
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज अपने सौवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है जो संघ के लिए एक ऐतिहासिक पड़ाव है, लेकिन साथ ही उसके लिए यह एक निर्णायक मोड़ भी है। संघ के लिए यह महज एक उत्सव का अवसर नहीं है, बल्कि आत्ममंथन और संगठन की दिशा पर गंभीर विमर्श का समय है। पिछले सौ वर्षों में संघ ने एक मजबूत वैचारिक ढांचा और राष्ट्रव्यापी सांगठनिक तंत्र खड़ा किया, लेकिन अब जब संघ अपने शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है, तो उसके अस्तित्व और विचारधारा पर नए सिरे से सवाल उठ रहे हैं। आज संघ एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ हर संगठन अपने अतीत की समीक्षा करता है और भविष्य की दिशा तय करता है।
लेकिन क्या संघ, जिसने बीते 100 वर्षों में राष्ट्र निर्माण, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राजनीतिक रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, अब अपने ही अस्तित्व की चुनौती से जूझ रहा है? संघ प्रमुख के लिए राजनीतिक नेतृत्व तय करना कठिन कार्य नहीं रहा है चाहे वो उपराष्ट्रपति हों, पार्टी अध्यक्ष या फिर प्रधानमंत्री। लेकिन वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती इन व्यक्तित्वों से कहीं आगे है विचारधारा को बनाए रखना और संगठन की आत्मा को सुरक्षित रखना और उसकी मूल विचारधारा को वर्तमान राजनीतिक समीकरणों से बचाना कहीं ज्यादा कठिन है। आज जो सबसे बड़ा संकट है, वह बाहर से नहीं, भीतर से है। सत्ता के समीकरणों में गुजरात लॉबी का प्रभाव, ‘साम दाम दंड भेद’ की रणनीति, और संघ से अलग होते भाजपा के राजनीतिक एजेंडे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि विचारधारा को सुविधा और सत्ता की राजनीति के आगे नतमस्तक कर दिया गया, तो संघ की सौवीं वर्षगांठ एक प्रतीकात्मक उत्सव भर रह जाएगी।
दरअसल संघ का मूल आधार रहा है विचारधारा, अनुशासन और तपस्वी कार्यकर्ता। लेकिन आज जिस तरह सत्ता के समीकरण बदल रहे हैं, उसमें विचारधारा के स्थान पर व्यक्तिपूजा और सत्ता-सुख ने जगह ले ली है। यह संघ के मूल सिद्धांतों के विपरीत है और इसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी नेतृत्व पर आती है। संघ की सबसे बड़ी ताकत उसकी ‘अराजनीतिकता’ रही है, लेकिन यदि यह केवल नाम भर रह जाए और संगठन सत्ताधारी दल का विस्तार बनकर रह जाए, तो वह न तो जनता में अपनी विश्वसनीयता बनाए रख पाएगा और न ही स्वयंसेवकों में वह प्रेरणा दे पाएगा जिसके दम पर यह संगठन खड़ा हुआ। जहाँ तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75 वर्ष की उम्र पूरी होने पर पद छोड़ने के कथन की बात है, तो अब यह भी एक जुमले जैसा प्रतीत होता है। मोदी के नेतृत्व में सत्ता की जो केंद्रीकरण प्रवृत्ति बनी है, वह ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ की सोच को खोखला कर रही है। संघ के भीतर जो ‘मौन विरोध’ है, मुखर होने की ओर बढ़ रहा है। यह मुद्दा अब ‘संघ के अनुशासन’ से अधिक ‘राजनीतिक अनुकूलता’ और संघ की रीढ़ पर भारी पड़ रही है।
बहरहाल इस समय संघ के लिए जरूरी है कि वह खुद को पुनर्परिभाषित करे, ना कि केवल अपनी शाखाओं की संख्या बढ़ाए, बल्कि यह भी तय करे कि उसके स्वयंसेवक किस विचारधारा के वाहक हैं और किसी राजनीति के उपकरण तो नहीं बन रहे? संघ के लिए यह आत्ममंथन का समय है, क्योंकि अगर संघ को अपने शताब्दी वर्ष को सार्थक बनाना है, तो उसे नेतृत्व के स्तर पर कठोर निर्णय लेते हुए समझना होगा कि क्या वह एक सांस्कृतिक संगठन बना रहना चाहता है या सत्ता की राजनीति में पूरी तरह समर्पित हो चुका है? इसलिए संघ की विचारधारा को दोबारा केंद्र में लाना होगा और सत्ता के विस्तार को संतुलित करना होगा। नहीं तो इतिहास में यह शताब्दी वर्ष ‘गर्व के सौ साल’ की बजाय ‘संघ के संकट का वर्ष’ बनकर रह जाएगा और यदि संघ प्रमुख मोहन भागवत इस दिशा में स्पष्ट नेतृत्व नहीं दे पाए, तो इतिहास उन्हें एक निर्णायक मोड़ पर कमजोर साबित हुए नेतृत्व के तौर पर याद रखेगा।

