मेरी कोशिश रहती है कि जब भी किसी तरह की कोई आवाज उठाऊं तो वह संवैधानिक ढंग से हो। लेकिन क्या पता किसी न किसी की मानहानि हो ही जाती हैं। जो कि मेरा मन कभी किसी की मानहानि नहीं करना चाहता है। आखिर मैं अपने मन की बात से किसी के मान को हानि पहुंचाने वाला होता कौन हूं? मैं ठहरा एक आम आदमी। प्रतिदिन किसी न किसी लाइन में खड़े रहने वाला। भीड़ का सक्रिय सदस्य। मैं तो सिर्फ अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाता हूं। विगत दिनों मैंने एक मंच से बस इतना कह दिया कि भ्रष्टाचार दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। बस फिर क्या था! कितनों का ही लोकतंत्र नाराज हो गया। उन्होंने इसे अपनी मानहानि मान ली। संविधान पर बात आ गई। बाबा साहब को बीच में ले आए। बताओ इसमें किसकी मानहानि हुई? भला संविधान ने सबको अपनी अपनी बात कहना का अधिकार दिया है, फिर किसी को किसी की बात से नाराज नहीं होना चाहिए।
आखिर संविधान ने मुझे यह ढंग दिया है। मैं इसका उपभोग क्यों नहीं करूं। बड़े अधिकारी तो इस ढंग की आड़ में कितनी ही ग्रांट डकार जाते हैं और बड़े ढंग की ऊंची आवाज उठाते हैं। नेता संसद की आड़ में आवाज उठाते हैं और अपने क्षेत्र में कोलाहल मचा देते हैं। फिर मैं संवैधानिक ढंग से थोड़ी बहुत आवाज क्यों नहीं उठा सकता हूं। मेरे पास यह संवैधानिक ढंग का ही अधिकार बचा है, नहीं तो मैं अपने घर में भी चू तक नहीं कर सकता हूं। घर के बाहर की तो बात ही अलग है। हमें निरंतर संवैधानिक ढंग से अपनी आवाजें उठाते रहना चाहिए। जो भी सार्वजनिक व सरकारी संपत्ति मिले, उसे ज्यादा से ज्यादा उपभोग व जल्दी से जल्दी कब्जा कर लेना चाहिए। आखिर यह भी एक संवैधानिक ढंग है, राष्ट्र की संपत्ति में हमारे अधिकार का। हम इसे ढंग से क्यों ना उठाएं।
इन दिनों तो सोशल मीडिया ने हमारे इस अधिकार का ओर विस्तार कर दिया है। हम बिस्तर में पड़े-पड़े इस ढंग का उपयोग कर समाज में क्रांति ला सकते हैं और कितने ही युवा रील बनाकर सोशल मीडिया पर क्रांति ला रहे हैं। गजब की संवैधानिक आवाज उठ रही है। युवा सातवें आसमान में पर हैं। धरती पर पांव रखना अब उनकी शान के खिलाफ है। कभी पांव रखने की जरूरत होती भी है तो वोटजीवी प्रजाति उनके लिए फट से बढ़ीया कालीन बिछा देती है। आखिर युवाओं की आवाज का लाभ कौन नहीं लेना चाहता है। और फिर यह तो संवैधानिक ढंग से उठाई जाने वाली आवाजें होती हैं, जो लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए शुभ मानी जाती हैं। वो बात अलग है कि कभी-कभी कुछ न्यायिक जांच एजेंसियां भी संवैधानिक ढंग से आवाज उठाने का प्रयास करती हैं, लेकिन सरकार के वफादार उन आवाजों को उठने नहीं देते। भ्रष्टाचार हो, सरकारी लापरवाही हो, कालाबाजारी, न्यायपालिका की लेटलतीफी हो, शिक्षा माफिया, भू माफिया हो..! संवैधानिक अधिकारों की आड़ में इन क्षेत्रों में निरंतर संवैधानिक ढंग से आवाज उठाकर शुभ-लाभ करते रहना चाहिए!

