Wednesday, April 29, 2026
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आत्महत्या की ओर बढ़ता रुझान

Samvad 52


DR VISHESH GUPTAविश्व में हर साल 10 सितम्बर विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के रुप में मनाया जाता है। इस दिवस के माध्यम से प्रत्येक वर्ष आत्महत्या और मानसिक स्वास्थय के बारे में बात करते हुए इसकी रोकथाम को लेकर जागरुकता बढ़ाने के प्रयास किए जाते हैं। 2021 से लेकर 2023 तक विश्व स्तर पर कर्म के माध्यम से आशा का निर्माण विषय का निर्धारण किया गया है। इस विषय को केंद्र में रखकर पूरी दुनिया में इस दिन पीले रिबन का प्रतीक के रूप में पहना जाता है। इस प्रतीक के माध्यम से आत्महत्या की रोकथाम के लिए जगह-जगह चर्चा करके दुनिया के लोगों को जागरुक करने का प्रयास किया जाता है। 2003 में विश्व स्वास्थय संगठन ने इस दिवस की शुरुआत की थी। आत्महत्याओं के विश्व से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि एक साल में बारह लाख से भी अधिक लोग आत्महत्या करने को मजबूर हैं। आज स्थिति यह है कि नाबालिग बच्चों के साथ में बड़े-बूढ़ों, स्कूल कॉलेजों के छात्र-छात्राओं, नवविवाहित दुल्हनों के साथ में छद्म प्रेम में बढ़ती आत्महत्या की बढ़ती दर किसी से छिपी नहीं है। विश्व के कई विकासशील देशों के साथ में भारत भी आज युवाओं में आत्महत्याओं की बढ़ती दर को लेकर परेशान है। ऐसा क्या है कि बच्चों से लेकर किशोर, टीवी सीरियल व फिल्म कलाकार,छात्र, बड़े-बूढ़े,महिलायें, निर्धन, किसान व व्यापारी तक जीवन जीने के मुकाबले मौत को गले लगाना ज्यादा बेहतर समझ रहे हैं? इस सबंध में गौरतलब कि विश्व स्वास्थय संगठन(डब्ल्यूएचओ) ने हाल ही में आत्महत्या को लेकर अपनी एक वैश्विक रिपोर्ट प्रकाशित की है। रिपोर्ट खुलासा करती है कि विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों के लोग अधिक आत्महत्या कर रहे हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि विकसित देशों में महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में आत्महत्या की दर अधिक है। आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में हर 40 सेकेड़ में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है और हर साल आठ लाख लोग खुदखुशी से मरते हैं।

आत्महत्या के मामले में भारत की स्थिति भी काफी चिंताजनक है। भारत में आत्महत्या से जुड़े नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के तुलनात्मक आंकड़े बताते हैं कि भारत में आत्महत्या की दर विश्व आत्महत्या दर के मुकाबले बढ़ी है। वास्तविक स्थिति यह है कि पूरी दुनिया में कुल आत्महत्या करने वाले लोगों में 25 फीसदी से भी अधिक लोग भारतीय हैं। भारत में पिछले दो दशकों की आत्महत्या दर में एक लाख लोगों पर 2.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आज भारत में 37.8 फीसदी आत्महत्या करने वाले लोग 30 वर्ष से भी कम उम्र के हैं। दूसरी ओर 44 वर्ष तक के लोगों के आत्महत्या की दर 71 फीसदी तक बढ़ी है। भारत के प्रांतीय स्तर पर आत्महत्या से जुडे एनसीआरबी के ही आंकडे देखने से पता लगता है कि दक्षिण भारत के केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के साथ में पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में आत्महत्याओं की कुल धटनाओं का 56.2 फीसदी रिकार्ड किया गया। शेष 43.8 फीसदी घटनाएं 23 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज हुर्इं। उत्तर भारत के राज्यों अर्थात पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों में एक लाख लोगों पर आत्महत्या की दर मात्र पांच आंकी गई है। इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण के राज्यों में आत्महत्या की दर अधिक होने के साफ संकेत मिल रहे हैं।

