- दवाइयों से भरे पड़े गोदाम, खत्म नहीं होता दवाइयों का स्टॉक, पहुंच जाती है नई खेप
- वास्तविकता जानने जनवाणी टीम कोतवाली से सटे राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल पहुंची
- डॉक्टरों की ड्यूटी चल रही मनमाफिक, अस्पताल में नहीं बैठते डॉक्टर साहब
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: केन्द्र और यूपी सरकार ने आयुर्वेदिक चिकित्सा पर पूरा फोकस कर रखा हैं। भरपूर दवाई व तमाम सुविधाएं मुहैय्या कराई जा रही हैं। डॉक्टरों की भी तैनाती की जा रही हैं। दवाइयों से गोदाम भरे हुए हैं। दवाई का स्टॉक खत्म नहीं होता, नई दवाइयों की खेप पहुंच जाती हैं। इसके बावजूद जनपद में आयुर्वेदिक अस्पतालों के हालात कैसे है? यह जानने के लिए जनवाणी टीम ने वास्तविकता जानने के लिए शहर कोतवाली से सटे राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल में पहुंचे।
यहां की तस्वीर एक दम उलट मिली। डॉक्टर अस्पताल में मौजूद ही नहीं थे। जानकारी की तो मालूम हुआ कि डॉक्टर कभी आते हैं और कभी नहीं। उनके आने जाने का कोई निर्धारित समय नहीं है। डॉक्टरों की ड्यूटी मर्जी के मुताबिक चल रही है, लेकिन डॉक्टर हैं कि अस्पताल में बैठते नहीं है। मरीज हर रोज अस्पताल में पहुंचते हैं, लेकिन ट्रीटमेंट नहीं मिलता।
यही वजह है कि राजकीय आयुर्वेदिक अस्पतालों में मरीजों का जो रजिस्टर मेंटेन किया जा रहा है, उसमें भी फर्जीवाड़ा है। एक मोबाइल नंबर ही कई कई मरीजों के नाम के सामने लिख दिया जाता है। इस तरह से आयुर्वेदिक अस्पतालों में डॉक्टर सप्ताह में एक दिन आकर ही हाजिरी पूरी कर दे रहे हैं। यह खेल लंबे समय से चल रहा है। राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल के हालात इतनी बदतर हो सकते है, शायद इसकी कल्पना भी नहीं की होगी।

डा.रेनू की यहां ड्यूटी है, जो ड्यूटी से नदारद मिली बताया गया है कि वह आज नहीं आई है। मरीज आ रहे थे, लेकिन उनको दवाई नहीं दी जा रही थी। जनवाणी टीम ने भी मरीज बनकर देखने के लिए कहा, लेकिन अटेंडेंट ने यह कहकर मना कर दिया कि डा. साहब ही नए मरीजों को देखते हैं, उसके बाद ही दवाई दी जा सकती हैं। वो मरीजों को नहीं देखते। वो सिर्फ उन लोगों को दवाई दे सकती है, जिनके पुराने पर्चे बने हुए हैं। नए पर्चों पर दवाई नहीं देंगे। उसको डॉक्टर ही देखेंगे, तब दवाई मिलेगी।
- केस-1
आबिदा निवासी कोतवाली क्षेत्र पुराना शहर कई दिनों से बुखार से पीड़ित है। यह उम्मीद लेकर राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल में पहुंची थी कि उन्हें उपचार मिलेगा। क्योंकि वह गरीब है। उसके पास प्राइवेट डॉक्टर के पास जाने के लिए फीस नहीं हैं। इसी वजह से आयुर्वेदिक अस्पताल में पहुंची थी, लेकिन डॉक्टर मौजूद ही नहीं थे, जिसके चलते उनको कह दिया गया कि आज डॉक्टर नहीं है।
लिहाजा एक-दो दिन बाद अस्पताल में आना । यह हालत है आयुर्वेदिक अस्पताल की। जिसको बुखार हो, उसे ट्रीटमेंट मिलना अनिवार्य होता हैं, लेकिन यहां पर ट्रीटमेंट नहीं दिया गया। यह पहला मामला नहीं, बल्कि कई मामले आ चुके हैं। आबिदा का कहना है कि कई बार पहले भी आ चुकी हैं, लेकिन यहां पर डॉक्टर गायब ही मिलते हैं, जो मिलना चाहिए था वह नहीं मिलता।
- केस- 2
पुराना शहर निवासी रईसा का कहना है किउसको पेट में दर्द की शिकायत थी, जिसके बाद ही अस्पताल में दवाई लेने के लिए आई थी, मगर डॉक्टर नहीं है। अटेंडेंट ने दवाई देने से मना कर दिया है। इस तरह से वापस जा रही हूं। यह हालत है राजकीय आयुर्वेदिक अस्पतालों की, जहां पर दवाई तो भरमार है, लेकिन डॉक्टर नहीं बैठते। फिर दवाई गोदाम में भरे होने का लाभ क्या है?
मरीजों तक दवाई नहीं पहुंच रही हैं। मरीज बिना ट्रीटमेंट लिए ही अपने घरों को लौट रहे हैं। इन्हें कोई परवाह नहीं है मरीजों की। इलाज हो या फिर नहीं, डॉक्टरों की सेहत पर क्या असर पड़ने वाला हैं। उन्हें तो हर माह बिना अस्पताल में पहुंचे ही वेतन तो मिल रहा हैं। सब सेटिंग का खेल चल रहा हैं।
जर्जर बिल्डिंग…
जिस बिल्डिंग में राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल चल रहा है, वह बहुत ही पुरानी बिल्डिंग है, जो जर्जर हो चुकी है। जिस तरह से बारिश में पुरानी बिल्डिंग शहर में गिर रही है, इसके भी गिरने का खतरा बना रहता है, लेकिन राजकीय अस्पताल के लिए बिल्डिंग के लिए कोई बजट नहीं है, जिसके चलते राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल जर्जर बिल्डिंग में ही चल रहा है।

बताया गया है कि ये करीब 100 वर्ष पुरानी बिल्डिंग है, जिसमें आयुर्वेदिक अस्पताल संचालित किया जा रहा है। दूसरे भाग में प्राइमरी स्कूल संचालित किया जाता है। जर्जर बिल्डिंग के रूप में नगर निगम ने करीब 100 से ज्यादा बिल्डिंग चिन्हित हुई थी, जिसमें से एक राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल की बिल्डिंग भी शामिल है। इसके बावजूद भी जर्जर भवन में ही राजकीय अस्पताल भी चल रहा है।
बेड है, भर्ती नहीं करते
आयुर्वेदिक अस्पताल में मरीजों को भर्ती कर उनका ट्रीटमेंट करने की भी सुविधा है। यह सब सरकारी दस्तावेजों में हैं, लेकिन धरातल पर नहीं। मरीजों के लिए बेड की सुविधा भी दी गई है, लेकिन राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल उनमें एक भी मरीज को भर्ती नहीं किया जाता। ओपीडी में ही मरीज नहीं देखे जा रहे हैं तो फिर भर्ती करने का तो सवाल ही नहीं उठता।


