Saturday, March 14, 2026
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अपना सुरक्षा कवच बनाएं

 

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रमेन दासगुप्ता शुभ्रो

बढ़ता तापमान शरीर की नमी सोख लेता है। यही वजह है कि बहुत अधिक गर्मी पड़ने पर बार-बार प्यास लगती है। शरीर में नमी और पानी की कमी सेहत के लिए काफी खतरनाक हो सकती है। इसी तरह दूषित खानपान भी गर्मियों में बड़ी मुसीबत का सबब बन सकता है।

नमी बनाएं रखें

तेज गर्मी पड़ने पर शरीर में नमी की कमी न हो पाए, इसके लिए भरपूर मात्र में पानी पीना चाहिए। तेज धूप में निकलने के ठीक पहले कम से कम दो तीन गिलास पानी पीकर ही बाहर निकलना चाहिए। इसमें फायदा यह होता है कि दो तीन गिलास पानी कम से कम एक से डेढ़ घंटे तक शरीर के तापमान को सामान्य बनाए रखता है जिससे तेज गर्मी शरीर पर हावी नहीं हो पाती।

बचें तीखी गर्मी से

सूरज की तीखी धूप से बचने के लिए पर्याप्त सावधानी जरूरी है। तेज गर्मी आंखों में जलन पैदा करती है। ऐसे में धूप रोधी चश्मा काफी मददगार होता है। लू लपट की मार से बचने के लिए साथ में एक प्याज जरूर रखें। पास में रखा प्याज बाहरी गर्मी को सोख लेता है। गर्म हवाओं के थपेड़ों से बचने के लिए स्टोल, स्कार्फ का सहारा भी लिया जा सकता है।

नींबू-पानी

गर्मियों में अधिक पसीना निकलने, आहार में कमी और अन्य कई कारणों से शरीर सुस्त पड़ जाता है। ऐसे में एक गिलास पानी में आधा या पूरा नींबू, चुटकी भर नमक मिलाकर पीने से स्फूर्ति आती है। जल जीरा, गन्ने का रस, दही और लस्सी का सेवन भी फायदेमंद होता है। गर्मियों में कच्चे आम का पना, आम की चटनी, आम का रस भी शरीर को शीतलता प्रदान करता है।

खुली धूप में नहीं पिएं पानी

बहुत से लोग तेज धूप में राह चलते हुए प्यास लगने पर पानी पी ले लेते हैं जबकि खुली धूप में कभी भी पानी नहीं पीना चाहिए बल्कि पांच दस मिनट छांव में रहकर शरीर के ऊपरी और भीतरी तापमान को सामान्य स्तर पर आने के बाद ही पानी पीना चाहिए।

रखें पानी की शुद्धता का ध्यान

प्यास लगने पर पानी पीना जरूरी है लेकिन इसके साथ ही उसकी शुद्धता का ध्यान भी रखना जरूरी है। दुकानों में बिकने वाले पानी पाउच और होटलों में उपलब्ध पानी अक्सर शुद्ध नहीं होता। अशुद्ध पानी गंभीर किस्म के पेट की बीमारी का मुख्य कारण होता है। अच्छा होगा पानी पीने के पहले ही उसकी गुणवत्ता परख लें। धूप में चलते हुए बार-बार प्यास से बचने के लिए टॉफी या पान का सेवन किया जा सकता है इससे गला तर बना रहता है।

मानव देह का तापमान

मनुष्य शरीर की यह विशेषता है कि वह अपने अंदरूनी तापमान को बदलते मौसम के प्रभाव से बचाए रखता है। गर्मियों में पसीना निकल कर और सर्दियों में कंप-कंपी पैदा कर मानव देह अपना तापमान सामान्य स्तर जो 98.99 डिग्री फारनहाइट होता है, तक बनाए रखता है। इसके लिए शरीर की विशेष प्रणालियां लगातार काम करती हैं। इसके लिए मस्तिष्क की हायपोथेलेमस, व पिटयूटरी ग्रंथियां, त्वचा की स्वेद गं्रथियां, फेफड़े व गुर्दे, सभी अपने स्तर पर काम करते हैं।

जब बाहर बहुत अधिक गर्मी होती है तब पसीना अधिक बहाकर तथा इसी तरह के अन्य उपायों से शरीर के भीतरी तापमान सामान्य स्तर पर बना रहता है। जब बाहर का तापमान अत्यधिक लगभग 46.47 डिग्री के आसपास या फिर उससे अधिक हो जाए तो शरीर के भीतरी तापमान को नियंत्रित करने वाले अंग या तो सुस्त पड़ जाते है या काम करना लगभग बंद कर देते है। शरीर के तापमान में असामान्य घट-बढ़ को तीन अवस्थाओं में बांटा जा सकता है।

-हीट क्रेप्स
-हीट एक्साशन
-हीट स्ट्रोक

लू-लपट से बचाव

गर्मियों के दिनों में चलने वाली गर्म हवाओं (लू) का सीधा प्रभाव हमारे शरीर के तापमान को प्रभावित कर हमें बीमार कर देता है। यह इतना अधिक खतरनाक होता है कि समय पर इलाज उपलब्ध नहीं होने पर रोगी की जान भी जा सकती है।
लू लग जाने पर शक्कर, नींबू और नमक का घोल बनाकर फौरन मरीज को पिलाना चाहिए। मरीज को तत्काल ठंडे स्थान पर ले जाना चाहिए और उसके बदन से कपड़े उतार कर तौलिये को भिगोकर उस गीले तौलिये से मरीज के शरीर को पोंछते रहना चाहिए जब तक मरीज के शरीर का भीतरी और बाहरी तापमान सामान्य न हो जाए।
इतनी सावधानियां रखना आपके लिए ऐसा सुरक्षा कवच साबित होगा, जो आपको डॉक्टर के पास जाने से बचाएगा।


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