Thursday, March 12, 2026
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बॉलीवुड को प्रतिभाएं देने में भी पीछे नहीं है बिहार

असीम चक्रवर्ती

इधर बिहार का चुनाव अपने चरम पर है। वैसे यदि देश की प्रगति के संदर्भ में देखें,तो इस प्रदेश का योगदान किसी भी क्षेत्र में कमतर नहीं रहा है। जाहिर है इससे हमारा बॉलीवुड भी अछूता नहीं रहा है। शायद इसलिए एक बिहारी सब पर भारी…जैसी कहावत भी मशहूर है। बहरहाल ऐसी कहावतों से हटकर में देखें,तो इन वर्षों में बिहार से आए स्ट्रगलरों ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी अच्छी खासी धाक जमाई है। आइए,इस चर्चा कों सिलसिलेवार थोडा और विस्तार देते है-

बिहारी छोकरा बना हीरो- पिछले कई वर्षों से बॉलीवड मे बिहार से भी सैकडों युवक आते रहे हैं, मगर इनमें शत्रुघ्न सिन्हा,सुशांत सिंह राजपूत, शेखर सुमन, अखिलेंद्र मिश्र, मनोज बाजपेयी, पंकज त्रिपाठी, संजय मिश्रा, मनोज तिवारी आदि ही अपनी सशक्त पहचान बना पाए।
शत्रुघ्न सिन्हा ने अपनी धाकड़ पहचान बनाई थी। यश चोपड़ा से लेकर सुभाष घई तक हर बडेÞ दिग्गज डायेरेक्टर्स के साथ उन्होंने काम किया। उनकी सूची में ऋषिकेश मुखर्जी, गुलजार जैसे कई जहीन लेखक निर्देशक की फिल्मों में काम करके खूब वाहवाही लूटी।

इसके बाद के आए कई अभिनेता उनकी राह में आगे बढ़ते हुए दिखाई पडे, मगर उन्हें अपने शत्रु भइया जैसी लोकप्रियता नहीं मिली। अच्छे अभिेनेता शेखर सुमन ने भी अपनी धाक जमानी चाही थी, पर अंतत: उनकी छोटे परदे तक ही सिमट कर रह गई। दूसरी ओर अखिलेंद्र मिश्र, मनोज बाजपेयी, पंकज त्रिपाठी, संजय मिश्रा आदि ने अपनी भाव प्रवणता से सबका मन मोह लिया। खास तौर से मनोज और पंकज ने स्टारडम के गलियारे में भी खूब हलचल मच रखी है। इनमें उनके युवा साथी सुशांत सिंह राजपूत ने अपना एक अलग रास्ता बनाना शुरू ही किया था कि वह बॉलवुड की गंदी राजनीति के शिकार हो गए।

इस बारे में विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन हम सच से इंकार नहीं कर सकते कि बिहार ही नहीं पूरे भारत में इस प्रतिभावान अभिनेता को सिने प्रेमी गाहें-बगाहे याद करते हैं। कुल मिलाकर देखें,तो बिहार प्रतिभा के मामले में भी रत्नगर्भा है। वर्तमान में मनोज बाजपेयी, पंकज त्रिपाठी, संजय मिश्रा जैसे कई प्रतिभाशाली कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय से सबको बार-बार चौंकाया है। आपको यदि यकीन नहीं है, तो इन अभिनेताओं की सशक्त प्रस्तुति इनकी कुछ नई फिल्मों में देख लें।

यूं तो बिहार से आई नीतू चंद्रा, तनुश्री दत्ता, नेहा शर्मा, श्रीति झा, अक्षरा सिंह, रतन झा, अनुरीता झा, पाखी टायरवाला, शिल्पा शुक्ला, परिणती राय प्रकाश आदि की एक लंबी सूची है। यह सिलसिला आज भी जारी है। मगर विडंबना देखिए कि हीरो की तुलना में बिहार से आई किसी भी नई तारिका बॉलीवुड में कोई पहचान नहीं बना पाई। एक दायरे में कैद अभिनेत्री नीतू चंद्रा ने हिंदी, भोजपुरी और साउथ की दो दर्जन फिल्मों में काम करके भी कोई गुल नहीं खिलाया। मगर गॉसिप के मामले में वह किसी भी अभिनेत्री से कमतर नहीं थी। अब 41 की उम्र में वह इस चर्चा से थोड़ा दूर हैं। कुछ यही हाल तनुश्री दत्ता और नेहा शर्मा के साथ भी हुआ। चर्चा में ये अभिनेत्रियां भी काफी रहीं, पर स्टारडम के गलियारों में इनकी कोई चर्चा कभी नहीं हुई।

साफ है कि पुरुषों की तुलना में बॉॅलीवुड में इन बिहारी बालाओं की कोई साख नहीं बनी।
यूं तो बॉलीवुड के क्रिएटिव क्षेत्र में बिहार से आए कई युवक काफी सक्रिय हैं, लेकिन लेखन-निर्देशन के क्षे़त्र में बिहार में जन्मी प्रतिभाओं ने न के बराबर अपना परचम फैलाया। इस सूची में प्रकाश झा, इम्तियाज अली, मणीष झा, राजकुमार गुप्ता, कबीर कौशिक, ब्रह्मानंद सिंह जैसे कई छोटे बडेÞ नाम हैं, पर तीन नाम प्रकाश झा, इम्तियाज अली और राजकुमार गुप्ता ही ऐसे हैं, जिन्होने अपनी एक अलग पहचान बनाई। इसमें निर्देशन के क्षेत्र में प्रकाश झा का नाम हमेशा तारीफ-ए- काबिल रहा है। परिणति जैसी कला फिल्म से लेकर आश्रम जैसी वेब सीरिज को बनाकर वह लगातार सक्रिय रहे हैं। इसी तरह से इम्तियाज अली ने लव आज कल, सोचा न था जैसी फिल्मों से अपनी अच्छी धाक जमाई थी, पर ताजा एक अरसे से कोई भी सृजन न के बराबर पसंद किया गया। कई बडेÞ बैनर उनसे बहुत दूर जा चुके हैं। कुछ ऐसा ही हाल राजकुमार गुप्ता का रहा। इस बेहद उम्दा डायरेक्टर अब रेड जैसी फिल्मों में उलझे हुए हैं। कुछ माह पहले रीलिज उनकी फिल्म रेड-2 को दर्शकों ने जरा भी पसंद नहीं किया। इनके अलावा बिहार से आए कुछ युवक अब भी सक्रिय हैं।

