एक बार एक व्यक्ति संत के पास आया और संत के पैर छूकर प्रार्थना करने लगा, महाराज ! मुझे बचा लो। मेरा तो सब कुछ ही लूटा जा रहा है। कई दिनों से सुख की नींद भी नहीं आती। लगता है जैसे मेरा जीवन व्यर्थ हो गया है। मुझे अच्छा बनने और सुख से जीवन व्यतीत करने का आशीर्वाद दें महाराज। संत ने व्यक्ति के दुख को ध्यान से सुना और पूछा, क्या तुम धूम्रपान करते हो? व्यक्ति ने जवाब दिया हां महाराज । संत ने पूछा, शराब पीते हो? व्यक्ति ने जवाब दिया, हां महाराज। संत ने फिर पूछा क्या तुम गुटखा का सेवन करते हो? हां महाराज। क्या शरीर से कोई मेहनत करते हो? इस पर व्यक्ति ने झुककर कहा नहीं महाराज। संत कुछ सोचने लगे। तभी एक गधा घास चरता निकट आ गया। संत ने गधे की तरफ इशारा करते हुए व्यक्ति से पूछा, क्या गधा धूमपान करता है? नहीं महाराज। क्या कोई गुटखा खाता है? नहीं महाराज। क्या वह शराब पीता है? व्यक्ति ने कहा नहीं महाराज। संत ने फिर पूछा, क्या तुम्हारी तरह उसमें कोई अन्य अवगुण हैं? नहीं महाराज। क्या यह मेहनत करता है? बहुत मेहनत करता है महाराज। संत मुस्कराये और व्यक्ति से बोले, अब तुम ही यह बताओ कि आशीर्वाद किसे दूं ? तुम्हें या गधे को? अब व्यक्ति को संत की ओर से पूछे गए सभी प्रश्नों का सार समझ में आ गया। संत की वाणी का मर्म पहचान गया। उसने संत से क्षमा मांगते हुए उसी समय अपनी सभी बुरी आदतों व व्यसनों को छोड़ने का संकल्प लिया।
दिनेश विजयवर्गीय

