
एक बुढ़िया बहुत भुलक्कड़ थी। घर का कोई काम करना होता, उसे वह भूल जाती। बड़ी समस्या थी। एक दिन उसने यह समस्या अपने पड़ोसी के सामने रखी और कहा, ‘बड़ी कठिनाई है। घर का कोई काम करना होता है, तो भूल जाती हूं, दिन बीत जाता है, तब फिर बाद में याद आता है।’ पड़ोसी ने कहा, ‘तुम ऐसा करो कि जो काम करना हो, सुबह उसे एक पन्ने में लिख लो, एक तालिका बना लो और उस तालिका को देख-देखकर काम करो।’ सुझाव अच्छा लगा, मान लिया।
दूसरे दिन एक तालिका बना ली कि आज दिन में यह यह काम करना है, सुबह से लेकर शाम तक। तालिका तो बन गई, अब काम करने का समय आया तो याद ही नहीं कि क्या करना है। तत्काल दौड़ी गई पड़ोसी के पास और बोली, ‘अब मुझे क्या करना है?’
वह बोला, ‘मुझसे क्या पूछती हो? तालिका तुम्हारे पास है, उसमें देख लो।’ ‘अरे भाई! मुझे तो यह भी याद नहीं कि पन्ना कहां रखा है’—बुढ़िया ने कहा। कहने का अर्थ यह कि तालिका क्या काम आएगी, जब पन्ने की स्मृति नहीं कि पन्ना कहां रखा हुआ है। कितनी गहरी विस्मृति होती है आदमी में कि जो करना होता है, वह हो नहीं पाता, कर्तव्य का निर्वाह नहीं हो पाता।
जब मुक्त होने की भावना नहीं होती तो अनासक्त होने की बात विस्मृति में चली जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि हमारी सतत स्मृति रहे कि मुझे मुक्त होना है और मुक्त होने के लिए अनासक्त होना जरूरी है। अनासक्ति जीवन में अपने-आप उतरेगी।

