Thursday, March 26, 2026
- Advertisement -

कांग्रेस नेतृत्व को लेने होंगे कठोर निर्णय

Nazariya


PRASHANT KAUSHIKकांग्रेस नेतृत्व को अब कड़े फैसले लेने की बेहद आवश्यकता है। कांग्रेस नेतृत्व लगातार ऐसे नेताओं को ढोता चला आ रहा है, जो केवल स्वयं के स्वार्थ के लिए कांग्रेस का नुकसान करने में संकोच नहीं करते है। हालिया घटनाक्रम को देखे तो उसमें जहां एक तरफ मिलिंद देवड़ा, अशोक चव्हाण और आचार्य प्रमोद कृष्णम जैसे नेताओं के नाम सामने आते है, वहीं कमलनाथ जैसे नेता भी सार्वजनिक रुप से अपनी विश्वसनीयता को स्वयं ही धूमिल करते दिखाई दे रहे है, और इससे पहले तो कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी या अन्य दलों का दामन थामने वालों की एक लम्बी फेहरिस्त है। तमाम झटकों और धोखे के बावजूद कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व या यूं कह लीजिए कि गांधी परिवार अपने आसपास के नेताओं की विश्वसनीयता परख क्यों नहीं पाता है? क्यों वह ऐसे नेताओं की मंडली में स्वयं को घिरा रखता है, जो सत्ता से दूर होते ही या संगठन में प्रमुखता ना मिलने पर कांग्रेस का हाथ छोड़ कर कांग्रेस के विरोधी पक्ष के साथ जाने में जरा सी भी देरी नहीं करते है। ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, सुष्मिता देव, मिलिंद देवड़ा यह ऐसे नाम है, जिन्हें गांधी परिवार का और खास तौर पर राहुल गांधी का नजदीकी माना जाता रहा है और कहा जाता था कि भविष्य के लिए कांग्रेस नेतृत्व इन लोगों को तैयार कर रहा है, लेकिन तमाम अवसर और प्रतिष्ठा देने के बावजूद इन लोगों ने कांग्रेस को छोड़ने में एक पल भी नहीं लगाया और सत्ता के गणित में अपना आंकड़ा बैठाने के लिए बीजेपी के साथ या अन्य ऐसे दलों का साथ पकड़ लिया, जहां से उन्हें सत्ता प्राप्त हो सकें।

यहां तो केवल कुछ नामों का ही उल्लेख किया है, अगर पूरे राजनीतिक परिदृश्य का आकलन करेंगे, तो पता चलेगा कि कांग्रेस छोड़ कर जाने वाले लोगों से बीजेपी इस समय भरी हुई है और अनेकों सांसद बीजेपी के ऐसे है, जो बीजेपी या आरएसएस की विचारधारा की विरोधी राजनीतिक विचारधारा में रह कर राजनीति करते रहे हैं। राजनीतिक हितों की पूर्ति करना ही राजनीतिक लोगों की प्राथमिकता होती है, लेकिन क्या राजनीतिक विचारधारा या राजनीतिक कमिटमेंट आज के समय केवल खानापूर्ति बन कर रह गया है, यह बड़ा सवाल है। 2024 का लोकसभा चुनाव सन्निकट है, ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व को बिना समय गंवाए अपने सहयोगी घटक दलों के साथ अपना सीधा संवाद स्थापित कर सीटों का फामूर्ला तय करना चाहिए और एक साझा घोषणा पत्र को भी तैयार करना चाहिए, जिससे बीजेपी सरकार की नीतियों के सामने वह अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को जनता के समक्ष प्रस्तुत कर सकें और जनता को यह विश्वास दे सके कि हमारी नीतियां बीजेपी सरकार से कैसे और क्यों बेहतर है। कमलनाथ हो या अन्य कोई नेता, कांग्रेस नेतृत्व को ऐसे सभी नेताओं से सावधान रहना होगा और कांग्रेस की चुनावी रणनीतियों और योजनाओं के क्रियान्वयन से भी इन्हें दूर रखना होगा, क्योंकि मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों को लेकर वैसे भी बहुत सारे सवाल प्रमुख नेताओं की कार्यशैली पर लगातार लग ही रहे हैं। यह जरुरी है कि गांधी परिवार को व्यवहारिक रूप से फैसले करने पड़ेंगे और ऐसे नेताओं को प्रमुखता देने से बचना होगा, जो केवल परिवार से रिश्तों के आधार पर या इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी के समय में उनके साथ राजनीति करने के नाम पर आज तक प्रमुखता पाते रहे हैं।

