Saturday, April 4, 2026
- Advertisement -

भू-जल पर गहराता संकट

 

Nazariya 21


Arvind jaytilak 1साइंस जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में वैज्ञानिकों का यह खुलासा चिंतित करने वाला है कि जलदोहन पर नियंत्रण नहीं लगा तो वर्ष 2040 तक दुनिया की 19 प्रतिशत आबादी संकट में होगी। शोधकर्ता गेरारदो हेरेरा ग्रेसिया और उनकी टीम इस निष्कर्ष पर है कि भू-जल का स्तर कम होने के कारण दुनिया के 34 देशों में 200 अलग-अलग स्थानों पर जमीन का घटाव कम होगा जिससे सबसे अधिक एशिया के 63.5 करोड़ लोग प्रभावित होंगे। शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि अगर जनसंख्या वृद्धि, वनों को उजाड़ने और प्राकृतिक जलदोहन पर रोक नहीं लगा तो इसके परिणाम विनाशकारी होंगे। याद होगा गत वर्ष पहले विज्ञान पत्रिका नेचर जियोसाइंस ने खुलासा किया था कि सिंधु और गंगा नदी के मैदानी क्षेत्र का तकरीबन 60 फीसद भूजल दूषित हो चुका है। उसका दावा है कि चार दक्षिण एशियाई देशों में फैले इस विशाल क्षेत्र का पानी न तो पीने योग्य बचा है और न ही सिंचाई योग्य। गौरतलब है कि भारत, बांग्लादेश व नेपाल स्थित गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी का मैदान क्षेत्र सिंधु-गंगा मैदान अर्थात इंडो-गैंगेटिक बेसिन कहलाता है। इसका क्षेत्रफल तकरीबन 25.50 करोड़ हेक्टेयर है। इस क्षेत्र में विश्व के कुल भूजल का तकरीबन 25 फीसद हिस्सा संग्रहित है जो पीने के अलावा सिंचाई के काम आता है। भारत के जल संसाधन की ही बात करें तो जीईसी 1997 के दिशा निदेर्शों एवं संस्तुतियों के आधार पर देश में स्वच्छ जल के लिए भूजल संसाधनों का आकलन किया गया जिसके मुताबिक देश में कुल वार्षिक पुन: पूरणयोग्य भूजल संसाधनों का मान 433 घन किमी है।

प्राकृतिक निस्सरण के लिए 34 बीसीएम जल स्वीकार करते हुए नेट वार्षिक भूजल उपलब्धता का मान संपूर्ण देश के लिए 399 बीसीएम है। वार्षिक भूजल का मान 231 बीसीएम है जिसमें सिंचाई उपयोग के लिए 213 बीसीएम तथा घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग के लिए जल का मान 18 बीसीएम है। धरातलीय जल तथा पुनर्भरण योग्य भूमिगत जल से 1,869 घन किमी जल उपलब्ध है और इनमें से केवल 60 प्रतिशत यानी 1,121 घन किमी जल का लाभदायक उपयोग किया जाता है। भूजल पीने के पानी के अलावा पृथ्वी में नमी बनाए रखने में भी मददगार साबित होता है। पृथ्वी पर उगने वाली वनस्पति तथा फसलों का पोषण भी इसी जल से होता है।

यहां यह भी जानना जरुरी है कि अन्य देशों की तुलना में भारत में सालाना मीठे व स्वच्छ पानी की खपत अधिक होती है। विश्व बैंक के विगत चार साल के आंकड़ों के अनुसार घरेलू, कृषि एवं औद्योगिक उपयोग के लिए प्रतिवर्ष 761 बिलियन घन मीटर जल का इस्तेमाल होता है। मौजूदा समय में पानी की कमी बढ़ गई है और उसका मूल कारण भूजल का दूषित होना है। विज्ञान पत्रिका नेचर जियोसाइंस की मानें तो सिंधु और गंगा नदी के मैदानी क्षेत्र का 60 प्रतिशत भूजल पूरी तरह दूषित हो चुका है। कहीं यह सीमा से अधिक खारा है तो कहीं उसमें आर्सेनिक की मात्रा बहुत अधिक है। आंकड़ों के मुताबिक 200 मीटर की गहराई पर मौजूद भूजल का बड़ा हिस्सा दूषित हो चुका है वहीं 23 प्रतिशत भूजल अत्यधिक खारा है।

