वंदे मातरम गीत के जन्म के संबंध में अनेक कल्पित घटनाओं का उल्लेख किया जाता है। किसी लेखक या कवि के बारे में यह निर्णय करना कठिन है, कब, किस प्रेरणा वश उसने उक्त रचना को जन्म दिया। रचना काल वही माना जाता है, जब लेखक स्वयं रचना की तिथि लिखे या वह रचना छपकर लोगो के सामने आए। बंकिम बाबू के सभी जीवनी लेखकों ने एकमत से यह स्वीकार किया है कि आमार दुर्गोत्सव तथा एकटी गीत लिखते समय वंदे मातरम गीत का जन्म हुआ था।
संजीव शर्मा
घटना 14 अप्रैल 1906 की है। बारीसाल बंगाल में प्रादेशिक कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला था, जिसकी अध्यक्षता अश्वनी कुमार दत्ता को करनी थी। बारीसाल में उनके प्रभाव को इस घटना से जाना जा सकता है कि एक दिन जिला कलेक्टर बाजार में कपड़ा खरीदने आए तो दुकानदारों ने उनको कपड़ा देने से मना कर दिया। कारण पूछने पर दुकानदारों ने कहा जब तक दत्त बाबू हमें आदेश नहीं देते तब तक हम विदेशी कपड़े को नहीं बेचेंगे। यह घटना उनके प्रभाव की एक बानगी भर है।
लॉर्ड कर्जन के शासनकाल में बंगाल का विभाजन कर दिया गया। उन दिनों असम,बंगाल,उड़ीसा, बिहार और छोटा नागपुर का क्षेत्र बंगाल कहलाता था। 7 अगस्त 1905 को कोलकाता के टाउन हॉल में बंग-भंग दिवस मनाया गया। यह वह ऐतिहासिक सभा थी, जिसमें सर्वप्रथम देशवासियों को वंदे मातरम का नारा मिला। आनंद बाजार पत्रिका के संपादक श्री प्रफुल्ल कुमार सरकार ने लिखा, जहां तक मुझे स्मरण है कि सन 1905 की सातवीं अगस्त को टाउन हॉल में बंग- भंग के विरुद्ध जो बायकाट सभा का आयोजन किया गया था। इस सभा में वंदे मातरम का नारा लगाया गया था।
नए प्रांत पूर्वी बंगाल तथा असम के लेफ्टिनेंट गवर्नर बेमिफील्ड फूलर को बनाया गया। पद संभालने से पहले उसने एक भाषण दिया मेरी दो बीवियां है एक हिंदू और दूसरी मुसलमान, दूसरी बीवी मेरी चहेति बीवी है। उसके इस वक्तव्य से उसकी सोच का पता चलता है। उसी के आदेश पर बारीसाल कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम कहने पर पाबंदी लगा दी गई। बावजूद इसके 14 अप्रैल के निकले जुलूस में लोग सीने और बांहों पर वंदे मातरम के बिल्ले पहने, वंदे मातरम लिखे झंडे हाथ में लिए हुए थे। वंदे मातरम नारा लगाते ही लाठियां की बौछार हो रही थी इस घटना के बारे में परमेंद्र मित्र लिखते हैं, बारीसाल कांग्रेस में कांग्रेस सभापति का जुलूस शव यात्रा के रूप में परिणित हो गया। एक मकान की खूंटी पर वंदे मातरम लिखा था उस मकान को गिरा दिया गया । 10-11 वर्ष का एक बालक रसोई घर में प्रसन्न भाव से वंदे मातरम गा रहा था उसे घर से निकालकर चाबुक से मारा गया। दो हलवाइयों की दुकान पर वंदे मातरम लिखा हुआ था उनके सिर फोड़ दिए गए। शासन ने पहले से ही 600 गोरखा सैनिकों को बुला रखा था जिससे की सभा में वंदे मातरम न गाया जा सके।
वंदे मातरम गीत के जन्म के संबंध में अनेक कल्पित घटनाओं का उल्लेख किया जाता है। किसी लेखक या कवि के बारे में यह निर्णय करना कठिन है, कब, किस प्रेरणा वश उसने उक्त रचना को जन्म दिया। रचना काल वही माना जाता है, जब लेखक स्वयं रचना की तिथि लिखे या वह रचना छपकर लोगों के सामने आए। बंकिम बाबू के सभी जीवनी लेखकों ने एकमत से यह स्वीकार किया है कि आमार दुर्गोत्सव तथा एकटी गीत लिखते समय वंदे मातरम गीत का जन्म हुआ था। बंकिम बाबू के भतीजे सचिश चंद्र चटर्जी के अनुसार, यह गीत झटके में नहीं लिखा गया जब तक लेखक आत्मस्थ, तन्मय, अनुप्राणित न हो तब तक नहीं लिख सकता। सन 1857 ई से 1873 ई तक नील विद्रोह, हिंदू मेला, भारत माता नाटक तथा तत्कालीन राष्ट्रीयता की लहर के प्रभाव से एक लेखक कैसे अछूता रह सकता है?
