
पिछले दिनों बिहार के उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने राजद के मंत्रियों के लिए एक आचार संहिता घोषित की है। तेजस्वी ने राजद के मंत्रियों को सतर्क किया है कि मिलने आने वाले कार्यकर्ताओं, शुभचिंतकों और समर्थक आदि, अगर आयु में वरिष्ठ हैं, तो उन्हें पांव नहीं छूने दें तथा शिष्टाचार की मर्यादा रखें। अभिवादन के लिए हाथ जोड़कर प्रणाम करें, नमस्कार करने की परंपरा को प्रोत्साहित करें। इसके साथ ही मंत्रियों का व्यवहार सबके साथ सौम्य और शालीन होना चाहिए एवं उन्हें बातचीत में सकारात्मक रहने और निरर्थक विवादों से बचना चाहिए। सभी जाति और धर्मों के गरीब एवं जरूरतमंद लोगों की प्राथमिकता के आधार पर सहायता करें। इसके साथ ही मंत्रियों को मिलने वाले उपहार को लेकर भी कहा गया है कि किसी से भेंट के रूप में गुलदस्ता या अन्य वस्तु को लेने के स्थान पर पुस्तक और कलम का आदान-प्रदान करें। हमारे देश में स्वतंत्रता के बाद से राजनीति में शुचिता हेतु आचार संहिता बनाने के लिए समय-समय पर प्रयास हुए हैं। आचार संहिता की परिभाषा को लेकर भी भिन्न-भिन्न विचार हैं। अधिकांश लोगों की राय में किसी व्यक्ति, दल या संगठन के लिए निर्धारित सामाजिक व्यवहार, नियम एवं उत्तरदायित्व को परिभाषित करने वाले नियमों को आचार संहिता कहते हैं। इसमें जनप्रतिनिधियों के लिए कार्यस्थल व्यवहार और जन-सामान्य के प्रति सम्मान शामिल है। राजनीति में शुचिता के लिए चार दशक पहले भाजपा के प्रथम अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने भाजपा के लिए एक आचार संहिता की घोषणा की थी। इसमें कहा गया था कि संसद और विधानसभाओं की गरिमा और उच्च प्रजातांत्रिक परंपराओं को सुदृढ़ करने के लिए पार्टी ने अपने विधायकों और सांसदों के लिए आचार संहिता तैयार की है। इसके अनुसार वे राष्ट्रपति या राज्यपाल के अभिभाषण में रुकावट नहीं डालेंगे। धरना, घेराव और डेस्क पर चढ़ने जैसे काम तथा काले झंडे के प्रदर्शन में हिस्सेदारी नहीं करेंगे और ना ही सदन में कोई वस्तु फेकेंगे। नई दिल्ली में 23-24 सितंबर 1992 में हुए पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में संसद और विधान-मंडल में आचार समितियों के गठन की अनुशंसा की गई थी। देश में पहली आचार समिति का गठन 4 मार्च 1997 को राज्यसभा के तत्कालीन सभापति के.आर.नारायण ने किया था, वरिष्ठ सांसद शंकर राव चव्हाण इसके अध्यक्ष थे। वर्ष 1996 में समिति ने अपने पहले प्रतिवेदन में सदस्यों के लिए 14 सूत्री कोड बनाया था, जिसमें संसद के सम्मान और विश्वसनीयता के प्रति सदस्यों का आचरण शामिल है। इसके बाद 16 मई 2000 को लोकसभा में आचार समिति का गठन हुआ, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर इसके अध्यक्ष बनाए गए थे। ये आचार समितियां न केवल सांसदों के आचरण, अनैतिक व्यवहार और नियमों के उल्लंघन की जांच करती हैं, अपितु अपनी कार्यप्रणाली के बारे में जनसामान्य में जागरूकता बढ़ाने का कार्य भी करती हैं। वर्ष 2018 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति एम.वेंकैया नायडू ने नई दिल्ली में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था कि सभी दलों को चाहिए कि वह आपसी सहमति से अपने सदस्यों के लिए एक आचार संहिता का निर्माण करे जिसे विधानमंडल एवं संसद के अंदर और बाहर व्यवहार में लाया जा सके।
लोकतान्त्रिक व्यवस्था में एक विधायी सरकार और सशक्त विपक्ष के लिए अपने कार्य-व्यवहार में अनुशासन के लिए आचार संहिता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आज तक किसी भी दल द्वारा ऐसी कोई व्यवस्थित और स्थायी आचार संहिता नहीं बनाई गयी है, जिसमें विधायकों और सांसदों के लिए सदन के भीतर और बाहर के क्रियाकलाप और आचरण के बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश हों।आदर्श जन-प्रतिनिधि का आचरण और व्यवहार ऐसा होना चाहिए जिससे समाज के जीवन में मानवीय मूल्यों और शासन में लोकशक्ति को प्रतिष्ठा मिल सके। यह तभी संभव होगा जब वे स्वयं अपने विचार और आचरण में शुचिता को प्राथमिकता देंगे। जन-प्रतिनिधियों में ऐसा वैचारिक परिवर्तन होने के बाद ही वे सरकारी कर्मचारियों और समाज के विभिन्न वर्गों से किसी आचार संहिता का पालन करा सकते हैं। जब तक राजनीतिज्ञों की सत्ता की अंतहीन दौड़, धन की अमर्यादित आकांक्षा और असीमित सुविधाओं की मांग पर प्रभावी अंकुश नहीं लगेगा, तब तक दल-बदल, राजनीति का अपराधीकरण और अन्य समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
अनुशासन और चरित्र के उपदेश जब स्वयं के जीवन में लागू होंगे तभी दूसरों पर प्रभावी होंगे। स्वतंत्रता संग्राम में नेताओं की कथनी और करनी में कोई भेद नहीं था, तब सारे देश में उनकी अपील का असर होता था। यही कारण है कि पराधीनता से मुक्ति के एक विचार के साथ सम्पूर्ण राष्ट्र खड़ा हो गया था। सरकार, समाज और व्यक्ति की सामूहिक शक्ति का राष्ट्र निर्माण में उपयोग हो, इस हेतु एक नागरिक आचार संहिता बनाना भी जरूरी है। आचर संहिता जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यक है।