देश में किसी भी व्यक्ति द्वारा की गई आत्महत्या इस सामाजिक व्यवस्था की नाकामयाबी पर एक बदनुमा दाग है। आत्महत्या से जुड़ी यह समस्या आज हमें यह सोचने-समझने को मजबूर कर रही है कि आखिर भारतीय संस्कृति से जुडे परिवार, प्रेम, नैतिकता, आदर्श, मानदंड, स्नेह, वात्सल्य, पारस्परिक बातचीत तथा साझेदारी जैसी सामाजिक संस्थाओं का मानव जीवन में असर कम क्यों होता जा रहा है? कई बार हम बच्चों, युवाओं, महिलाओं और किसानों के बीच बढ़ती आत्मघाती घटनाओं के लिए तनाव व काम का दबाव, प्रेम में असफलता, गैर बराबरी, बेरोजगारी, गरीबी व नशे की लत जैसे कारकों को दोषी ठहराते हैं। कड़वा सच यह है कि ये दशाएं तो कमोबेश प्रकारान्तर से प्रत्येक देश व काल में मौजूद रही हैं। परंतु पहले लोग इतनी बड़ी संख्या में और इतनी जल्दी मौत के सामने हथियार तो नहीं डाल देते थे। इसलिए आज हमें गला काट होड़ के माहौल में व्यक्ति की उस हताशा भरे जीवन की मनोदशा को भी समझना पड़ेगा, जहां वह जीवन की तल्ख सचाइयों से मुंह चुराकर भाग रहा है।

पिछले ही दिनों विश्व स्वास्थय संगठन के अध्ययन में यह भी पाया गया है कि भारत में नौ फीसदी लोग लंबे समय से जीवन में निराशाजनक स्थिति से गुजर रहे हैं। खास बात यह है कि भारत जैसे धार्मिक व आध्यात्मिक देश में आबादी के एक तिहाई से भी अधिक लोग तो गंभीर रूप से हताशा की स्थिति में हैं। पिछले ही दिनों केन्द्रीय स्वास्थय मंत्रालय की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि देश में साढ़े छह करोड़ करोड़ मानसिक रोगियों में से 20 फीसदी लोग डिप्रेशन के शिकार हैं। देश की हैल्थ प्रोफाइल रिपोर्ट भी बताती है कि बढ़ती हुई महत्वाकांक्षाएं, एक-दूसरे से आगे निकल जाने की गलाकाट होड़ तथा मोटी पगार वाली नौकरी की चिंता आज लगातार लोगों को सता रही है। अनुमान किया जा रहा है कि 2025 तक डिप्रेशन दुनिया की सबसे बड़ी बीमारी के रूप में उभरकर सामने आएगा।

डब्ल्यूएचओ की इस रिपोर्ट में अंत में आत्महत्या के निदान के तौर पर सरकारों को सलाह दी गई है कि आत्महत्या की मीडिया रिपोर्टिंग सही तरीके से हो। दूसरे, देश में अल्कोहल को लेकर ठोस नीति बनाई जाए। तीसरे, आत्महत्या के संसाधनों पर रोक लगाते हुए आत्महत्या के प्रयास करने वालों की उचित देखभाल की जाए। इससे भी आगे बढ़कर परिवारों के साथ-साथ शिक्षण संस्थाओं में भी सघन संवाद करने और सुख-दुख को मिलकर बांटने की प्रक्रिया भी तेजी से शुरू करने की महती आवश्यकता है। कुल मिलाकर कहना न होगा कि आत्महत्या की घटनाएं विशुद्ध रूप से ये एक समाजशास्त्रीय प्रघटना है। इससे जुड़ा आत्महत्या का समाजशास्त्र बताता है कि जब सामाजिक बदलाव के तीव्र दौर में परंपरागत रूप से स्थापित सामाजिक जीवन को संचालित करने वाले मानक खारिज होने लगते हैं तथा जल्दी से नए समाज के मानक स्थापित नहीं हो पाते तो नए माहौल में लोग पहचान के संकट से घिर जाते हैं। यही अस्मिता के संकट की स्थिति लोगों में मानसिक अवसाद और हताशा को जन्म देती है। इसकी अन्तिम परिणति आत्महत्या के रूप में होती है। इसका निवारण न तो कानून के द्वारा संभव है और न ही आत्महत्या करने वाले लोगों को समझाने-बुझाने से। चुनौतियों का डटकर मुकाबला करना तथा सफल लोगों की असफलताओं से सीख लेकर ही आत्महत्या के बढ़ते रुझान पर काबू पाया जा सकता है।


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