कई वरिष्ठ नेताओं ने एक समय कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव बनाने के इरादे से एक समूह का गठन कर लिया था और उसमें प्रमुख रुप से गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल, आनन्द शर्मा, मनीष तिवारी जैसे नाम थे, जो हमेशा गांधी परिवार के बेहद विश्वसनीय रहे हैं, लेकिन सत्ता से दूर होते ही सारे विश्वसनीय नाम अपने नेतृत्व को ही दबाव में लेते दिखाई देने लगे और गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल तो पार्टी को ही अलविदा कह गए। गुलाम नबी आजाद जैसे नेताओं से अगर कोई यह पूछे कि आपको पार्टी ने क्या नहीं दिया, तो इसके उत्तर में उनके पास कोई सार्थक जवाब नहीं होगा। ऐसी ही गाथा राजस्थान की भी है, जहां अशोक गहलोत और सचिन पायलट के मध्य हुए टकराव और अशोक गहलोत की जिद ने पार्टी की संभावनाओं को भरपूर पलीता लगाया है और सीधा-सीधा पार्टी नेतृत्व के फैसले को उनके खासमखास लोगों ने चुनौती देने में कोई संकोच नहीं किया। ऐसे उदाहरण कांग्रेस में केवल एक या दो नहीं, बल्कि ऐसे संदर्भों की एक लम्बी फेहरिस्त है, लेकिन उसके बावजूद भी कांग्रेस नेतृत्व और खासतौर पर गांधी परिवार पुराने रिश्तों के नाम पर ऐसे सभी नेताओं की कारगुजारियों को अनदेखा लगातार करता रहा है और लगातार धोखा भी खाता रहा है।

अब प्रश्न यही है कि क्या इस तरह के धोखे खाने की नियती स्वयं की मान चुका है कांग्रेस आलाकमान या वह इनसे सबक लेते हुए अपने आसपास के नेताओं की विश्वसनीयता को कसौटी पर परखने के लिए कुछ प्रयास करेगा? जमीनी कार्यकर्ताओं को ड्राइंग रूम पालिटिक्स करने वालों पर तरजीह देने का जिम्मा क्या पार्टी नेतृत्व लेगा? आज भी कांग्रेस में ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं की भरमार है, जो कांग्रेस विचारधारा को आत्मसात कर कांग्रेस का झंडा उठाए पूरे देश में संघर्ष कर रहे हैं। जरूरत है पार्टी अपने उन सभी जमीनी कार्यकर्ताओं को अपने विश्वास की ताकत प्रदान करे और उन्हें यह अहसास दे कि आपके हक पर कोई भी ऐसा नेता कब्जा नहीं कर पाएगा, जो केवल अपना स्वार्थ ही देखता हो। तभी कांग्रेस नेतृत्व, आम कार्यकर्ता के विश्वास को अपने विश्वास के साथ जोड़ने में सफल भी हो सकता है।


janwani address 3

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

क्यों बढ़ रहा है किडनी रोग?

डॉ रूप कुमार बनर्जी, होमियोपैथिक चिकित्सक आधुनिकता और शहरी जीवनशैली...

स्वस्थ तन मन के लिए क्या करें

नीतू गुप्ता मनुष्य जब तक जवान रहता है, वह सोचता...

वो गैस आ नहीं रही, ये गैस जा नहीं रही

गैस से वे पहले ही परेशान थे। चौबीसों घंटे...

लिखा जा रहा नारी शक्ति का नया अध्याय

भारत का लोकतंत्र एक नए मोड़ पर खड़ा है...

पर्यावरण अनुकूल बने ईवी

जलवायु परिवर्तन आज मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़ी...
spot_imgspot_img