संगीत जगत में सक्रियता-बिहार के संदर्भ में भोजपुरी गानों की लोप्रियता का भी एक अलग पैमाना रहा है। शारदा सिन्हा जैसी यहां कि कई चर्चित गायिकाओं का नाम कई बॉलीवुड हिट गानों के साथ भी जुड़ा। लेकिन आमिर खान की फिल्म कयामत से कयामत तक की लोकप्रियता के साथ गायक उदित नारायण ने बॉलीवुड खूब परचम फहराया। आज भी उनकी लोकप्रियता बदस्तूर कायम है। पर वक्त के साथ कुछ ऐसा हुआ कि नये दौर के कई संगीतकार उनसे लगभी विमुख हैं। उदित को इसका कोई अफसास नहीं है। वह भावुक होकर बताते हैं, ईश्वर ने मुझे जो कुछ भी दिया, उससे संतुष्ट हूं। जीवन में अप-डाउन तो चलता रहता है। यही क्या कम है कि मैं हिंदी फिल्मों के लिए कम ही सही, क्षेत्रीय फिल्मों के लिए लगातार गा रहा हूं। मुझे इस बात की जरा भी परवाह नहीं है कि मुझे किस तरह के गाने मिल रहे हैं। मैं उन कुछ बिहारी युवकों में से एक हूं, जिन्होंने संघर्ष कर अपनी मुकम्मल पहचान बनाई है।

बिहार भी उन कुछ गिने-चुने राज्यों में एक है, जहां से हर रोज सैकड़ों लोग मुंबई पर पांव रखते हैं। इनमें से बहुत सारे ऐसे लोग ऐसे होते हैं, जो अपनी कलात्मक प्रतिभा को एक नया रंग देने के लिए फिल्म वर्ल्ड की तरफ मुड़ते हैं। शेखर सुमन हंसकर बताते हैं, जो मेरी तरह यहां तमाम ठोकर खाकर टिका रहता है, उसे कुछ न कुछ जरूर हासिल होता है। कुछ रचनात्मक करने की यह ललक ही सासाराम या पूर्णिया के युवक को मुंबई ला पटकती है। मगर मुंबई के संघर्ष की जमीन बहुत पथरीली होती है। दूसरे कई राज्यों की तरह बिहार से भी यहां हर साल हजारों युवक अपना भाग्य आजमाने आते हैं। राज्यसभा के उप सभापति ने हरिवंश ने कभी रत्नगर्भा बिहार शीर्षक से रविवार की एक कवर स्टोरी प्लान की थी। हरिवंश बताते हैं , बिहार सिर्फ खनिज संपदा के मामले में ही नहीं, कलात्मक क्षेत्र में भी रत्नगर्भा रहा हैं। फिल्मोद्योग की ढेरों ऐसी प्रतिभाएं हैं, जो बिहार से सीधे मुंबई नहीं आर्इं, पर उनकी जन्मस्थली बिहार रही है। शायद बहुत कम लोगों को पता हो कि बेहद नामचीन निर्देशक सत्येन बोस और तपन सिन्हा ,अभिनेता अशोक कुमार और आज के चर्चित गायक दलेर मेंहदी आदि कई ऐसे बडेÞ नाम हैं, जिनका जन्म बिहार में हुआ, मगर लालन पालन बिहार से बाहर।

लगभग डेढ दर्जन से ज्यादा फिल्मों के र्चिर्चत छायाकार असीम मिश्रा कहते हैं, देश के दूसरे युवकों की तरह बिहारी युवकों में भी संघर्ष करने की अद्भुत क्षमता होती है। यह संघर्ष कई बार बहुत समय लेता है, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति होने पर आप अपने आपको यहा देर-सबेर साबित कर ही सकते हैं। बस, आपको किसी मुगालते में नहीं रहना चाहिए और पूरी तैयारी के साथ आना चाहिए। अब आप मुझे ही देख लीजिए ,फिल्मों में मुझे छायाकार बनना है, यह मैंने शुरू से ही सोच रखा था। इसके लिए मैंने छायांकन का पूरा प्रशिक्षण लिया। कई साल तक सहायक के तौर पर काम किया। फिर जाकर मंजिल की तरफ का रास्ता मिला।

निर्देशक प्रकाश झा कहते हैं, वह दौर बीत चुका है, जब सिर्फ रेणु के तीसरी कसम की वजह से बिहार को याद किया जाता था, आज तो फिल्म निर्माण के हर क्षेत्र में बिहार अपना दावा पेश कर रहा है। जाहिर है, फिल्म मेकिंग में बिहार का इससे ज्यादा और क्या योगदान हो सकता हैं कि सिर्फ भोजपुरी ही नहीं हिंदी फिल्मों के निर्माण में भी वह अपने योगदान को निरंतर बढ़ा रहा है।

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