इन सभी घटनाओं के फलस्वरूप वंदे मातरम जैसे अमर गीत का उद्भव हुआ होगा। वंदे मातरम गीत के जन्म के बारे में जितनी विवादस्पद बातें प्रचारितहैं, ठीक उसी प्रकार उसके प्रथम सुरकार के बारे में भी विभिन्न दावे हैं। बंकिम बाबू के अनुज पूर्ण चंद्र ने स्पष्ट रूप से लिखा है इसे प्रथम बार बंकिमबाबू के संगीत अध्यापक यदुनाथ भट्टाचार्य ने मल्हार राग कौवाली ताल में गाया। 1882 में प्रकाशित होने से पूर्व सन 1880 में जब आनंद मठ उपन्यास धारावाहिक रूप में बंग दर्शन में प्रकाशित होने लगा तब इसकी स्वरलिपि का वर्णन किया गया। इसके उपरांत नेपाल चंद्रधर, देवकांत बागची, बालक पत्रिका की सहायक सम्पादिका श्रीमती प्रतिभा सुंदरी देवी ने अपनी-अपनी स्वर लिपियों में इसे गया।
बाद में 1896 में विडन उद्यान में कांग्रेस अधिवेशन में रविंद्र नाथ टैगोर ने इसे गाया। जिसका उल्लेख पट्टाभी सीतारमैया द्वारा लिखित कांग्रेस के इतिहास में आ गया। सन 1901 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में दक्षिण रंजन सेन ने एक नई स्वरलिपि में वंदे मातरम का गायन किया। रवि बाबू के गायन के बाद से लगातार कांग्रेस मंच पर मंगलाचरण के रूप में वंदे मातरम का प्रयोग होता रहा। कांग्रेस के 1905 के काशी अधिवेशन में रविंद्र नाथ टैगोर की भांजी सरला देवी चौधरानी ने प्रथम बार सप्त कोटि के स्थान पर त्रिन्स कोटि शब्द प्रयोग कर वंदे मातरम का गायन किया। बाद में 24 अगस्त 1948 को भारत के विभाजन की तरह कंटा-छंटा राष्ट्रीय गीत स्वीकारिता के साथ त्रिन्स कोटि के स्थान पर कोटि-कोटि कर दिया गया। 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना के साथ ही वंदे मातरम का विरोध होना प्रारंभ हो गया।
1923 में काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन का अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली को बनाया गया। उन्होंने अध्यक्ष पद से कहा कि वंदे मातरम इस्लाम धर्म के विरुद्ध होने के कारण गाया नहीं जा सकता। अली के प्रतिवाद करने पर भी पंडित जी ने पूरा वंदे मातरम गीत गाया। इस घटना का विवरण पुणे के मराठा में एन आई विटनेस शीर्षक से उन दिनों प्रकाशित हुआ था। सन 1937 में कांग्रेस कार्यकारिणी समिति ने मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेंद्र देव की उप समिति गठित की जिसे रवींद्रनाथ ठाकुर से परामर्श कर राष्ट्रीय गीत के रूप में इसकी उपयुक्तता पर निर्णय देना था। समिति ने गीत के प्रारंभ दो पदों को ही मान्यता प्रदान की। इस विषय को लेकर रविंद्र नाथ टैगोर की भी खूब आलोचना हुई। लोगों ने कहा कि वे वंदे मातरम गीत को हटाकर वे अपने गीत जन- गण -मन को मान्यता दिलाना चाहते हैं।
1937 की हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में आमंत्रण के बावजूद पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने अपूर्ण वंदे मातरम गाने से मना कर दिया। 15 अगस्त 1947 को आकाशवाणी पर वंदे मातरम गाने का आमंत्रण मिलने पर उन्होंने पूर्ण वंदे मातरम गाने की शर्त रख दी। जिसको तत्कालीन उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने तुरंत स्वीकार कर लिया। पंडित जी ने खड़े होकर सस्वर पूर्ण वंदे मातरम गीत गाया।

