
सीबी मिश्रा |
कोरोना काल के बाद स्कूल खुले,तो छात्रों ने मुझे जिस रूप में देखा, उसमें पहले वाली चीज नजर नहीं आई। क्लास में उदासी, रूखापन, नीरसता। बच्चों ने ये भी नोटिस किया कि सरजी आजकल अनु मिश्रा की चर्चा नहीं कर रहे। हर दिन वे अखबार पढते, तो मैं बताता, देखो आज अमुक अखबार में अनु का एक आर्टिकल छपा है। जानते हो आज अनु के 100आर्टिकल पूरे हो गए….डेढ़ सौ से अधिक हो गए उसके लेख। मैं जब उसके रूम में पहुंचा तो देखा शीशे में डेढ़ सौ अखबारों के कटिंग भरकर टंगे हुए थे। गर्व से मेरी छाती चौड़ी हो गई। रोज चार पांच लेख चार पांच अखबारों में।
देखिएगा पापा, मैं आइएएस कंप्लीट करूंगी। सेल्फ स्टडी के बल पर। आपका सपना साकार करूंगी।
करीब डेढ़ महीने बाद एक छात्रा पूछ बैठी, सर जी, मैं रोज सुबह अखबारों को पढ़ती हूं। पापा अनेक अखबार लाते हैं, लेकिन अनु दीदी का एक भी आर्टिकल आजकल अखबारों में नहीं निकल रहा है। आखिर वो आजकल कहां हैं?
अनेक स्टूडेंट्स ने भी इसी तरह के प्रश्न पूछना शुरू कर दिए।
मैंने पथराई नजरों से उन्हें देखा। वह दृश्य आंखों के सामने घूम गया, जब मैंने अपने बूढे हाथों से उसे चिता पर लिटाया था। कांपते हाथों से उसके फूल से कोमल होंठों से अग्नि को स्पर्श कराया था और वह महज कुछ घंटों में वो राख के ढेर में बदल चुकी थी।
अनु का अब कोई आलेख अखबारों में नहीं छपेगा। वो अब इस दुनिया में नहीं है।
बच्चों की आंखों नम हो गर्इं। मैं भींगी आंखों को पोंछते दूसरे क्लास की ओर बढ गया।


