
जिन देशों में धर्म का सियासी इस्तेमाल करने या होने देने और धर्म को शासन का आधार बनाने के परिणाम कितने अवांछनीय होते हैं या हो सकते हैं, यह देखना हो तो ईरान को देखना चाहिए। 1979 में ईरान के शाह मुहम्मद रजा पहलवी के खिलाफ हुई क्रान्ति में जहां मजहबी कट्टरवादी शक्तियां सक्रिय थीं, वहीं बहुत से लिबरल और सेकुलर समूह भी शामिल थे। लेकिन उस क्रान्ति के बाद मजहबी कट्टरवादी ताकतें सारी सत्ता पर काबिज हो गर्इं और दिनोंदिन अधिकाधिकि निरंकुश होती चली गर्इं। इस कट्टरता का कहर सबसे अधिक स्त्रियों को भुगतना पड़ा। लेकिन इस कट्टरता, इस्लामी दिशा-निर्देशों, ईरानी सेंसरशिप और ‘मॉरल पोलिसिंग’ को अंगूठा दिखाते हुए विरोध का अग्निशिखा जलाने का काम भी स्त्रियों ने ही किया।