Friday, January 23, 2026
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बड़ा ब्रांड छोटे ब्रांड को खा जाता है

टीवी पर उसी दिन और अखबारों में अगले दिन चारों ओर गोबर ही गोबर था। या लौंडा नाच। गुरु जी गायब थे अखबारों से। बाब्बा की कंपनी ने इस प्रकरण को किसान आंदोलनों की साख पर काला धब्बा बताया और उन्हें तो इनकी बिरादरी वालों ने ही ‘जात का आधा’ बताकर पल्ला झाड़ लिया। एक महीने बाद जेल से छूटे जमानत पर। इनकी भैंस अभी कांजी हाऊस में ही दूध दे रही है और साथी का ट्रैक्टर थाने में।

डॉ. मेजर हिमांशु

वो धरना जीवी बन चुके थे। एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के साथ छात्र जीवन में जुडे। जिले की यूनिट की अंदरूनी राजनीति में रगडे गए तो मोह भंग हो गया और किसान आंदोलन की शरण में आ गए। पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण की तरह इन्हें जनता के ध्यानाकर्षण की बीमारी है। पृथ्वी सफल है, ये जूझे पडे हैं। ‘खाली मत बैठ कुछ कर, गड्ढा खोद गड्ढा खोद भर,’ इनका मूल मंत्र है। युवा नेता आए थे आज कनिष्ठ वरिष्ठ जो भी हैं, जवानी इन सब में खपा दी। आजीविका के नाम पर कुछ जुगाड़ तुगाड़ भर है। असल में तो भटकाव है, ये समाज सेवा बताते हैं।

बनी किसान आंदोलन में ज्यादा दिन ‘बडे बाब्बा’ से भी नहीं। सो कुछ एक साल बाद ही अलग हो गए। अब अपना अलग बैनर है। मंदा छोटा जैसा भी हो ‘अपना’ है। ‘बाब्बा’ के दरबार से कुछ जुमले और मंतर जंतर सीख लिए थे उनसे काम चला रहे हैं। बाब्बा का एक चेला मिल में ताला लगाता था दूसरा खुलवाता। दुकान दोनों की चलती, नारा दोनों बाब्बा का लगाते। इनके पास जब ताला लगाने की ही ताकत नहीं थी तो खुलवाने की नौबत ही कहां आती? बाब्बा के दरबार से फ्रेन्चाईजी का खुला आफर था पर अब इन्हें स्वच्छंदता की आदत पड़ चुकी थी।

हालांकि बाब्बा की छाया में सुरक्षा और ज्यादा मौके थे। जाहिर है बाब्बा का आफर इन्होंने नहीं लिया तो जिले में किसी और ने ले लिया। बाब्बा का दरबार अब विस्तार और विविधिकरण योजना पर काम कर रहा था, नए नए कौशल के लोगों के साथ। किसानी से अलग, जमीनी मामले खासकर। ‘जमीनी’ मतलब जमीन के मामले और विवाद। उद्योग, भर्ती, सरकारी ठेके आदि इत्यादि। इन गतिविधियों से इनके जिले में भी किसान आंदोलन की छवि खराब हो रही थी साख गिर रही थी। नए लोग युवा थे और नई कार्य संस्कृति वाले। बड़ी बड़ी लग्जरी गाड़ियों से किसान आंदोलन कर रहे थे। जिले में कॉम्पीटीशन इन्हें झेलना पड़ रहा था। कॉरपोरेट के आगे छोटे दुकानदारों की समस्या इनकी समस्या थी। सत्ताधारी दल भी भाईचारा नहीं कॉरपोरेट दोस्ती वाला बन चुका था खुल्लम खुल्ला। राजनीति और आंदोलन सेवा से प्रोफेशन बने अब खुला बिजनेस थे। सत्ता की राजनीति हमेशा से थी, आंदोलन की भी अब खुली राजनीति थी।

