- पश्चिमी यूपी के जाट वोट बैंक पर हर दल की निगाहें, कहां जाएगा जाट वोट ?
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: पहले चरण में पश्चिमी यूपी की आठ लोकसभा सीटों पर चुनाव होगा। प्रथम चरण में भाजपा और रालोद गठबंधन का भी इम्तिहान हैं। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में आठ सीटों पर सपा-बसपा और रालोद का गठबंधन था, जिसमें पांच सीट सपा-बसपा के पास थी और भाजपा के पास तीन सीट थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी की स्थिति एक दम विपरीत हैं। भाजपा और रालोद का आपस में गठबंधन हैं। इस गठबंधन की भी परीक्षा हैं, जिसमें आठ सीट में से भाजपा-रालोद कितनी सीटों पर जीत दर्ज करेगी, यह अभी भविष्य के गर्भ में हैं।
रालोद-भाजपा के बीच गठबंधन की गांठ लगने के बाद राजनीतिक गणित बदल गया हैं। सपा के रणनीतिकार भाजपा-रालोद की घेराबंदी करने में जुटे हैं, लेकिन सपा पहले अपनों से ही उलझी हुई हैं। कई टिकटों की अदला-बदली से सपा की स्थिति खराब हुई हैं। बसपा अकेले चुनाव लड़ रही हैं। वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव सपा-बसपा ने एक साथ गठबंधन कर लड़ा था। तब राजनीतिक परिस्थितियां अलग थी, अब अलग हैं। इस बात को बसपा और सपा के नेता भी मानते हैं।
लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर समाजवादी पार्टी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 27 सीटों पर अपना फोकस तो बढ़ा दिया है। इस बार बसपा सुप्रीमो मायावती अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है और रालोद प्रमुख जयंत चौधरी ने भाजपा से हाथ मिलाकर पश्चिमी यूपी में ताल ठोक रहे हैं। पिछली बार जब सपा, बसपा और रालोद ने एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा था तो गठबंधन को 37.3 फीसदी वोट मिला था
और भाजपा को 49.6 फीसद वोट मिला था। अब पश्चिमी यूपी में बसपा और रालोद, दोनों ही सपा के मजबूत साथी वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में साथ थे, जो वर्तमान में अलग हो गए हैं। इसमें सपा को ही सबसे बड़ा नुकसान हो सकता हैं। क्योंकि गठबंधन में बसपा का कैडर वोट और जाट वोटर गठबंधन को मिला था, जिसके चलते पहले चरण में सपा-बसपा को पांच सीटें मिली थी।

अखिलेश की क्यों है पश्चिमी यूपी पर नजर?
पूरे उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी 19 फीसदी से ज्यादा है, लेकिन अगर वेस्टर्न यूपी की बात करें तो ये आंकड़ा 26 फीसद पहुंच जाता है। यहां की कुल आबादी का 26 फीसदी हिस्सा मुस्लिम है। इसके अलावा, पश्चिमी यूपी की कुल 27 में से 21 सीटें ऐसी हैं, जिन पर मुसलमानों की आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है। 2019 के चुनाव की बात करें तो 8 सीटों पर सपा-बसपा गठबंधन को मुसलमानों का 73 फीसदी वोट मिला था, जबकि कांग्रेस को 18 फीसदी। इस बार सपा का गठबंधन कांग्रेस के साथ है। चुनावी आंकड़ों को देखें तो कांग्रेस को तुलनात्मक रूप से कम वोट मिले।
पश्चिमी यूपी के हिंदू वोट को लेकर चर्चा है कि ये भाजपा के पास ही जाएगा। बचा मुस्लिम वोट तो इसके तीन दावेदार हैं। पहले नंबर पर अखिलेश यादव, दूसरे पर नंबर पर मायावती और तीसरे नंबर पर असदुद्दीन ओवैसी हैं। साथ ही जयंत चौधरी जाट और मुस्लिम मतों पर निगाहें लगाये हुए हैं। एक अपील जयंत चौधरी ने करके मुस्लिमों को रिझाने की कोशिश की हैं, लेकिन मुस्लिम मतदाता जयंत चौधरी के भाजपा के गठबंधन से खुश नहीं हैं।
यही टेंशन अखिलेश यादव को सता रही है कि मुस्लिम मतदाता सपा से छिटक नहीं जाए। इस बार अखिलेश यादव को तीन मोर्चों पर चुनाव लड़ना होगा। एक तरफ भाजपा-रालोद गठबंधन है, दूसरी तरफ बसपा और तीसरी है एआईएमआईएम। क्योंकि औवेसी की पार्टी ने नगर निकाय में शानदार प्रदर्शन कर सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव को मुश्किल में डाल दिया था। बसपा प्रमुख मायावती ने प्रथम चरण में आठ सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारकर स्पष्ट कर दिया कि वो अकेले ही चुनाव लड़ेगी।
क्यों है भाजपा और रालोद का इम्तिहान?
भाजपा ने वर्ष 2019 में पश्चिमी यूपी में अकेले दम पर चुनाव लड़ा था। प्रथम चरण में आठ में से तीन सीट हासिल की थी। अब भाजपा का रालोद के साथ गठबंधन हैं। रालोद का पश्चिमी यूपी जाट बेल्ट है, ऐसे में भाजपा को बड़ा लाभ मिल सकता हैं। भाजपा से जो जाट खफा थे, वो गठबंधन के बाद भाजपा-रालोद के प्रत्याशी को वोट देंगे। इसी पर निगाहें लगी हुई हैं। क्योंकि पश्चिमी यूपी में भारतीय किसान यूनियन भी बड़ी अहमियत रखती हैं। वैसे तो भाकियू के राष्टÑीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने ऐलान किया है कि भाकियू लोकसभा चुनाव में किसी भी पार्टी का समर्थन नहीं करेगी, नहीं किसी का विरोध करेगी। किसान अपनी मर्जी से मतदान करें। अब देखना ये है कि पश्चिमी यूपी का किसान किस करवट जाता हैं।

