवेदन गायब हो गया। उन्होेंने बताया कि मैडम की बैठक में जा रहा हूं। अभी अपने कार्यालय में नहीं हैं। कार्यालय में आऊंगा तो तभी बताया जाएगा। कार्यालय में कब आएंगे पूछने पर डीसीओ ने बताया कि समय बताएगा कि वह कब कार्यालय में बैठेंगे।