‘घोडे के नाल ठुक रही थी तो मेंढकी ने भी पांव ठा दिया,‘ गांव की कहावत है। इन्होंने भी कुछ बड़ा कर डालने की ठान ली। खैर इनके तो अस्तित्व का भी संकट था। कृषि व गन्ना अधिकारियों और कुछ पुलिस व पत्रकारों के तालमेल से इनकी दुकान छोटी मोटी चल जाती थी। बकाया भुगतान न होने पर इन्होंने गन्ना भवन गोबर से भर देने और वहां भैसों का तबेला खोल देने का ऐलान कर दिया, अपने दम पर। आंदोलन होता है तो छोटे गन्ना अधिकारियों की भी लखनऊ में पूछ हो जाती है। पूछ हर किसी को चाहिए पत्रकारों को तो खबर भी। सुना पत्रकारों ने ही इन्हें सुझाया था। मामला गर्मा गया। ये खबरों में छा भी गए और दूसरे संगठन की छाती पर सांप भी लौटे। जितनी खबर थी उतना इनपे सौदा नहीं थी। सांझा मोर्चा होता तो सब हांगा सा लगा देते पर ये अकेले अकेले दावत खाना चाह रहे थे। अपनी हालत पतली जान इन्होंने भी अपनी 20 साल की साख और संबंध दांव पर लगा दिए। ‘युद्ध कहां तक टाला जाए, फेंक जहां तक भाला जाए।’

कुछ टैक्टर बुग्गी तैयार हुई, वो भी इलाके के दरोगा के आश्वासन और डीजल के बाद। दो चार भैंस भी तैयार की गई। एक तो अपनी ही थी। अखबारों ने माहौल बना ही दिया था। बाब्बा का लखनऊ कूच कुछ दिन में था सो स्थानीय प्रशासन भी दबाव में था। ये पहुंच गये गन्ना भवन ताम झाम के साथ। 30-40 लोग थे। लोग ज्यादा तो नहीं थे, पर पुलिस ने आधा-अधूरा विरोध कर एक बुग्गी गोबर गिरने दिया। जगह विभाग वालों ने तय कर दी थी। संबंध पुराने थे और फिर किसान है तो गन्ना है। गन्ना है तो गन्ना विभाग है। गुरु जी ने अपनी भैंस अंदर बाड़ दी और अंदर बांध भी दी। चलो वो भी सिर माथे। पल्ली भी बिछ गयी और नारेबाजी हुई शुरू। टीवी कैमरे, फ्लैश लाइट और इतने सारे पत्रकार। आंखें चुंधिया गई और जोश आ गया। एक अनाड़ी साथी को कुछ ज्यादा। उसने गोबर ठाया और नए गन्ना अधिकारी के मुंह पर लेप दिया। दूसरा कमीज उतार कर बिना बनियान सरकारी आफिस मेज पर लौंडा नाच दिखा दिया। यह अनकहे समझौते की सीमा का ही नहीं, मर्यादा का भी उल्लंघन था। पुलिस ने दिन में तारे दिखा दिए। तारे दिखाने का मतलब जानते ही होंगे।

टीवी पर उसी दिन और अखबारों में अगले दिन चारों ओर गोबर ही गोबर था। या लौंडा नाच। गुरु जी गायब थे अखबारों से। बाब्बा की कंपनी ने इस प्रकरण को किसान आंदोलनों की साख पर काला धब्बा बताया और उन्हें तो इनकी बिरादरी वालों ने ही ‘जात का आधा’ बताकर पल्ला झाड लिया। एक महीने बाद जेल से छूटे जमानत पर। इनकी भैंस अभी कांजी हाऊस में ही दूध दे रही है और साथी का ट्रैक्टर थाने में। थोड़ा लंगडा कर चल रहे थे। लौंडा नाच वाला अभी अंदर है। गन्ना विभाग की एक महिला कर्मचारी की शिकायत पर अभद्रता अश्लीलता के आरोप में। गोबर लेप वाले ने जेल में भी खासी सुर्खियां बटोरीं। गोबर लेप छूटा तो बाब्बा की कंपनी में जिले की फ्रेन्चाईजी पा गया। गोबर लेप बाब्बा के खास का हमेशा खास था और लौंडा डांस वाला बेहूदा गोबर लेप का खास यार। उभरता छोटा ब्रांड हमेशा बडेÞ ब्रांड का बाजार खाता है। बड़ा ब्रांड छोटे ब्रांड को ही खा जाता है।

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