
सब कुछ नया हो गया! संसद भवन भी नया हो गया; लोकतंत्र भी नया हो गया; समयके ललाट पर अमिट हस्ताक्षर कर प्रधानमंत्री ने संकल्प भी नया लिख दिया ! यह भी एकदम नया हुआ कि संसद भवन का उद्घाटन समारोह हुआ, लेकिन न राष्ट्रपति थीं, न उप-राष्ट्रपति थे। दोनों दिल्ली में ही थे, लेकिन उनके संदेश भर पढ़े गए, उन्हें मौजूद रहने से मनाही कर दी गई। 20 से ज्यादा विपक्षी दल नहीं थे, यह बात आपके लोकतंत्र में कोई मानी नहीं रखती। संविधान में यह बात ही गलत दर्ज हो गई है कि संसद में पक्ष और विपक्ष का होना ही जरूरी नहीं है, बल्कि वही लोकतंत्र है जिसमें दोनों की साझेदारी हो। लोकसभा का अध्यक्ष उसका प्रथम पुरुष होता है, ऐसी कोई नई मान्यता बनाई जा रही है, तो वैसा भी कुछ बना नहीं ; अध्यक्ष थे जरूर, लेकिन थे वे प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व विहीन पिछलग्गू !