घटना उन दिनों की है, जब विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन की राजनीति में धीरे-धीरे प्रतिष्ठित हो रहे थे। वह प्रधानमंत्री तो नहीं बने थे, पर उसके प्रबल दावेदार माने जा रहे थे। उनके भाषण और खासकर उनकी हाजिरजवाबी की खूब प्रशंसा होती थी। ब्रिटेन के मीडिया में वह छाए रहते थे। उसमें उनके भाषण और चित्र प्रकाशित होते रहते थे। एक बार चर्चिल को भाषण देने कहीं जाना था। वह वहां जाने के लिए रेलगाड़ी में सवार हुए। थोड़ी देर बाद टिकट निरीक्षक उनके डिब्बे में आया। वह यात्रियों के टिकट की जांच करने लगा। जब चर्चिल की बारी आई तो उसने उनसे भी टिकट दिखाने का आग्रह किया। जब चर्चिल ने जेब में हाथ डाला, तो वहां टिकट नहीं था। वह परेशान हो गए। उन्होंने अपनी सभी जेबों में तलाशा। जब टिकट किसी भी जेब में नहीं मिला तो उन्होंने अपने साथ लाए सामान में खोजना शुरू किया। उन्हें देखकर वहां भीड़ लग गई। कई लोग आकर पूछने लगे कि वाकया क्या है। तब तक टिकट निरीक्षक भी उन्हें पहचान चुका था। वह नम्रतापूर्वक बोला, रहने दीजिए। मैं जानता हूं कि टिकट आपने अवश्य खरीदा होगा, पर कहीं रखकर भूल गए है। कुछ देर बाद ढूंढने की कोशिश कर लीजिएगा, हो सकता है आपको याद आ जाए। उसकी बात सुनकर चर्चिल बोले, तुम्हें कैसे लगा कि मैंने टिकट खरीदा ही होगा? निरीक्षक ने कहा, आप एक जिम्मेदार व्यक्ति हैं। दूसरों को नियम पालन करने की सलाह देते हैं। ऐसा हो नहीं सकता कि आप टिकट न खरीदें। यह कहकर निरीक्षक जाने लगा। चर्चिल ने उसे रोककर कहा, टिकट निरीक्षक के मांगने पर टिकट दिखाना प्रत्येक यात्री का कर्तव्य है। इसमें किसी प्रकार की कोताही सही नहीं है। कर्तव्य पालन में छोटे-बड़े का भेदभाव नहीं होना चाहिए, तभी एक नैतिक व मर्यादित समाज बनेगा। इतना कहकर वह टिकट खोजने में लग गए।