Tuesday, April 28, 2026
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अश्वेत लोगों पर मंडराता डिमेंशिया का खतरा

Nazariya 22


ALI KHANहाल में एक अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि श्वेत लोगों के मुकाबले अश्वेत लोगों को डिमेंशिया का खतरा अधिक है। इसके चलते भारत सहित दक्षिण एशिया और अफ्रीका में रहने वाले लोगों को डिमेंशिया का जोखिम ज्यादा हो सकता है। दरअसल, ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। इस अध्ययन को प्लास वन जर्नल में प्रकाशित किया गया है। अध्ययन में बताया गया है कि साल 2050 तक दुनिया भर में डिमेंशिया पीड़ितों की तादाद 15 करोड़ से अधिक होने की उम्मीद है। इसके पीछे बढ़ती उम्र वाली आबादी के साथ-साथ उच्च रक्तचाप, उच्च शरीर द्रव्यमान सूचकांक, मधुमेह और धूम्रपान जैसे कारक हो सकते है। अध्ययन में यह भी पाया गया है कि दक्षिण एशिया में रहने वाले लोगों में उच्च रक्तचाप का जोखिम अधिक होता है। इसके अलावा श्वेत लोगों की तुलना में दक्षिण एशियाई लोगों में मोटापा, मधुमेह, कम एचडीएल (अच्छा कोलेस्ट्रॉल) और नींद संबंधी विकार डिमेंशिया के उच्च जोखिम को बढ़ाते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि श्वेत लोगों की तुलना में दक्षिण एशियाई लोगों में उच्च रक्तचाप का डिमेंशिया के जोखिम पर 1.57 गुना अधिक प्रभाव पड़ता है। जबकि, अफ्रीकी लोगों पर यह प्रभाव 1.18 गुना ज्यादा होता है। बता दें कि अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने ब्रिटेन के 865,674 लोगों के स्वास्थ्य डाटा की जांच की। यह सारा डाटा 1997 और 2018 के बीच 65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के इंग्लैंड में रहने वाले लोगों का था। अध्ययन अवधि की शुरूआत में किसी को भी मनोभ्रंश यानी डिमेंशिया नहीं था। अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि डिमेंशिया के जोखिम कारकों का सभी पर समान प्रभाव नहीं पड़ता है। श्वेत लोगों की तुलना में अश्वेत लोगों में मनोभ्रंश का खतरा अधिक होता है। अध्ययन में शामिल 865,647 लोगों में से 12.6 फीसदी यानी हर आठ में से एक में डिमेंशिया के लक्षण देखे गए।

इस बीच आम-आदमी के मस्तिष्क में इस सवाल का कौंधना स्वाभाविक है कि आखिर डिमेंशिया किस बला का नाम है जो लोगों के स्वास्थ्य जोखिम को बढ़ा रही है। बता दें कि डिमेंशिया यानी मनोभ्रंश उस बीमारी को दिया जाने वाला नाम है जिसमें हमारी भूलने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है। यह एक मस्तिष्क का रोग है जो प्राय: याद्दाश्त की समस्याओं के साथ शुरू होता है। बाद में यह मस्तिष्क के अन्य भागों को भी प्रभावित करने लगता है, फलस्वरूप विभिन्न प्रकार की समस्याओं से मुखातिब होना पड़ता हैं। दरअसल, डिमेंशिया याद्दाश्त पर प्रभाव डालने के साथ-साथ, सोच-विचार, अभिविन्यास, समझ, गणना, सीखने की क्षमता और भाषा एवं निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित करता है। उल्लेखनीय है कि समय के साथ-साथ यह बीमारी बढ़ती है। जैसे-जैसे यह बीमारी बढ़ती है, इससे व्यक्ति अन्य लोगों पर ज्यादा निर्भर होने लगता हैं। यह समस्या वृद्ध लोगों में ज्यादा होती हैं। हालांकि 40 वर्ष की आयु में भी इसकी शुरुआत हो सकती है। लेकिन 65 वर्ष की उम्र तक, हर बीस में से एक व्यक्ति को एवं 80 वर्ष की उम्र तक हर पांच में से एक व्यक्ति को मनोभ्रंश हो सकता है।

गौरतलब है कि डिमेंशिया के लक्षण कई रोगों के कारण पैदा हो सकते है। ये सभी रोग मस्तिष्क को क्षतिग्रस्त करते हैं। असल में, हम अपने सभी कामों के लिए मस्तिष्क पर निर्भर हैं, डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति अपने दैनिक कार्य ठीक से नहीं कर पाते हैं। यह देखा गया है कि डिमेंशिया से पीड़ित रोगी में बोलते वक्त सही शब्द नहीं सूझता। साथ ही उनका व्यवहार बदला-बदला-सा लगने लगता है, और व्यक्तित्व में भी फर्क आ जाता है। यह भी देखा गया है कि वे असभ्य भाषा का प्रयोग करने लगते हैं और अश्लील तरह से पेश आने लगते हैं। साल दर साल डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की स्थिति अधिक खराब होती चली जाती है, और बाद की अवस्था में उन्हें साधारण से साधारण काम करने में भी दिक्कत होने लगती है, जैसे कि चल पाना, बात करना, खाना ठीक से चबाना और निगलना, यहां तक कि वे छोटी से छोटी चीज के लिए भी निर्भर हो जाते हैं।

चिंताजनक बात यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, दुनिया भर में 4 करोड़ से अधिक लोग डिमेंशिया बीमारी से पीड़ित है। यकीनन यह रोग एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट को बढ़ा रहा है। वहीं बात भारत की करें तो यहां करीब 40 लाख से अधिक लोगोें में डिमेंशिया रोग मौजूद है। एक अन्य शोध के मुताबिक, डिमेंशिया वर्तमान में सभी प्रकार की बीमारियों से होने वाली मृत्यु का सातवां प्रमुख कारण है, जो वैश्विक स्तर पर वृद्ध लोगों में विकलांगता और दूसरों पर निर्भरता के प्रमुख कारणों में से एक है। डिमेंशिया को ठीक करने के लिए वर्तमान में कोई उपचार उपलब्ध नहीं है। हालांकि नैदानिक परीक्षणों के विभिन्न चरणों में कई नए उपचारों की जांच की जा रही हैं। लेकिन विशेषज्ञों की राय है कि हम अपने जीवन जीने के तरीके में बदलाव के कारकों को रोक सकते हैं। यदि हम नियमित तौर पर व्यायाम और स्वच्छ आहार, धुम्रपान न करने तथा अधिक शराब पीना रोक कर मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अवसाद से जुड़े जोखिमों को कम कर देते हैं, तो संभव है कि हम डिमेंशिया से बच सकते हैं। इसके अलावा, अच्छी नींद लेना भी इससे बचाव में मदद करता है। साल 2021 में जारी एक शोध के मुताबिक, 50 और 60 की उम्र के लोग जो पर्याप्त नींद नहीं लेते हैं। उनके जीवन में एक समय के बाद डिमेंशिया होने की संभावना बढ़ जाती है। लिहाजा, डिमेंशिया रोग के प्रति जागरूकता अभियानों को चलाए जाने की आवश्यकता है। सरकारों को डिमेंशिया रोग से निपटने के लिए भी ठोस कदम उठाने होंगे।


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