Monday, April 13, 2026
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बसपा की कभी बड़ी विरासत थी, अब वोट काटवा प्रत्याशी

  • बसपा सोशल इंजीनियरिंग के फार्मले के तहत करती थी काम

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: बसपा के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कभी राजनीति की बड़ी विरासत हुआ करती थी, लेकिन वर्तमान में हालात विपरीत क्यों हैं? पश्चिमी यूपी में बसपा ने जो टिकटों का जो वितरण किया है, वह बसपा के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है। क्योंकि बसपा ने ऐसे चेहरों को चुनाव मैदान में उतारा है, जिनका अपना कोई वजूद ही नहीं है।

बसपा सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के तहत काम करती थी, लेकिन इस बार बसपा के जो कैंडिडेट हैं वो वोट काटने से ज्यादा आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। क्योंकि उनका अस्तित्व ही नहीं है। ऐसा तब है जब पश्चिमी यूपी में बसपा के बाबू मुनकाद अली समेत कई बड़े नेता यहां पर रह रहे हैं। फिर भी ऐसे चेहरों पर दांव क्यों लगाया, जिनका अपना वजूद ही नहीं है।

हस्तिनापुर विधानसभा को ही ले तो यहां पर संजीव जाटव को बसपा ने चुनाव मैदान में उतारा है। संजीव जाटव का अपना कोई वजूद ही नहीं है, जिसका लाभ सपा-रालोद गठबंधन को हो सकता है। ऐसी प्रबल संभावनाएं बनी हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि संजीव जाटव के खिलाफ बाहरी होने का नारा भी लगा है। बसपा का जो मूल कैडर का वोटर है वह भी बसपा से छिटक गया है।

क्योंकि बसपा प्रत्याशी अपने कार्यकर्ताओं को ही नहीं मना पाए हैं। यही वजह है कि बसपा अपनों से ही भितरघात का खतरा बना हुआ है। फिर संजीव जाटव बाहरी प्रत्याशी हैं, जिसका नुकसान बसपा को हो रहा है, जो माहौल बसपा का कभी पश्चिमी यूपी में हुआ करता था इस बार कहीं भी नजर नहीं आ रहा है। इसकी वजह जो भी हो , लेकिन इतना अवश्य है कि नए चेहरे और अस्तित्व वाले नेताओं को टिकट नहीं देना भी मुख्य वजह मानी जा रही है।

इसी तरह से किठौर विधानसभा में भी केपी मावी को आयातित कर चुनाव में उतार दिया। किठौर में बसपा का अपना अस्तित्व करता था, लेकिन प्रत्याशी का खोखला वजूद बसपा को नुकसान पहुंचा सकता है। राजनीति के विशेषज्ञ भी मान रहे हैं कि कुछ इसी तरह से सरधना विधानसभा क्षेत्र में भी बसपा प्रत्याशी को लेकर काफी चर्चाएं चल रही है। बसपा का मूल वोटर भी उनको वोट देने से कतरा रहा है।

इसकी वजह सरकारी ठेकेदारी करने वाले संजीव धामा का वोट काटने के अलावा वजूद ही नहीं है, जिस वजह से बसपा को सरधना में भी नीचा देखना पड़ सकता है। सिवालखास क्षेत्र में नन्हे प्रधान को चुनाव मैदान में उतारा है। वह भी डमी प्रत्याशी की तरह से चुनाव लड़ रहे हैं। उनका कोई अस्तित्व दिखाई नहीं दे रहा है। इस तरह से बसपा के साथ विधानसभा क्षेत्रों में उतारे गए प्रत्याशी एक तरह से डमी प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं।

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