वे सीधे-सादे थे और अक्ल के कच्चे थे। सदैव ख्यालों में सोया रहना उनकी आदत थी। साहित्य सेवा से सदैव लबरेज रहते थे। उम्रदराज होने से साहित्य जगत में उनकी पहचान ‘महाकवि’ के रूप में हो चुकी थी। पहली अप्रैल को मैंने उनके घर आकर कहा-‘बधाई हो महाकवि जी। पहली अप्रैल आपको मुबारक हो।’ वे लगभग लजाते हुए से बोले-‘धन्यवाद-धन्यवाद शर्मा। मुझे तो पता ही नहीं था कि आज पहली अप्रैल है। इस पर तो मैं तुम्हें मुँह मीठा किये बिना जाने नहीं दूँगा।’ मैं बोला-‘मिठाई तो मैं आपसे खाकर ही रहूँगा आज। इधर खबर है कि आपको अकादमी ने विशिष्ट साहित्यकार के रूप में सम्मानित करने का ऐतिहासिक फैसला किया है। उसकी बधाई भी स्वीकार करें।’ वे गद्गद हो गए और खुशी से पगलाए से बोले-‘वाह शर्मा, तुमने तो आज आत्मा तृप्त कर दी। मैं कहता नहीं था-साहित्य सम्मान देर-सवेर मुझे मिलेगा जरूर। आज पहली तारीख को तुमने यह शुभ समाचार दिया है। रुको मैं मिठाई लेकर आया। मुझे पता था यह सम्मान मुझे कभी भी मिल सकता है, इसलिए मिठाई पहले ही मँगवाकर रख ली थी।’
वे मिठाई लेने चले गए। लौटे तो ट्रे मिठाई से भरी थी। मिठाई देखते ही मुंह में पानी आ गया। ऊपरी तौर पर बोला-‘यह क्या किया आपने? इतनी मिठाई क्यों ले आए? आपको तो सम्मानित होना ही था।’ वे बोले-‘शर्मा भरपेट खाओ, तुमने ऐसी खबर सुनाई है कि दिल बाग-बाग हो गया है।’ यह कहते हुए उन्होंने मिठाई का एक पीस मेरे मुंह में सरका दिया। मन में मिठाई खाते हुए ग्लानि का भाव जरूर आ रहा था कि यह मैंने ठीक नहीं किया है, परन्तु दूसरे ही क्षण मूर्ख दिवस का ख्याल आते ही मुझे मजाक करने का अधिकार याद हो आया। मन ने कहा-पहली अप्रैल को किसी को मूर्ख बनाने का अधिकार सभी को विधिवत मिला हुआ है। इसलिए महाकवि को आज विशिष्ट साहित्यकार सम्मान से नवाजने की खबर से खुशी दी है तो बुरा क्या किया है ? मैं बोला-‘निर्णय तो सही हुआहै महाकवि जी! लेकिन यह देर से हुआ है।’
वे बोले-‘देर आयद दुरूस्त आयद। कभी भी हुआ हो शर्मा पर यह निर्णय गलत नहीं है। ऐरे-गैरे नत्थू खैरे अकादमी का शॉल ओढ़ चुके। मुझे शर्मा शर्म आती थी। इस बात से सिर ऊंचा नहीं कर पाता था कि पच्चीस किताबें लिखकर भी अकादमी से सम्मानित नहीं हो पा रहा हूं। आज मेरे समग्र का मूल्यांकन हुआ है। मैं कहता हूँ तुम भी लगे रहो। एक दिन तुम्हारा भी नम्बर आ जाएगा। मानता हूं अकादमी में पॉलिटिक्स है, परंतु कुछ निर्णय निष्पक्ष भी होते हैं। मेरे मामले में यही हुआ है। ये प्रभु! तेरी लीला भी अद्भुत और न्यारी है।’अब मैं चलूं महाकवि जी।’ मैं बोला तो उन्होंने कहा-‘फिर कब मिलोगे?’ मैंने कहा-‘कुछ कह नहीं सकता। तीन महीने के लिए बाहर जाने का प्रोग्राम है। कल निकल जाऊंगा। मैं लौटूंगा तब तक तो आपका सम्मान हो चुका होगा। काश! मैं वह क्षण अपनी आंखों से देख पाता।’ महाकवि बोले-‘कोई बात नहीं शर्मा, तुम जा आओ वीडियो फिल्म देख लेना आकर।’

