Wednesday, March 4, 2026
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मुजफ्फरनगर से दारा सिंह, मेरठ से देवव्रत त्यागी बसपा प्रत्याशी

  • दारा सिंह को बसपा के पश्चिम प्रदेश प्रभारी राइन ने मुजफ्फरनगर लोकसभा प्रभारी किया नियुक्त

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: मुजफ्फरनगर लोकसभा क्षेत्र से दारा सिंह प्रजापति को बसपा ने प्रत्याशी घोषित कर दिया हैं। कई दिनों से उनके नाम की अटकले लगाई जा रही थी। दारा सिंह को बसपा प्रत्याशी बनाये जाने की पुष्टि पार्टी के नेताओं ने की हैं। दारा सिंह मूल रूप से गंगानगर (मेरठ) के रहने वाले हैं। इसके अलावा मेरठ लोकसभा क्षेत्र से बसपा प्रत्याशी के रूप में देवव्रत त्यागी का नाम सामने आया हैं, हालांकि अभी उनके नाम की अधिकृत घोषणा होना बाकी हैं। बसपा ने मुजफ्फरनगर और मेरठ में दोनों हिन्दु नेताओं के चुनाव मैदान में उतारने के बाद भाजपा में खलबली मच गई हैं।

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दारा सिंह प्रजापति 53 वर्ष के है तथा लंबे समय से प्रजापत समाज के लिए आंदोलन करते आ रहे हैं। बिरादरी के लिए हाल ही में दिल्ली में प्रदर्शन करने जा रहे थे कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज कर दिया था। इससे प्रजापत समाज के लोग बेहद आहत हैं। प्रजापत समाज के लोगों को भाजपा के खिलाफ एकजुट किया जा रहा हैं। कई दिनों से उनकी मुजफ्फरनगर क्षेत्र में मीटिंग दर मीटिंग चल रही हैं। पश्चिम प्रदेश प्रभारी ने बताया कि मुजफ्फरनगर लोकसभा क्षेत्र में इस बार बहन कुमारी मायावती दारा सिंह प्रजापति को ही उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारना फाइनल कर चुकी हैं।

बसपा नेताओं ने दारा सिंह को बसपा प्रत्याशी बनाने की देर रात में पुष्टि कर दी हैं। हालांकि मेरठ में देवव्रत त्यागी को प्रत्याशी बनाने की बात चली, लेकिन पार्टी स्तर पर इनका नाम घोषित नहीं हुआ हैं, मगर देवव्रत त्यागी ही मेरठ से बसपा प्रत्याशी होंगे। मूल रूप से देवव्रत त्यागी 59 वर्षीय किसौला (बुंलदशहर)के रहने वाले हैं तथा बड़े दवा व्यापारी हैं। वर्तमान में देवव्रत त्यागी शास्त्रीनगर के-ब्लाक में परिवार के साथ रह रहे हैं।

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भाजपा की दूसरी लिस्ट में भी मेरठ होल्ड पर

भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने लोकसभा प्रत्याशियों की दूसरी लिस्ट भी जारी कर दी, लेकिन मेरठ में प्रत्याशी कौन होगा? अभी होल्ड पर रखा गया हैं। मेरठ को लेकर भाजपा शीर्ष नेतृत्व प्रत्याशी का नाम अभी फाइनल नहीं कर पा रहा हैं, जिसके चलते दूसरी सूची में भी मेरठ का नाम होल्ड पर रखा गया हैं। भाजपा मेरठ को लेकर कोई भी जल्दबाजी में फैसला नहीं लेगी। क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को बड़ी मुश्किल से जीत मिली थी। बसपा-सपा के प्रत्याशी फाइनल होने के बाद ही भाजपा अपने प्रत्याशी का नाम घोषित करेगी।

सीएए का साइड इफेक्ट देने की तैयारी में मुस्लिम!

मेरठ: लोकसभा चुनावों में भाजपा के लिए क्या सीएए का कोई साइड इफेक्ट भी होगा। सवाल अपने आप में पेचींदा है, लेकिन गंभीर है। उधर नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लागू होने के बाद मुस्लिमों में असमंजस की स्थिति अब भी बरकरार है। उनका मानना है कि जब तक सीएए का वो हर पहलू से विश्लेषण नहीं कर लेते तब तक वो इसके नफा-नुकसान पर कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं।

शहर के प्रमुख उलेमा भी कह चुके हैं कि वो इस कानून के खिलाफ तो नहीं हैं, लेकिन क्या ही अच्छा होता कि इस कानून के तहत बांग्ला देश, श्रीलंका, चीन व बर्मा के इच्छुक मुसलमानों को भी नागरिकता के दायरे में लाया जाता। उधर कुछ दूसरे मुस्लिम उलेमाओं का कहना है कि वो इस कानून के नफा नुकसान के बारे में गुणा भाग करने के बाद ही कुछ कहने की स्थिति में होंगे।

गैर मुस्लिम प्रत्याशी आने पर एमआईएम को हो सकता है फायदा

अब सबसे बड़ा सवाल यहां यह है कि लोक सभा चुनावों में मेरठ-हापुड़ सीट पर मुस्लिम मतदाताओं का रुझान क्या होगा। भाजपा प्रत्याशी को यदि छोड़ दें तो सपा, बसपा और एमआईएम प्रत्याशी पर मुस्लिम कितना भरोसा जताएंगे यह आने वाला वक्त बताएगा। अमूमन जहां मुस्लिम वोट भाजपा के पक्ष में न के बराबर जाता है वहीं सपा व बसपा पर मुस्लिम मतों का खासा दारोमदार रहता है।

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हालांकि अभी दोनों ही पार्टियों ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन फिजाओं में जो नाम गंूज रहे हैं उनमें सपा से योगेश वर्मा और मुखिया गुर्जर जबकि बसपा से देवव्रत त्यागी का नाम मुख्य है। यदि सपा व बसपा गैर मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट देती हैं तो राजनीतिक पण्डित इस बात का आंकलन कर रहे हैं कि इसका सीधा फायदा एमआईएम प्रत्याशी को मिल सकता है और महापौर चुनावों जैसी स्थिति एक बार फिर बन सकती है।

अखिलेश की स्ट्रेटजी से मुस्लिम कुछ खफा

विधान परिषद् चुनावों में मुस्लिम प्रत्याशियों की अनदेखी के आरोप पार्टी मुखिया अखिलेश यादव पर खूब लगे। राजनीतिक पण्डित इस बात की भी गुणा भाग में लगे हैं कि कहीं इसका नुकसान पार्टी को लोकसभा चुनावों में मुस्लिम मतदाताओ की नाराजगी के रूप में न उठाना पड़ जाए।

ये थी मुस्लिमों की रणनीति

दरअसल लोकसभा चुनावों में इस बार बड़ी संख्या में मुसलमानों का रुझान कांग्रेस की ओर देखा जा रहा था। कांग्रेस भी इसे महसूस कर रही थी, यही कारण है कि मेरठ हापुड़ लोकसभा सीट सपा के खाते में जाने से कई कांग्रेसियों को आघात भी लगा।

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