ध्यान देना होगा कि दूषित भूजल में सिर्फ आर्सेनिक की ही मात्रा नहीं बढ़ रही है बल्कि कैडमियम, लेड, मरकरी, निकल तथा सिल्वर की मात्रा भी बढ़ रही है। एक आंकड़े के मुताबिक दूषित भूजल से हर आठ सेकेंड में एक बच्चा काल का ग्रास बन रहा है। हर साल पचास लाख से अधिक लोग दूषित भूजल के सेवन से मौत के मुंह में जा रहे हैं। गौर करें तो समस्या सिर्फ भूजल के दूषित होने तक सीमित नहीं है।

विडंबना यह भी है कि भूजल के स्तर में लगातार गिरावट भी हो रही है। भौगोलिक परिदृश्य पर नजर दौड़ाएं तो भारत के पठारी भाग भूजल की उपलब्धता के मामले में कमजोर हैं। यहां भूजल कुछ खास भूगर्भिक संरचनाओं में पाया जाता है जैसे भ्रंश घाटियों और दरारों के सहारे। वहीं दूसरी ओर उत्तरी भारत के जलोढ़ मैदान हमेशा से भूजल में संपन्न रहे हैं। लेकिन अब उत्तरी व पश्चिमी भागों में भूजल के तेजी से दोहन से अभूतपूर्व कमी देखने को मिल रही है। गिरता भूजल सिर्फ महाराष्ट्र के मराठवाड़ा, उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड या बिहार के सीतामढ़ी तक ही सीमित नहीं है। पंजाब व हरियाणा जैसे राज्यों में भूजल स्तर 70 प्रतिशत तक नीचे पहुंच चुका है। आंकड़ों के मुताबिक वर्तमान समय में भारत के 29 प्रतिशत विकास खंड भूजल के दयनीय स्तर पर हैं। ऐसा माना जा रहा है कि 2025 तक लगभग 60 प्रतिशत विकास खंड चिंतनीय स्थिति में आ जाएंगे।

जलवायु परिवर्तन के अनुरूप जल संसाधनों के संरक्षण तथा अनुरुप प्रौद्योगिकी विकल्प को आजमाया जाएगा। औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जल उपयोग हेतु परियोजना मूल्यांकन एवं पर्यावरणीय अध्ययन का विश्लेषण किया जाएगा। लेकिन सच तो यह है कि इन प्रयासों के बावजूद भी भारत में जल संरक्षण एवं प्रबंधन हेतु व्यापक स्तर पर संचालित कार्यक्रम परिणाम की दृष्टि से प्रभावी साबित नहीं हुए है। भूजल के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए एक स्पष्ट प्रभावी कानूनी ढांचे का अभाव बना हुए है। हर वर्ष अरबों घन मीटर भूजल दूषित हो रहा है।

यह समझना होगा कि भारत सालाना जल की उपलब्धता के मामले में चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों से बहुत पीछे है। ऐसे में अगर दूषित व गिरते भूजल को बचाने का समुचित उपाय नहीं किया गया तो हालात खतरनाक स्तर तक पहुंच सकते हैं। भूजल समस्त वनस्पतियों, पशुओं तथा मानव जीवन का आधार है। उसे प्रदूषण से बचाने के लिए व्यवहारिक पहल की आवश्यकता है।

अरविंद जय तिलक


janwani address 166

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

दुनियादारी की कहानी का आर्थिक पक्ष

तुर सुजान कहते हैं कि दुनिया की कहानी, कहानी...

क्या ऊर्जा संकट से होगा तख्ता पलट?

आगामी कुछ दिनों में पांच राज्यों में विधानसभा होने...

गंगा की कब ली जाएगी सुध?

हाल में अपनी सरकारों, सेठों और समाज में बहुतायत...

Saharanpur News: सहारनपुर में “ऑपरेशन सवेरा” के तहत बड़ी कार्रवाई, दो तस्कर गिरफ्तार, 695 ग्राम चरस बरामद

जनवाणी संवाददाता | सहारनपुर: डीआईजी अभिषेक सिंह के दिशा निर्देश...

Saharanpur News: त्योहारों को लेकर सहारनपुर में हाई अलर्ट, सीमाओं से लेकर बाजारों तक कड़ी निगरानी

जनवाणी संवाददाता | सहारनपुर: आगामी त्योहारों के मद्देनजर जनपद में...
spot_imgspot_img